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संस्कृति,बिरजू महारज जैसे कलाविदों से ज़िंदा है

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on रविवार, मार्च 06, 2011 | रविवार, मार्च 06, 2011



शिल्पग्राम के मुक्ताकाशी रंगमंच पर जैसे ही कथक सम्राट बिरजू महाराज ने शीश मुकुट कटि काचमी... पर प्रवेश किया तो दर्शक दीर्घा से तालियों की गडग़ड़ाहट से उनका अभिवादन हुआ। मंच पर भक्ति और मस्ती के रंगों की जुगलबंदी ने गजब ढा दिया। इसके बाद तो मंच की प्रस्तुतियां देख कला प्रेमियों और कलाकारों के बीच भी अजब जुगलबंदी का अहसास हुआ। कभी मेवाड़ के वीर प्रताप, कभी भक्ति की मिसाल मेवाड़ी मीरा, तो कभी कृष्ण और फागुन पर दी गई प्रस्तुति ने जैसे भक्ति और मस्ती की जुगलबंदी में चार चांद लगा दिए। अवसर था पंडित चतुरलाल स्मृति में आयोजित समारोह का। कार्यक्रम की शुरुआत में जहां पंडित चतुरलाल के पौत्र प्रांशु चतुरलाल ने तबला, वेस्टर्न ड्रम और टर्किश ड्रम डर्बुका के माध्यम से शास्त्रीय संगीत की ऊंचाइयां दर्शाई वहीं पंडित बिरजू महाराज और उनके दल ने कृष्ण लीला सादृश्य की।

मंच पर दिखी कृष्ण लीला : कार्यक्रम के दूसरे चरण में पंडित बिरजू महाराज की शिष्या शाश्वती सेन ने मंच पर अधरम मधुरम... की शानदार प्रस्तुति से शुरुआत की। उसके बाद मंच पर आए कथक सम्राट ने कृष्ण आराधना के विभिन्न स्वरूपों को प्रस्तुत करते हुए शीश मुकुट कटि काचमी... के माध्यम से शृंगार का वर्णन किया। उसके बाद उन्होंने तीन ताल में शुद्ध नृत्य के माध्यम से विलंबित, मध्यम और द्रुत लय की प्रस्तुति दी। उन्होंने नायक का नायिका के प्रति प्रेम, बचपन जवानी और बुढ़ापे तथा पक्षियों के विभिन्न स्वरों को घुंघरुओं के माध्यम से मंच पर प्रस्तुत किया। उसके बाद महाराज ने मोरी गगरिया काहे को फोरी रे श्याम, मैं तो गारी दूंगी, ना बोलूंगी... ढींट लंगर... की प्रस्तुति दी। कृष्ण के बाल रूप तथा माखन चोरी के प्रसंग को मंच पर प्रस्तुत किया। अगले चरण में पंडित की पुत्री ममता महाराज और उनकी शिष्या नतालिया हिल्डकर (अमेरिका निवासी) ने बाजत ताल घामर... पर प्रस्तुतियां दीं। मीरा के भजन श्याम बीना सखी रहियां णा जावां... की प्रस्तुति ने भी दर्शकों की तालियां बटोरी। अंत में महाराज ने देखो होरी खेलइंया कैसे बन बन आए... प्रस्तुति से कार्यक्रम को विराम दिया.

ताल चक्र में मोहा मन
प्रांशु चतुरलाल ने पेशकार से प्रस्तुतियों का आगाज किया। उसमें उन्होंने विलंबित, मध्यम और द्रुत ताल का मिश्रण श्रोताओं के समक्ष रखा। उसके बाद कायदा और अपने दादा द्वारा निर्मित खंड जाति पेशकार में पांच तालों का अद्भुत मिश्रण प्रस्तुत किया। उस्ताद अहमदजान थीरवा के रेला उस्ताद हमीर हुसैन खां की मध्य लय पर शिरकत की। उसके बाद द्रुत तीन ताल में प्रस्तुतियां देकर दर्शकों का मन मोहा। प्रांशु की प्रस्तुति की विशेष बात यह रही कि उन्होंने तबला, वेस्टर्न ड्रम तथा टर्किश ड्रम डर्बुका के माध्यम से शास्त्रीय संगीत के विभिन्न पैमानों को प्रस्तुत किया। प्रांशु ने बताया कि वेस्टर्न संगीत में तबले के माध्यम से उन्होंने साबित किया की आज भी शास्त्रीय संगीत के मुकाबले कोई संगीत नहीं है।
सौजन्य:-दैनिक भास्कर 
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