रियाज़ बिना सब सुना:-विदुषी शुभा मुदगल - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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रियाज़ बिना सब सुना:-विदुषी शुभा मुदगल

 एक जमाने में आम औरत के लिए गाना बहुत मुश्किल काम था। खासतौर पर उनके लिए जो किसी घराने से नहीं जुड़ी थीं। फिर ऐसा समय आया लड़कियों को संगीत एक एडीशनल हुनर के तौर पर सिखाया जाने लगा।एक अच्छी पत्नी होने की सामग्री जुटाते हुए जिन गुणों की जरूरत होती संगीत भी उनमें से एक गिना जाने लगा। हॉबी या करियर के तौर पर संगीत सीख सकते हैं, उसे जीवनभर जी सकते हैं और सिर्फ गाते हुए कोई मकबूलियत के शिखर पर पहुंच सकता है, ये सब बातें महिलाओं के जीवन में काफी बाद में आईं।

मेरा परिवार अकादमिक श्रेष्ठता का हामी होने के बावजूद मेरे फैसलों को पर्याप्त सम्मान देता था। यही सम्मान और तालीम मेरे आगे बढऩे में मददगार बनी।मेरी शिक्षा में सीखना पहले था, परफॉर्मेंस उसके बाद। जबकि इन दिनों जो ट्रेंड आया है उसमें परफॉर्मेंस पर जोर दिया जाने लगा है। बच्चे चार दिन सीखते हैं और पांचवें दिन शोहरत चाहते हैं।टीवी पर आने वाले संगीत पर आधारित कार्यक्रमोंं की बात करें, तो मैं साफ कहूंगी कि उन्होंने संगीत को प्रमोट किया होगा, तालीम को नहीं। संगीत में औपचारिक शिक्षा को गंभीरता से नहीं लिया जाता। इसके लिए जो परिपक्व सोच और नजरिया चाहिए, वह कहीं नहीं दिखता।इसके बावजूद महिलाओं का संगीत में दखल काबिलेतारीफ है। 

मेरा मानना है कि संगीत सिखाने के लिए आप किसी के साथ जबर्दस्ती नहीं कर सकते। इसे औपचारिक शिक्षा की तरह डील करने से बचना होगा।संगीत अलग-अलग तरह से लोगों को छूता है।किसी को बच्चे की स्कूल परफॉर्मेंस में संगीत दिख जाता है तो किसी को टैलेंट शो के विजेता में। कोई इसे जीवन में उतार कर साधना में लीन होना चाहता है तो कोई आंख बंद कर इसे जी भर पी लेना चाहता है।इसके रंग अनेक हैं, लेकिन उनके मूल में जो एकरूपता है वह है तालीम का बीज।बहुत जरूरी है संगीत को विधिवत सीखकर उसे निरंतर रियाज से निखारते जाना। और ये बात संगीत ही नहीं, हर उस क्षेत्र में लागू होती है जहां आप सफल होना चाहते हैं या आगे बढ़कर किसी मुकाम को हासिल करना चाहते हैं

सौजन्य:-दैनिक भास्कर 

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