डॉ. महेंद्र प्रताप 'नन्द' की कविताएँ - अपनी माटी Apni Maati

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डॉ. महेंद्र प्रताप 'नन्द' की कविताएँ

डॉ0 महेन्द्र प्रताप पाण्डेय ’नन्द’
रा0 इ0 का0 द्वाराहाट अल्मोड़ा
उत्तराखण्ड

09410161626
    mp_pandey123@yahoo.co.in
ऋतुराज
सखि बसन्त ऋतुराज आ गया।
तरुणी जिय का साज आ गया।।
जो पतझड़ से पीड़ित तरु थे, 
नीरस शुष्क बने जो मरु थे,
अंगड़ाई यौवन हित लेकर,
देख सखि रसराज आ गया।। सखि . . . . .
मधुकर का दिन लौट गया है,
पादप पर मधु पत्र नया है,
सौरभ भीना-भीना सुरभित,
मन में वह नटराज आ गया।। सखि . . . . .
फूले कुमुद कुमुदिनी सारे,
है अनंग पर सब अंग वारे,
कोयल छेड़ी तान सुहानी,
नव युगलों में लाज आ गया।। सखि . . . . .
हरीतिमा से धरा सजीली,
प्रकृति बन गयी आज रसीली,
विहंगों का हुंकार अलौकिक,
हर ऋतुओं का ताज आ गया।। सखि . . . . .


बसन्त
कोकिल प्रियतम ऋतुपति आया।
संग मादक मधु सौरभ लाया।।
कली विकसि भई मद की प्याली।
पीयत झुकि झपि मधुकर माली।।
परिछन चली सुहागिन तितली।
द्विज दल मंगल गान सुनाया।।
कोकिल प्रियतम ऋतुपति आया।
संग मादक मधु सौरभ लाया।।1।।
यामिनी घूँघट पट टाली।
ऊषा सज ली स्वर्णिम थाली।
शीतल मंद सुगंध त्रिविध गति,
श्रमहर मारूति विजन डुलाया।।
कोकिल प्रियतम ऋतुपति आया।
संग मादक मधु सौरभ लाया।।2।।
जॅह अस प्रकृति रसीली सारी।
विरहिन पपीहा पिया पुकारी।
सचल चराचर दम्पति सुख लह,
निरखि चातकी विलखति काया।
कोकिल प्रियतम ऋतुपति आया।
संग मादक मधु सौरभ लाया।।3।।

बसन्त वर्णन 
जलाया किसी ने किया अग्नि वर्षा, उपद्रव के झोंके अनेको चलाये।
गरज कर किसी ने बंधाई है घिघ्घी, लिया छीन अम्बर दिगम्बर बनाये।
गरज कर किसी ने जड़ो से उखाडे़, चमक कर कड़क कर गिराये बहाये।
न छोड़ा लतापत्र भी निर्दयी ने, बना है जहॉ तक भली विधि सताये।
न देखी गयी क्लान्त जीवों की दुर्गति, मिले धाय दल पल से ऋतुराज प्यारे।
दिये हैं असन और बसन सम्पदा सुख, बहाते हुए स्नेह रस के पनारे।
तजे वैर बैरी बने है सुहृद जन, छनाके बसन्ती दुआरे दुआरे।
सजाये सुभग सब दम्पतिन के, मनाते हैं मंगल तुम्हारे सहारे।
ये भौरों की अठखेलियाँ नवसुमन पर, और उनका भी कह कहकर सिर को झुकाना।
नवल प्रमियों के प्रणय का प्रदर्शन है कैसा मुकरना मनाना रिझाना।
लताओं की तरूवर से लिपटनि लहकि, सुधरि मंजरी का मधुर मधु लुटाना।
मनाना नये ढंग होली थिरक कर पवन पे कुसुम का ये कुंकुम उड़ाना।
सजे कुंज में पिक वियोगिन की कुहुकनि, दिलाती है सुधि श्याम अमी सारिनी का।
विदेशी सजन मिल गया आज उपवन, मनो नौ वधू सुन्दरी कामिनी का।
कला केलि करती कलाधर के कर की, मेरे दुःख बढ़ाये दुसह दामिनी का।
बढ़ेगी तपन छीन होगी निशा जब न अच्छा है दिल दूखना भामिनी का।
मुदित मन महा माधवी है भटकती, कि माधव मिले माह दस दुःख सहा के।
पलासों की अनुराग ने रंग दिया है, कि सरबोर कर दी सुरस रस बहा के।
करीले नगन मग्न मौनी बने हैं, कि वे ही जपैं प्रीति गंगा नहा के।
अनंगी ने सबको उमंगी बनाया, कि रतिपति करे राज ऋतुपति कहा के।
कहो क्यों न होगा सजन यह यशस्वी, करे जो भला विश्वबन्धुत्व प्यारे।
सुधा की सुधारों से सींचा है तुमने, कुटिल काल कवलित कलपते उबारे।
सदा कीर्ति उज्ज्वल रहेगी तुम्हारी, सदा गान गायेंगे कविजन तुम्हारे।
तुम्हे दे रहा है बधाई ‘महेन्द्र’, छबीली घटा चित्र बन के निहारे।।

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