अनिल सिन्हा के हित जन संस्कृति मंच, दिल्ली में शोक सभा - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

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अनिल सिन्हा के हित जन संस्कृति मंच, दिल्ली में शोक सभा

विगत 25 फरवरी को जाने माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे। 22 फरवरी को जब वे दिल्ली से पटना जा रहे थे, ट्रेन में उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ। उन्हें अचेतावस्था में पटना ले जाया गया. पटना के मगध अस्पताल में तीन दिनों तक जीवन और मौत से जूझते हुए उन्होंने 25 फरवरी को दिन के 12 बजे अन्तिम सांस ली।

अनिल सिन्हा एक प्रतिबद्ध लेखक व पत्रकार थे। उनका जन्म 11 जनवरी 1942 को जहानाबाद, बिहार में हुआ था। उन्होंने पटना वि. वि. से 1962 में हिंदी साहित्य में  एम. ए. किया था। विश्वविद्दालय की राजनीति और चाटुकारिता के विरोध में उन्होंने  पीएच डी का काम बीच में ही छोड़ दिया था। उन्होंने प्रूफ रीडिंग, प्राध्यापिकी, विभिन्न सामाजिक विषयों पर शोध जैसे कई कार्य किये। 70 के दशक में उन्होंने पटना से ‘विनिमय’ साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जो उस दौर की अत्यन्त चर्चित पत्रिका थी। आर्यावर्त, आज, ज्योत्स्ना, जन और दिनमान से वे जुड़े रहे। 1980 में जब लखनऊ से अमृत प्रभात निकलना शुरू हुआ तो  उन्होंने उस अखबार में काम किया।उसके बन्द होने के बाद में वे नवभारत टाइम्स में आ गये। दैनिक जागरण, रीवाँ के भी वे स्थानीय संपादक रहे। लेकिन वैचारिक मतभेद की वजह से उन्होंने वह अखबार छोड़ दिया।

अनिल सिन्हा बेहतर, मानवोचित दुनिया की उम्मीद के लिए निरन्तर संघर्ष में अटूट विश्वास रखने वाले रचनाकार रहे हैं। वे जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में से थे और जन संस्कृति मंच, उत्तर प्रदेश के पहले सचिव थे। फ़िलहाल वे जसम की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य थे।  वे क्रान्तिकारी वामपंथ की धारा तथा भाकपा (माले) से भी जुड़े थे। इंडियन पीपुल्स फ्रंट जैसे लोकप्रिय राजनैतिक मोर्चे के गठन में भी उनकी भूमिका थी। इस राजनीतिक जुड़ाव ने उनकी वैचारिकी का निर्माण किया था।कहानी, समीक्षा, अलोचना, कला समीक्षा, भेंट वार्ता, संस्मरण आदि कई क्षेत्रों में उन्होंने काम किया। ‘मठ’ नाम से उनका कहानी संग्रह पिछले दिनों 2005 में भावना प्रकाशन से आया। पत्रकारिता पर उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘हिन्दी पत्रकारिता: इतिहास, स्वरूप एवं संभावनाएँ’ प्रकाशित हुई। पिछले दिनों उनके द्वारा अनुदित पुस्तक ‘साम्राज्यवाद का विरोध और जतियों का उन्मूलन’ छपकर आया था। उनकी सैकड़ों रचनाएँ पत्र पत्रिकाओं में बिखरी हुई हैं।
साथियो, आइये क्रन्तिकारी वाम संस्कृति और राजनीति के इस अथक योद्धा साथी के बिछड़ जाने के दुःख में साझीदार होइए। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को याद करते हुए उनके वैचारिक सपनों को पूरा करने का संकल्प लीजिए।
स्थान- गाँधी शांति प्रतिष्ठान, ITO के पास, नयी दिल्ली,
तिथि- 3 मार्च  2011, समय- शाम 5 : 30 बजे.

  
संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन 
जन संस्कृति मंच, दिल्ली
समाचार 

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