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11 वें समता लेखक सम्मेलन की रपट

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on रविवार, मार्च 13, 2011 | रविवार, मार्च 13, 2011

11 वाँ राष्ट्रीय समता लेखक सम्मेलन में ‘‘शहीद भगतसिंह स्मृति व्याख्यान’’

गरीबों का हक शोषित कर मुट्ठी भर लोगों के हाथ में दे देना ही वैश्वीकरण है। जो क्रान्ति समझौतों पर आधारित होती है। वह असमानता लाती है। अब समय आ गया है कि यथार्थ के धरातल पर वास्तविकता का मूल्यांकन किया जाए वरना गुंजाइश नहीं रहने पर चाह कर भी कोई कुछ नहीं कर पाएगा। उक्त विचार 11 वें समता लेखक सम्मेलन के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि डॉ. रत्नाकर पाण्डे ने। सुखाड़िया विश्वविद्यालय के विज्ञान महाविद्यालय के विवेकानन्द हाल में व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि व्यवस्था को सुधारवादी तरीकों से नहीं बदला जा सकता है। इसके लिए एक संपूर्ण क्रान्ति की जरूरत होती है। आज जरूरत है राजनैतिक विकल्पों के बारे में हमारी साफ समझ हो। क्योंकि विकल्प आयतीत नहीं किए जा सकते, उनका निर्माण करना होता है। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर चोट करते हुए डॉ. रत्नाकर पाण्डे ने कहा कि मानव सन साधन मन्त्री रोज नये-नये बयान देकर शिक्षा व्यवस्था चौपट कर रहे है। वो स्वयं कन्फूजड है। जो संस्थान अच्छा काम कर रही है। उन्हें वो बन्द करवाने पर तुले है। शिक्षा में परीक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है। लेकिन कपिल शिब्बल परीक्षा लेने के ही खिलाफ बयान बाजी कर रहे हैं। शिक्षा में परीक्षा नहीं होगी तो जीवन की परीक्षा में फैल होने के परिणाम और भयानक होेंगे। उन्होंने कहा कि यह वर्ष डॉ. राम मनोहर लोहिया की जन्म शताब्दी वर्ष है। इस महान क्रान्तिकारी नेता की शताब्दी वर्ष जिस हर्ष और उल्लास के साथ मनानी चाहिये थी दुर्भाग्य से वैसा कुछ नहीं हो रहा है। इस मायने में केन्द्र सरकार निष्क्रिय है। डॉ. पाण्डे ने महावीर समता संदेश की चर्चा करते हुए कहा कि समता संदेश द्वारा आयोजित सम्मेलन केवल सम्मेलन ही नहीं है। इन्हें सामाजिक बदलाव की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिये। ये जो भी आयोजन करते है उनका महत्व आयोजन तक सीमित नहीं रहता वो उनका दस्तावेजीकरण करके चीर स्थाई बनाने में मदद करते है।
दिनांक 4-6 फरवरी 2011 तक उदयपुर महावीर समता संदेश पाक्षिक कासा सस्थान, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के नेहरू सेन्टर, जन शिक्षण व विस्तार निदेशालय जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय व कल्याणी समग्र विकास कार्यक्रम कोल्यारी, झाड़ोल, मोहनसिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘‘युवजन और नई विश्व व्यवस्था’’ विषयक इस सम्मेलन के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए डॉ. हेमेन्द्र चण्डालिया ने कहा कि भारत विश्व में सबसे बड़ी युवाजन शक्ति वाला राष्ट्र बनने जा रहा है किन्तु युवाओं की आकांक्षा के अनुरूप कुछ होता दिखाई नहीं पड़ रहा है। बेरोजगारों का प्रतिशत बढ़ रहा है। निजी कम्पनियों व व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के शिक्षा में निवेश से निम्न व मध्य वर्ग के युवाओं के लिए शिक्षा के अवसर अत्यन्त सीमित हो गए हैं। अन्य, अल्प वेतन पर शिक्षण संस्थानों में अनुबंध या प्रति कालांश अध्यापन करने वाले छात्र बेरोजगारी के शिकार हैं। निजी कंपनियों में कार्यरत युवाओं के काम में घण्टों की कोई सीमा नहीं है। इस दृष्टि से कार्य की शर्ते बीसवी सदी के पूर्वार्द्ध से भी बदतर होती जा रही है। इन कंपनियों में कार्यरत युवाओं की शक्ति व ऊर्जा इस प्रकार निचोड़ ली जाती है कि पैतालीस वर्ष की आयु तक व्यक्ति कार्य करने लायक नहीं रहता है। इस प्रकार जीवन जीने का संघर्ष ही इतना जटिल और दुरूह होता जा रहा है कि युवाओं के लिए रचनात्मकता, सृजन, समाज व्यवस्था के बारे में चिन्तन व विमर्श करने के लिए अवकाश ही नहीं रहता है। ऐसे परिदृश्य में भारत के युवाओं को एक नया भारत व एक नई दुनिया बनाने का सपना देखने तथा उसे पूरा करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ होने के लिए कवि अवतार सिंह पाश के शब्द याद आते हैं। वो कहते हैं कि सबसे बुरा है मुर्दा शान्ति से भर जाना न होना तड़प का, सब सहन कर जाना। घर से निकलना काम पर। काम से लोटकर घर आना। सबसे खतरनाक है हमारे सपनों का मर जाना।

