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कवितायन:-अरुण चन्द्र रॉय,गाज़ियाबाद

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on रविवार, फ़रवरी 27, 2011 | रविवार, फ़रवरी 27, 2011

अरुण चन्द्र रॉय
(कवि बनने के क्रम में
एक बेहतर इंसान  )

गुम गया है ए़क बच्चा


गुम गया है
ए़क बच्चा
शोर है सारे शहर में
लोग लगा रहे हैं
नारे
लोग दे रहे हैं
धरना
बदल बदल कर पाला

शोर है सारे शहर में
गुम गया है ए़क बच्चा
लोग लगा रहे हैं 
आरोप
लोग कर रहे हैं
प्रत्यारोप
लोग कर रहे हैं
प्रेस कोंफ्रेंस
लोग कर रहे हैं
स्टिंग ऑपरेशन

शोर है सारे शहर में
गुम गया है ए़क बच्चा
लोग घोषित कर रहे हैं
इनाम
लोग बाँट रहे हैं
मुआवजा
बच्चे के हो गये हैं 
कई कई पिता 
कई कई माँ 
किसी के पास है 
जन्म प्रमाणपत्र 
तो कोई तैयार है 
करने को डीएनए टेस्ट 

और 
बच्चा है कि 
चाहता है एक अदद ऊँगली 
और पहुचना चाहता है 
अपने घर 

शोर है सारे शहर में कि
गुम गया है ए़क बच्चा !

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9 टिप्‍पणियां:

  1. हाँ, गुम गया है एक बच्चा
    और अब गुमा हुआ
    ही रहना चाहता है
    कोई उंगली उसे थाम ले
    ऐसा कोई साहिल
    उसे नज़र आता नहीं
    और यदि मिल भी जाये
    तो कब तक साथ देगा
    इसका उसे पता नही
    तो क्यों ना उसे
    गुम ही रहने दो
    कम से कम जी तो लेगा
    एक सांस तो ले लेगा

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक बच्‍चे से जुड़ा क्‍या क्‍या न था
    भीड़ में कोई मगर अपना न था।
    शोर चारों ओर था, उस भीड़ में
    और बच्‍चा सो रहा था नीड़ में।

    आपने और वन्‍दना जी ने जो कहा वह मिलकर एक अलग ही भाव पैदा कर रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  3. गरीब की लुगाई, सबकी भौजाई हुआ करती थी, अब बात यहां तक आ पहुंची.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बच्चा
    चाहता है एक अदद ऊँगली
    और पहुचना चाहता है
    अपने घर
    per shor hai apne varchasw ka

    उत्तर देंहटाएं
  5. kya kahun...
    bas achchha laga...
    sare shresth kaviyon ne to pahle hi apni tippani vyakt kar di..:)
    badhai arun jee!

    उत्तर देंहटाएं
  6. अरुण जी की एक और सशक्त रचना पढकर मन को बहुत अच्छा लगा।

    उत्तर देंहटाएं

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