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अश्वनी शर्मा की एक ज़रूरी ग़ज़ल

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on बुधवार, मार्च 23, 2011 | बुधवार, मार्च 23, 2011


अश्वनी शर्मा  
राजस्थान प्रशासनिक सेवा अधिकारी 
11/177,भृगु पथ 
मानसरोवर,जयपुर 
सूर्य प्रकाशन मंदिर,
बीकानेर से 1999 में 
प्रकाशित कृति-
 ग़ज़ल संग्रह,'अँधेरे की चीख'
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वो कहते है जीवन का आधार नहीं है
मैं कहता हूँ कोई सलीकेदार नहीं है
 
जो सिक्कों में बदल नहीं पाया वजूद को 
ये निश्चित है बंदा दुनियादार नहीं है
 
रिश्ते नाते,कसमे वादे,देव पुजारी 
क्या बाकी है जिस का कि व्यापार नहीं है
 
जो सपनों कि ताक़त पर जीना चाहे है
क्या पायेगा सपनों का आकार नहीं है
 
सत्यानाशी के जंगल को क्या कोसेंगे 
पेड़ कौन सा है जो कांटेदार नहीं है
 
अगर मुहब्बत ही जीने कि शर्त्त बने तो 
बहुतेरों को जीने का अधिकार नहीं है
 
खुली किताबों जैसे जब जी चाहे पढ़ लो 
मंजे हुए किरदारों जैसे यार नहीं है  
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1 टिप्पणी:

  1. अगर मुहब्बत ही जीने की शर्त्त बने तो
    बहुतेरों को जीने का अधिकार नहीं है.....वाह अश्वनी जी....ये आपका अपना... अलग अंदाज़.....बहुत ख़ूब..

    उत्तर देंहटाएं

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