प्रत्येक देश के 10-15 प्रतिशत व्यक्तियों को अपनी जीवन शैली का गुलाम बनाना ही अमेरिका की विदेशी नीति का साफ्टवेयर है - अजय कुमार

सम्मेलन के दूसरे दिन प्रातः कासा संस्थान में भगतसिंह स्मृति व्याख्यान का आयोजन हुआ। ‘‘सामाजिक न्याय व्यवस्था की स्थापना और भगतसिंह’’ विषय था। इस सत्र में डॉ. सुधा चौधरी ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि भगतंिसह का ख्वाब एक ऐसे समाज की स्थापना का रहा जिसमें मानव द्वारा मानव का उत्पीड़न न हो, जहां व्यक्ति को तमाम तरह की हिंसा से मुक्ति मिले, उसे किसी भी प्रकार की वर्जना न झेलनी पड़े। जहां मानवता साध्य हो। उन्होंने बताया कि भगतसिंह दो तरह की आजादी के लिए लड़ रहे थे। वे कहते थे कि सवाल व्यवस्था परिवर्तन का है। सत्ता हस्तान्तरण का नहीं। लेकिन आज आंकलन करने पर हम पाते हैं। समाज में तमाम तरह की विरूपताएं, विषमताएं, उत्पीड़न, आम व्यक्ति का सुख-दुःख सोच का विषय नहीं है। सरकारी घोषणाएं केवल कुछ व्यक्तियों को राहत देने तक सिमट कर रह जाती हैं।
सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए उद्भावना पत्रिका के संपादक अजय कुमार ने युवाओं से प्रश्न किया कि आजादी की लड़ाई में बहुत लोग शहीद हुए कई ने लाठिया, खाई पर आखिर ऐसी कौनसी बात है जिसके कारण भगतसिंह आज भी दिलों में सबसे ज्यादा जिंदा है। अर्जेन्टाइना के चे गुवेरा के शब्द ‘‘वी ड्रीम इम्पोसीबल’’ की सत्यता को साबित करने की जुर्रत भगतसिंह ने कर दिखाई। 23 वर्ष की उम्र में फांसी हो जाने वक्त तक अनुभवी होने का मौका नहीं दिया। जो उम्र अफसर बनने कामयाब केरियर का सपना देखने की होती है। वह उन्होंने देश के लिए कुर्बान कर दी। लेकिन आज का युवा भगतसिंह को केवल लाला लाजपतराय की मौत के बदले साइमन की हत्या करने या एसेम्बली में बम फैंकने वाले योद्धा के रूप में ही जानता है। उन्हें एक विचारक, एक लेखक के रूप में लोग नहीं जानते। इतनी कम उम्र में उनके द्वारा किये जाने वाले अध्ययन का अंदाज उनकी जेल डायरी से मिले लेखकों के कोटेशन्स से होता है। अराजकतावादी लेखक बाकुनिन की कृति ईश्वर और राज्य (गॉड एण्ड दी स्टेट) समाजवाद के पितामह मार्क्स अपने देशों में सफल क्रातियां लाने वाले लेनिन ट्रास्टकी आयरलेण्ड व इटली के क्रांतिकारियों के साहित्य का उन्होंने गम्भीर अध्ययन किया।
भगतसिंह को फांसी के लिए मुकरर दिन से एक सप्ताह पहले जब जेल ऑफिसर्स ने गुरू ग्रंथ साहब पढ़ने की सलाह दी व साथियों ने अहंवादी कहा और तानाशाह होने का आरोप लगाया। तब उन्होंने अपना प्रसिद्ध लेख मैं नास्तिक क्यों हूं की रचना की। संस्कारगत रूढिवादी विचारों को त्यागने और नए विचार ग्रहण करते समय अपनो ही से उलझना पड़ता है। भगतसिह ने लिखा है कि कोई आस्तिक अपने अहं के कारण नास्तिक बन जाए, यह संभव नहीं। परिवर्तन की विकास प्रक्रिया को समझने के लिए यह लेख अत्यन्त महत्वपूर्ण है।भगतसिंह का मानना था कि अंग्रेेज गोरे होने के कारण हमारे दुश्मन नहीं बल्कि उनका दुश्मन होना एक वर्गीय सवाल था।
''मैं लोगों की रूह में हरकत पैदा करना चाहता हूं; उनमें क्रांति का जज्बा पैदा करना चाहता हूं। भारत का भविष्य कैसा होगा कि रूपरेखा भगतसिंह के दिमाग में चल रही थी कॉलेज के प्रिंसिपल छब्बलील दास के साथ टेªक्स पुस्तिका सोसायटी की स्थापना कर साथियों के साथ कई पुस्तिकाएं छापी जैसे ‘‘हम स्वराज क्यों चाहते है?’’ ‘‘नौजवानों से दो बातें’’। ‘‘सबसे बड़ा पाप क्या है?’’ ‘‘दुनिया में महानतम् व्यक्ति कौन है?’’ ‘‘हिन्दुस्तानी किसान व मजदूर।’’ ‘‘गौरों की करतूत।’’ आदि उनके लिए क्राति का अर्थ सामाजिक व्यवस्था को बदलने का था क्रांतिकारी बन परतन्त्रता की बेडियों से मुक्ति का था। उन्होंने कहा कि समाज का आर्थिक पुनर्गठन होना चाहिए।
