समय को लिखती शेर-ओ-शायरी-1 - अपनी माटी

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शनिवार, मार्च 12, 2011

समय को लिखती शेर-ओ-शायरी-1

चित्तौडगढ के साहित्यप्रेमी शिक्षाविद डॉ. ए.एल.जैन से आज पढ़ने को मिली पत्रिका 'सापेक्ष'-३२  के एक ग़ज़ल विशेषांक से यहाँ शेर-ओ-शायरी प्रस्तुत कर रहे हैं.शायद आपके काम आ जाए.मगर रचनाकार का नाम बतलाते हुए उपयोग करेंगे तो ये हमारी मानवता होगी.












शमशेर बहादुर सिंह

यह सलामी दोस्तों को है मगर
मुठ्ठियाँ तनती है दुश्मनों के लिए

ज़हीर कुरैशी

इस शहर में एक टुकड़ा धूप मुश्किल हो गयी
आस्था रद्दी में बिक जाने के काबिल हो गयी

डॉ.शेरजंग गर्ग

बेचकर मुल्क मुस्कराने लगते हैं
कौम के मसखरों का क्या कहना

मिदत तुल अख्तर

साहिल की सारी रेत इमारत में लग गई
हम लोग कैसे अपने धरौंदे बनाएंगे

डॉ. कुंवर बेचैन

समय की अंतड़ी से खून टपकेगा नदी बनकर
नुकीली भूख जिस दिन सामने तनकर खड़ी होगी

मदन गोपाल शर्मा

तेज़ धूप छा गई वितान की तरह
जुट गई है काम पर किसान की तरह

बिस्मिल सईद

किस कदर खुशफहम थे,जो लोग अगले वक्त
मस्जिदें बनवा दिया करते थे बुतखानों के साथ

संकलन:-माणिक

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