अजय कुमार ने अपने व्याख्यान को आगे बढ़ाते हुए कहा कि इस शताब्दी की सबसे बड़ी असफलता इंसानी मूल्यों के पतन की तैयारी है। त्याग की भावना का पूर्णरूप से त्याग अर्थात् व्यक्तिवादी सोच का विकास है। आज विश्व की 45 प्रतिशत उर्जा की खपत यू.एस. में है। अनाज से बायो-डीजल बनाने से सारे विश्व में अनाज की कीमतें बढ जाती है। विश्व के 137 देशों में उनकी फौजे है हर देश के 10-15 लोगों को उन्होंने अपनी जीवन शैली का गुलाम बनाया है। ये लोग मीडिया में हैं राजनैतिक व धार्मिक सत्ता में कारपोरेट जगत् आदि में अपनी उपस्थिति देते है, वे यथास्थिति बनए रखने में मददगार रहते हैं। लेकिन हमें यह समझना पड़ेगा कि केवल सीमित वर्ग से बाजार व्यवस्था चलाना जिसमें संसाधनों का समतुल्य व न्यायोचित उपयोग नहीं है। सतत् नहीं हो सकता है क्योंकि मार्केट गरीब पैदा करते हैं। अमेरिका में भी केवल 10 प्रतिशत लोगों की आय में 300 प्रतिशत वृद्धि हुई है। बाकि 90 प्रतिशत की आय में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। क्राइसिस दिस टाइम में छपे नॉम चॉमोस्की के लेख के हवाले से उन्होंने कहा कि एक खबर जिस ओर मीडिया ने ध्यान नहीं दिया है वह जोसेफ ए स्टेक ने एक छोटे जहाज से अपने ही दफ्तर पर हमला किया। उसकी डायरी में उसने लिखा कि पड़ोस की 80 वर्ष की बूढ़ी महिला का पति सारी जिंदगी स्टील कंपनी में नौकरी की उसे कोई मुआवजा नहीं कोई राहत नहीं। बीमा कंपनियां आम व्यक्ति के स्वास्थ्य के साथ मजाक है। उन्होंने कहा कि हमारे यहां कानून की दो व्याख्याएं है। एक आम व्यक्ति के लिए व दूसरी खास के लिए।
भगतसिंह व वर्तमान व्यवस्था पर बोलते हुए डी.एस. पालीवाल ने कहा कि 2025 तक वर्तमान व्यवस्था के चलते 70 प्रतिशत जनता की आय एक डॉलर से कम हो जाएगी। करोडों असहाय व गरीब पैदा करने वाली इस व्यवस्था ने खुद अपनी कब्र तैयार कर ली है। उन्होंने कहा कि भगतसिंह को भगतसिंह बनाने वाली बात उनकी विचारधारा थी। वे केवल एक क्रान्तिकारी सिपाही ही नहीं बल्कि एक विचारक भी थे। अब समय आ गया है कि युवाओं में बदलाव के लिए एक जुनून पैदा हो उन्होंने अपने ऐशो आराम छोड़ भगत बनकर युवाओं को क्रान्ति करने का आव्हान किया। क्योंकि आज की व्यवस्था अन्याय व भ्रष्टाचार पर आधारित है महिलाओं की धर्म में आजादी को लेकर उन्होंने कहा कि मनु का ‘‘यत्र नार्यस्तू पूज्यते रमन्ते तत्र देवता’’ केवल आवरण है पर वास्तव में स्त्रियों पर अत्याचार की पूरी छूट है।
कार्यक्रम के अध्यक्षीय उद्बोधन में स्वतन्त्रता सेनानी हुकमराज मेहता ने कहा कि लेखक भी अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं। जनता की पक्षधरता की बात तो हम सभी कहते हैं लेकिन साथ ही यह भी चाहते हैं कि क्रान्तिकारी हमारे घर में न होकर पड़ौस में पैदा हो। केवल बात करने की नहीं जनता के साथ जुड़कर जीवन में उतारने की बात है। अब हम इस सदी में भूमण्डलीकरण को नहीं नकार सकते लेकिन कॉरपोरेट दबाव से सचेत होना आवश्यक है। भगतसिंह की प्रासंगिकता तो उस समय भी थी व आज भी है बल्कि आज प्रासंगिकता विश्व में चुनौतियां बढ जाने से और बढ़ गई है।

युवाओं के सामने बेरोजगारी और शिक्षा सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है - पी. चिदम्बरम्
भगतसिंह स्मृति व्याख्यान के बाद कासा संस्थान के सभाकक्ष में ही सम्मेलन में ‘‘युवजनों की राजनैतिक चेतना एवं सामाजिक बदलाव की चुनौतियां’’ विषय सत्र का प्रवेश कराते हुए डॉ. प्रमिला सिंघवी ने कहा कि देश की आधी से ज्यादा आबादी युवा है और अगर उनमें राजनैतिक चेतना नहीं है तो यह चिन्ता का विषय है। राजनैतिक चेतना का अर्थ किसी दल के प्रति राजनैतिक प्रतिबद्धता से नहीं है बल्कि विचारधारा प्रति बद्धता से है।
महावीर समता संदेश पाक्षिक के मुख्य संपादक हिम्मत सेठ ने युवाओं से उनकी व्यवस्था जनित समस्याओं जैसे बेरोजगारी की ओर ध्यान देने को कहते हुए आव्हान किया कि वे स्वयं के भविष्य के साथ खिलवाड़ न करें। उन्होंने कहा कि देश में बढ़ रही सांप्रदायिक सोच कई समस्याओं की जड़ है। जिस दिन युवा इसको मिटाने की जिम्मेदारी अपने हाथ में ले लेगा उस दिन सांप्रदायिकता स्वतः समाप्त हो जायगी। उन्होंने पूर्व सत्र के अध्यक्ष हुकमराज मेहता के द्वारा सम्मेलन के सत्र व व्याख्यान के विषय पर उठाये गये सवालों का जवाब देते हुए कहा कि इस सम्मेलन व महावीर समता संदेश का किसी भी राजनैतिक पार्टी से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह एक साझा मंच है जहां केन्द्र से बाये की ओर विचार करने वालों का स्वागत है।
इस सत्र के मुख्य वक्ता जी.पी. मिश्रा प्रश्न करते हैं कि कौन आजाद हुआ। अली सरदार जाफरी के शेर के हवाले से कहे हैं कि खंजर आजाद है सीने में उतरने के लिए, वे कहते हैं कि आज के युवा की राजनैतिक चेतना तर्क व मुद्दो पर आधारित नहीं है। भगतसिंह ने कहा इंकलाब की तलवारे विचारों की सान पर तेज होती है। केवल सुधार से काम नहीं चलेगा आमूल चुल परिवर्तन की जरूरत है। चिली के पाव लोन की बात का जिक्र भी उन्होंने युवाओं के सामने किया जो क्रान्ति के लिए सामाजिक बदलाव के लिए सबसे प्यार करना सीखना पड़ेगा।
युवा पार्षद राजेश सिंघवी ने पिछले दिनों उदयपुर में आयोजित छः दिवसीय राष्ट्रीय युवा महोत्सव का जिक्र करते हुए कहा कि इस महोत्सव में बेरोजगारी, आतंवाकवाद जैसे अहम मद्दों पर कोई चर्चा नहीं होकर केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों जैसे डांस-गाने तक सीमित कर दिए जो युवाओं के साथ अन्याय है। हमारे युवाओं ने प्रगतिशील साहित्य पढ़ना बंद कर दिया है उनकी संवेदना व चिन्ता केवल यही है कि सामाजिक बदलाव की बात छोड़ो अपनी सोचो। भविष्य बनाओं जबकि युवा की पहली सोच विद्रोह की सोच है जो गलत को गलत कहने की सोच होनी चाहिए। कॉलेज विश्वविद्यालय चुनावों में भी असल चेतना नहीं दिखलाई पड़ती। सत्र की अध्यक्षता कर रहे गुजरात मजदूर किसान पंचायत के अध्यक्ष पी. चिदंबरम ने अपने वक्तव्य में कहा कि देश में क्रातिकारी बदलाव की जरूरत है और युवा ही इस बदलाव को लाने का काम करेंगे। यह तभी संभव होगा जब दो मंुहे पन से हमारा समाज मुक्त हो कथनी व करनी का अंतर मिटे। आम जनता के हक में परिवर्तन के खिलाफ साजिश का आलम यह है कि कहीं थोड़ी आवाज भी उठने लगे तो माओवादी-नक्सली करार देकर जेलों में बंद कर देते हैं। समता व बदलाव को रोकने का काम मीडिया बखूबी अंजाम दे रहा है। आम युवा को नेतृत्व के लिए तैयार करना होगा। उसे निडर बनाने व संघर्ष से जोड़ने की जरूरत है।
साथी चिदम्बरम् ने कहा कि यथा स्थिति बनाये रखने के लिए सरकारे और नेता युवाओं को साम्प्रदायकता, धर्म, जाति में बांटने का काम कर रहे हैं। युवाओं को भोग विलास की ओर जबरन धकेला जा रहा है। दूरदर्शन के कार्यक्रम आप बच्चों के साथ नहीं देख सकते। युवाओं को इस षंडयन्त्रो कों समझना होगा ओर बदलाव के लिए संगठित होना होगा।
समाज में व्याप्त विषमता है। डॉ. लोहिया की सप्तक्रांति विषमता मिटाने में हमारा मार्गदर्शन कर सकती है। उन्होंने कहा अभी सारा सूख, सारी सुविधाएं और सभी सनसाधन देश के 10,000 कुटुम्ब के पास है। 80 प्रतिशत लोग बदहाली में जी रहे हैं। उन्होंने कहा सेन गुप्ता कमेटी के अनुसार देश के 80 प्रतिशत लोग 20 रूपये रोज खर्च करने की हैंसियत भी नहीं रखता। युवाओं के सामने बरोजगारी और शिक्षा सबसे बडी चुनौति बनकर खड़ी है। एक हजार पदों के लिए एक लाख लोग आवेदन करने जाते है। बेरोजगारी के चलते युवा मरने से भी नहीं डरते हैं। विकास के नाम पर लोगों को जमीन से बेरोजगार किया जा रहा है। 
लखनऊ के युवा लेखक डॉ. ब्रजेश द्वारा लिखे उपन्यास वृंदा (गाथा सदी की) का लोकार्पण डॉ. रामशरण जोशी व सुरेश पण्डित ने किया। सत्र का संचालन करते हुए डॉ. प्रमिला सिंघवी ने कहा कि यह पुस्तक वृंदा गाथा सदी की में लेखक कथा नायक कान्त और नायिका वृंदा की प्रेम कथा हरिद्वार, मसूरी, बंगलौर, शाहजहापुर, गोरखपुर, होते हुए देश की सीमाओं से पार अमरीका का फ्रांस तक पहुँचती है। इसी प्रकार रचनाकार के सरोकार भी स्थानीय राष्ट्रीय एवं वैश्विक जगत के विषयों को छूते चले जाते हैं। उपन्यास जहाँ देश के साामजिक यथार्थ की पड़ताल करने का उपक्रम करता है वहीं एड फैरेसी को दुनिया रचकर स्वयं भविष्य के क्रोड में फाँकने की चेष्टा करता है जो हमें एच.जी. वेल्स या जार्ज ऑखेल की याद दिलाती है। डॉ. राम शरण जोशी ने कहा कि यह उपन्यास युवाओं के मन में चल रहे ध्वन्ध को प्रकट करता है। इस उपन्यास लेखक डॉ. ब्रजेश ने वन्दा और कान्त के प्रेम प्रसंग को दिखाते हुए समाज में व्याप्त बुराई पर भी चोट की है। डॉ. ब्रजेश ने युवाओं के माध्मय से जातिय विषमता, लिविंग इन रिलेशन, अमेरिका द्वारा हथियारों के उत्पादन और उसका इस्तेमाल जैसे कई प्रश्न खड़े किये है। डॉ. जोशी का मानना था कि अगर इस पुस्तक का सम्पादन ठीक से किया जाता तो यह पुस्तक और श्रेष्ठ बन सकती थी।
लेखक सुरेश पण्डित ने युवाओं के सामने चुनौतियों की चर्चा कतरे हएु कहा कि ज्ञान एवं सूचना के व्यापक स्रोत होते हुए भी युवाओं में सामाजिक चेतना, राजनैतिक परिपक्वता का अभाव है। सुरेश पण्डित ने इस उपन्यास पर भी व्यापक चर्चा की तथा डॉ. ब्रजेश के उपन्यास लिखने पर उनका उत्साह बढ़ाया।

समता लेखक सम्मेलन:-कैसा रहा और क्या होना चाहिये - सुरेश पण्डित
किसी व्यक्ति का नाम ठीक वैसा नहीं होता जैसा वह चाहता है क्योंकि जब नाम रखा जाता है वह इस योग्य नहीं होता है कि अपना नाम स्वयं चुन सके। अक्सर होता यह है कि ज्योतिषी यहां पण्डित लोग बच्चे के जन्म के समय की राशि के अनुसार नाम रखने का दायित्व निभाते हैं। जो माता-पिता बहुत अधिक धर्म भीरू नहीं होते या ज्योतिष पर विश्वास नहीं करते वे बच्चों के नाम अपनी इच्छानुसार भी रख लेते हैं। इस नामकरण पर शेक्सपीयर बहुत अधिक महत्व नहीं देते। इसीलिये वे अपने नाटक का नाम एज यू लाइक इट अर्थात् आप इसे जैसा पसन्द करें रखकर यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि आखिर नाम में क्या रखा हैं? दूसरों के द्वारा नाम रखे जाने के कारण वे कभी कभी व्यक्ति की योग्यता गुण या स्वभाव के अनुरूप नहीं होते। पर कई बार संयोग ऐसा होता है कि व्यक्ति अपने नाम को चरितार्थ करने लगता है यद्यपि ऐसा अपवाद स्वरूप ही होता है। उदाहरण के लिए मैं एक ऐसे व्यक्ति से आपको मिलाना चाहता हंू जो हर तरह की जिम्मेदारी को अपने लिये एक चुनौती के रूप में स्वीकारता है। उसकी हिम्मत पर आश्चर्य होता है क्योंकि वह यथानाम तथा गुण की उक्ति को सार्थक करता है। ‘हिम्मत सेठ’ जाहिर है कि हिम्मती तो है पर सेठ बिल्कुल नहीं। हां, दिल से उदार होने को यदि सेठ मान लिया जाये तो यह उदारता उनमें जरूर है।
कभी कभी ऐसा भी होता है कि व्यक्ति अपनी सीधी सादी जिन्दगी की लीक को छोड़कर एक ऐसी राह पर चल पड़ता है जिसे वह पसंद तो करता है पर होती वह खतरों भरी है और जिसकी मंजिल हर तरह के अनिश्चयों से घिरी रहती है। हिम्मत सेठ भी ऐसे ही कुछ व्यक्तियों में से एक हैं जो अच्छी भली हिन्दुस्तान जिंक की नौकरी को छोड़कर पत्रकारिता में आते हैं और वह भी एक सोचे समझे मिशन के साथ। एक छोटा सा पाक्षिक समाचार पत्र निकालते हैं और उसका नाम रखते हैं महावीर समता संदेश अर्थात् महावीर स्वामी जिस तरह की सामाजिक समता का आजीवन प्रचार करते रहे उसी को आगे बढ़ाने का काम यह समाचार पत्र करेगा। यह भी एक संयोग ही है कि यही उद्देश्य समाज वादी विचारधारा का भी है जिसके वे एक प्रतिबद्ध कार्यकर्ता है।
अपनी अटूट लगन और निःस्वार्थ सेवा भावना के कारण हिम्मत सेठ इसे ऐसे मुकाम पर ले आये हैं जिस तक पहुंचना निजी प्रयासों से बिना समझौता किये किसी पत्र के लिये आसान नहीं होता है। दरअसल यह समाचार पत्र नहीं एक आन्दोलन है इसीलिये यह हर वर्ग की मुसीबत में उसके साथ खड़ा दिखाई देता है। हर तरह के अन्याय अत्याचार के विरोध में यह आवाज ही नहीं उठाता, संघर्ष भी करता है। अब धीरे धीरे इस अरवबार ने एक संस्था का रूप ले लिया है। इससे न केवल उदयपुर के या राजस्थान के बल्कि देश के कोने कोने में रहने वाले बुद्धिजीवी, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और सामान्य पाठक भी जुड़ गये है। इसके हर साल कुछ ज्वलन्त मुद्दों को लेकर दो तीन विशेषांक निकालते है। इसकी ओर से शहर मेें और आसपास के गांवों, कस्बों में कुछ ऐसे आयोजन भी होते रहते हैं जिनमें स्थानीय लोगों के साथ साथ बाहर के बुद्धिजीवी व कार्यकर्ता भी भाग लेकर समाज और देश की दशा-दिशा पर विचार मंथन करते हैं।
उपरोक्त सारी गतिविधियों के अलावा यह समाचार पत्र पिछले तेरह वर्षों से एक समता लेखक सम्मेलन का आयोजन भी करता आ रहा हैं। पहले यह एक दिन का होता था और इसमें स्थानीय व राज्य के प्रमुख बुद्धिजीवी विचारक और लेखक भाग लेते थे बाद में सारे देश से लेखकों को आमंत्रित करना शुरू किया गया। जब बाहर से अधिक लोग आने लगे तो इसकी अवधि पहले दो दिन और फिर तीन दिन कर दी गई। अब तक आये अनेकों महानुभावों में राजेन्द्र यादव, रामशरण जोशी, राज किशोर, पंकज बिष्ठ, रघु ठाकुर, कमला प्रसाद, प्रभाष जोशी, रत्नाकर पाण्डे, नन्द किशोर, आचार्य, पूर्व सांसद सुरेन्द्र मोहन, पूर्व विधायक रमणीका गुप्ता, सुभाष गाताडे, अनिल चमड़िया, राजा राम भादू, शुभु पटवा, संतोष चौबे आदि शामिल है। नन्द चतुर्वेदी, एम.एस. अगवानी, हुक्मराज मेहता, डी एस पालीवाल, सुधा चौधरी, वेद व्यास, डॉ. एस.बी.लाल, डॉ. नरेश भार्गव, कहानीकार स्वयं प्रकाश, प्रो. राम बक्स, कमर मेवाड़ी, प्रमिला सिंघवी और इन पक्तियों में लेखक इस तरह के सम्मेलनों के स्थायी सम्भागी रहे है। हेमेन्द्र चण्डालिया महावीर समता संदेश के सम्पादक, स्तम्भ लेखक और इसके द्वारा किये जाने वाले हर आयोजनों के स्थायी सहकर्मी रहते हैं। इस टीम में और भी कुछ लोग ऐसे शामिल है। जो सहयोगी होने के बावजूद पर्दे के पीछे रहना पसंद करते हैं।
इस बार यह सम्मेलन 4, 5, 6, फरवरी 2011 को संपन्न हुआ। इसमें रत्नाकर पाण्डे, बज्रभूषण तिवारी और सुनीलम् की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। पहले दिन उद्घाटन सत्र में प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता सुनीलम् को समता लेखक का सम्मान प्रदान किया गया। स्मरणीय है कि पिछले कुछ सालों से हर बार एक विशिष्ट व्यक्ति को सम्मानित करने और अन्तिम दिन समापन सत्र का आयोजन किसी कस्बे में करने की परम्परा चालू हुई है। यह सम्मान अब लेखकों के लिये इस कारण स्वग्राही हो चला है क्योंकि इसके लिये अब तक चुने गये महानुभावों की पात्रता पर किसी ने ऐतराज नहीं जताया है। पहलेे दिन शाम को डॉ. राम मनोहर लोहिया स्मृति व्याख्यान प्रसिद्ध समाजवादी नेता एवं पूर्व सांसद ब्रजभूषण द्वारा दिया गया। इसकी अध्यक्षता समाजवादी चिंन्तक और वरिष्ठ कवि नन्द चतुर्वेदी ने की। दोनों के भाषण इतने सारगर्भित एवं प्रभावशाली थे कि इनमें किसे नम्बर एक पर रखा जाये यह तय कर पाना श्रोताओं के लिये कठिन हो गया था।
5 फरवरी का प्रथम सत्र भगतसिंह की स्मृति को समर्पित था। इसके मुख्यवक्ता ‘‘उदभावना’’ के सम्पादक अजेय कुमार थे और अध्यक्षता स्वतन्त्रता सेनानी हुक्मराज मेहता ने की थी। आरम्भ में संयोजक डॉ. सुधा चौधरी ने भगतसिंह द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों की वर्तमान समय में प्रासंगिकता पर खुलकर विचार करने के लिये उपस्थित श्रोताओं से आग्रह किया। अजेय कुमार ने भगतसिंह के ऐसे विचारों और कार्यों पर रोशनी डाली। जिनकी लोगों को आधी अधूरी जानकारी थी हुक्म राज मेहता ने समकालीन राजनीति की तीखी आलोचना की और भगतसिंह के विचारों को पुनः प्रतिष्ठा दिलाने की वकालत की। इसी दिन एक सत्र में युवा लेखक ब्रजेश के उपन्यास वृंदा गाथा सदी की तथा लोकार्पण प्रसिद्ध पत्रकार और समाज विज्ञानी रामशरण जोशी ने किया। पुस्तक की विस्तार से समीक्षा मेरे द्वारा की गई। इस चर्चा की संयोजक विशिष्ट लेखिका डॉ. प्रमिला सिंघवी द्वारा किया गया। उसी दिन एक सत्र में प्रसिद्ध टेªड यूनियनिस्ट व गुजरात मजदूर पंचायत अध्यक्ष पी. चिदम्बरम व जी.पी. मिश्रा ने अपने विचार रखे।
समापन सत्र उदयपुर जिले की झाड़ोल तहसील के कोल्यारी नामक गांव में रखा गया। स्थानीय लोगों द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम की विशेषता यह थी कि इसमें बहुत बड़ी संख्या में स्थानीय लोगांे ने भाग लिया। दो तीन घण्टे चले इस कार्यक्रम में लोगों को इसलिये चमत्कृत कर दिया क्योंकि यह अपने ढंग का आनोखा कार्यक्रम था।
अन्त में कुछ ऐसे सुझाव रखना चाहूंगा जिन्हें अगले सम्मेलनों में क्रियान्वित करने के बारे में सोचा जा सकता है। दो दिन लगातार चलाये जाने वाले सत्र कुछ अधिक बोझिल व अपाच्य हो जाते हैं। यह शायद इस लिये किया जाता है कि आने वाले सभी विशिष्ट लोगों को और स्थानीय महानुभावों को भी बोलने का अवसर दिया जा सके। इसका विकल्प यह हो सकता है कि एक दो सत्र परिचर्चा के रखे जाये और उनमें चार-चार या पांच-पांच लोगों का पैनल में रखा जाये। हर परिचर्चा का नियामक एंकर ऐसे व्यक्ति को बनाया जाये जो बहस को भटकने न दे और वक्ता की बात को लम्बा न होने दे। कोशिश यह भी होनी चाहिए कि पैनल के हर सदस्य को बोलने का अवसर मिल जाये।
सारे कार्यक्रम पूरी तरह से बौद्धिक होते हैं। इनसे थोड़ी राहत दिलाने और विविधता लाने के लिये एक दिन रचना गोष्ठी या कवि गोष्ठी रखी जा सकती है। कवि गोष्ठी में बाहर से आये किसी कवि का एकल काव्य पाठ या स्थानीय व बाहर के कवियों की कविताओं का प्रस्तुतीकरण और रचना गोष्ठी में किसी अच्छे लेखक की कहानी लघु कथा अथवा एंकाकी नाटक का पाठ हो सकता हैं इसी तरह एक रात्रि स्थानीय कलाकारों द्वारा अपनी नाट्य प्रस्तुति के लिये भी दी जा सकती है। ऐसी किसी स्तरीय फिल्म को भी दिखाया जा सकता है जो व्यावसायिक न हो। कुछ स्वयं सेवी संस्थाओं से भी आग्रह किया जा सकता है कि वे अपने कार्यों गतिविधियों की फिल्में दिखाये।
गांवों में होने वाले कार्यक्रम को भी अधिक सार्थक बनाया जा सकता है। इसके लिये जरूरी है कि सारे कार्यक्रम वहां के स्थानीय लोगों द्वारा ही रखे जाये। अतिथि दर्शक दीर्घा में गांवों के लोगों के साथ बैठे। गांवों की कला जैसे लोकगीत, लोककथा लोकनाट्य आदि की प्रस्तुति की व्यवस्था हो। स्थानीय लोगों द्वारा निर्मित हस्त शिल्प की वस्तुओं का प्रदर्शन व सेल का भी आयोजन हो सकता है। तात्पर्य यह कि कोई ऐसे आयोजन जरूर हो जिसमें शहरी और ग्रामीण लोग एक दूसरे के पास आने, परस्पर अन्य क्रिया करने का अवसर पा सके।मैं समझता हूं इनमें से जो भी सुझाव आसानी से बिना अतिरिक्त खर्चे के क्रियान्वित हो सके उन पर विचार किया जाना चाहिये।


पृथ्वी को बचाने के लिए मानव मात्र को अपनी जीवन शैली बदलनी पड़ेगी - सज्जन कुमार
11 वाँ राष्ट्रीय समता लेखक सम्मेलन तीसरे दिन के कार्यक्रम
उदयपुर जिला मुख्यालय से 70 कि.मी. दूर झाड़ोल तहसील के कोल्यारी गांव में सम्पन्न हुआ। राष्ट्रीय समता लेखक सम्मेलन की ग्रामीण अंचल से जोड़ने तथा ग्रामीणों की भी बड़ी मात्रा में भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए महावीर समता संदेश व राष्ट्रीय समता लेखक सम्मेलन के आयोजकों ने यह निर्णय लिया की समता लेखक सम्मेलन का अन्तिम दिन के कार्यक्रम का आयोजन किसी भी गांव में किया जाए। उसी के चलते इस वर्ष स्वतन्त्रता सेनानी क्रान्तिकारी मोतीलाल तेजावत की जन्म व कर्मस्थली कोल्यारी गांव में किया गया। समापन समारोह का यह आयोजन जन शिक्षण एवं विस्तार निदेशालय जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय, कल्याणी समग्र विकास परिषद व महावीर समता संदेश के संयुक्त तत्त्वावधान में किया गया।
सम्मेलन का एक सत्र विश्व पर्यावरण, पंचायतीराज में युवाओं की भागीदारी पर रखा गया था। सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए इंजी. सज्जन कुमार ने कहा कि विश्व पर्यावरण की स्थिति बड़ी खराब है विश्व के सारे वैज्ञानिक चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे है कि ऊर्जा का उपयोग कम नहीं किया तो पृथ्वी के नष्ट होने का संकट मुंह बाये खड़ा है। सज्जन कुमार ने कहा कि जब पृथ्वी ही नहीं बचेगी तो विकास का क्या करेंगे। संयुक्त राष्ट्र संघ ने कॉपन हैगन में विश्व के नेताओं को बुलाकर आगाह किया कि ऊर्जा का उपभोग इसी प्रकार चलता रहा तो। 50 से 70 साल में पृथ्वी का विनाश निश्चित है इसे कोई भी नहीं बचा सकता। अभी तापमान के दो सेन्टीग्रेड बढ जाने से इतनी बर्फ पिगलेगी की समुद्र के तटीय क्षेत्र पानी में डूब जाएंगे। उन्होंने कहा कि पृथ्वी को बचाने के लिए मानव मात्र को अपनी जीवन शैली बदलनी पड़ेगी।
गोष्ठी के दूसरे वक्ता आस्था संस्थान से अश्विनी पालीवाल ने कहा कि पंचायती राज में युवा की बहुत महत्वपूर्ण भागीदारी निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि पंचायती राज का नया कानून ग्राम सभा को बहुत सारे अधिकार देता है। गांव के विकास के काम अब ग्राम सभा तय करकेे प्रस्ताव जिला व राज्य सरकार को भेजेगी। ऐसे में ग्राम सभा में सभी ग्रामवासियों की भागीदारी सुनिश्चित करने का काम युवा कर सकते हैं। युवा ग्राम सभा में विकास के कामों के प्रस्ताव भी रख सकते हैं तथा पास कराने में भी सहयोग कर सकते हैं। नये प्रावधानों में 5 विभागों का काम भी पंयायती राज को दे दिया है। इसमें शिक्षा एवं स्वास्थ्य विभाग का काम बहुत महत्वपूर्ण है। स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई सम्बन्धित समस्याओं पर युवा ध्यान दे तो नई पीढ़ी का भविष्य सुखमय हो सकता है। इसी तरह वन अधिकार में वन जमीन का अधिकार भी दिया गया है। लेकिन पट्टे अभी भी नहीं मिले हैं। युवा इस कानून को लागू करने में आ रही रूकावटों को भी दूर करने में अपनी उर्जा का उपयोग कर सकते हैं।
गोष्ठी को जन शिक्षण एवं विस्तार निदेशालय जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के निदेशक डॉ. शंकर लाल शर्मा ने कहा कि राजस्थान विद्यापीठ सन् 1962 से पंच, संरपचों को पंयायती राज का प्रशिक्षण देता आ रहा है। उन्होंने कहा कि सत्ता के विकेन्द्रीकरण करने के लिए ही राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री मोहन लाल सुखाड़िया ने पंचायती राज के प्रावधान लागू किये। सर्व प्रथम 1959 में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नागौर में इसका शुभारम्भ किया। 1993-94 में संविधान में संशोधन करके नये प्रावधान जोड़े तथा 5 साल मेें चुनाव को अनिवार्य बनाया गया। इसके साथ ही। दलितों, आदिवासियों पिछड़ों व महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया।
गोष्ठी में युवा छात्र मानसिंह निनामा ने कहा कि जैसे महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है। उसी प्रकार युवाआंे एवं छात्र-छात्राओं की पंचायती राज में भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए भी युवाओं व छात्र-छात्राओं के लिए आरक्षण दिया जाये।समापन समारोह के मुख्य अतिथि एस.डी.एम. झाड़ोल विशाल दवे का स्वागत किया गया। इस समापन समारोह के साथ कल्याणी समग्र विकास परिषद के कार्यकर्ताओं का सम्मान समारोह का आयोजन भी किया गया। बाहर से आये अतिथि राष्ट्र सेवादल के महासचिव पटना से पधारे सच्चिदानन्द सिंह, सुरेश पण्डित, आस्था संस्थान के अश्वनी पालीवाल उदयपुर स्कूल ऑफ सोशल वर्क्स की राष्ट्रीय सेवा योजना की समन्वयक डॉ. वीना द्ववेद्वी, राजकीय मीरा कन्या महाविद्यालय की डॉ. प्रमिला सिंघवी, निदेशक डॉ. शंकरलाल शर्मा, इलाहाबाद से पधारे जी.पी. मिश्रा, ‘‘सब लोग’’ के मासिक दिल्ली के सम्पादक किशन कालजयी, अलवर से रेवतीरमण शर्मा, लखनऊ से लेखक ब्रजेश महावीर समता संदेश के प्रधान सम्पादक हिम्मत सेठ, चाइल्ड फण्ड इण्डिया के उदयपुर के निदेशक का भी शॉल ओढाकर स्वागत किया गया। इसके साथ ही संस्था के सचिव प्रवीण सरणोत अध्यक्ष वजेराम कसौटा, मुख्य प्रबन्धक एन.एस. भण्डारी का सम्मान एस.डी. एम. झाडोल ने शॉल ओढाकर किया। इस प्रकार संस्थान द्वारा 50 कार्यकर्ताओं को सम्मानित किया गया। सम्मेलन में भाग लेने वाले छात्र-छात्राओं व अन्य युवाओं को समारोह के अध्यक्ष सुरेश पण्डित व कल्याणी समग्र विकास परिषद संस्था के अध्यक्ष वजाराम कसौटा ने प्रमाण पत्र बांटे।
इसके पहले बलिया से पधारे एडवोकेट राम प्यारे सिंह के क्रान्तिकारी लोकगीत से सम्मेलन का प्रारम्भ हुआ। संस्था के सचिव प्रवीण सरनोत ने सभी अतिथियों का स्वागत किया तथा संस्था द्वारा किये गये ग्राम विकास के कार्यों, खादी एवं ग्रामो उद्योग व शैक्षिक कार्यों का संक्षिप्त विवरण दिया। महावीर समता संदेश के प्रधान सम्पादक हिम्मत सेठ ने लेखक सम्मेलन की श्रृंखला के उद्देश्यों की जानकारी दी तथा डॉ. हेमेन्द्र चण्डालिया ने 11 वे राष्ट्रीय समता लेखक सम्मेलन की रिपोर्ट प्रस्तुत की। समापन समारोह के अध्यक्ष लेखक, पत्रकार एवं समाजकर्मी सुरेश पण्डित ने अपने अध्यक्षीय भाषण में युवाओं की भागीदारी की सराहना करते हुए कहा कि महावीर समता संदेश के राष्ट्रीय समता लेखक सम्मेलन का महत्व इन युवाओं की भागीदारी के चलते ओर बढ जाता है। इस राष्ट्रीय समता सम्मेलन की धूम अब उदयपुर या राजस्थान में ही नहीं पूरे देश में मची हुई है। इस सम्मेलन में महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान से लोगों की भागीदारी इस बात का प्रमाण है। कल्याणी समग्र विकास परिषद के मुख्य प्रबंन्धक नाहरसिंह भण्डारी ने राष्ट्रीय समता लेखक सम्मेलन के समापन सत्र व संस्था के कार्यकर्ता का सम्मान समारोह के आयोजन पर प्रकाश डाला। संस्था के अध्यक्ष वजाराम जी कसौटा ने धन्यवाद ज्ञापित किया तथा संचालन कार्यकर्ता गोपाल भट्ट ने किया।पूरे समारोह के दौरान लगभग 300 लोगों ने अपनी सक्रिय भागीदारी निभाई इसमें से 100 युवा और नौजवान थे। 

सम्मेलन की रिपोर्ट प्रस्तुति:-
हिम्मत सेठ, डॉ. फरहत बानो,
डॉ. प्रेमिला सिंघवी, डॉ. प्रेमसिंह डाबी
डॉ. हेमेन्द्र चण्डालिया
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