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युवाओं को वैचारिक व बौद्धिक गुलामी से बाहर लाना सबसे बड़ी चुनौती - डॉ. सुनीलम्

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on रविवार, मार्च 13, 2011 | रविवार, मार्च 13, 2011


11 वाँ राष्ट्रीय समता लेखक सम्मेलन
सम्मेलन के औपचारिक उद्घाटन के अवसर पर डॉ. सुनिलम को राष्ट्रीय समता सम्मान से सम्मानित किया गया। डॉ. रत्नाकर पाण्डे पूर्व सांसद ने डॉ. सुनिलम को शॉल ओढाकर सम्मानित किया तो डॉ. मधुसुधन शर्मा ने सम्मान पत्र अर्पित किया। सम्मान पत्र का वाचन अंगद दैनिक बुंदी के प्रधान सम्पादक मदन मदिर ने किया तथा प्रतिक चिह्न महावीर समता संदेश के प्रधान सम्पादक हिम्मत सेठ ने भेंट किया। समाजवादी चिंतक डॉ. सुनीलम् का परिचय देते हुए अर्जुन देथा ने बताया कि वे पूर्व से पश्चिम व उत्तर से दक्षिण पूरे भारत के किसानों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले योद्धा है। कई बार जेल जा चुके, दो बार मुल्तई-म.प्र. से विधायक रहे किसान नेता के जीवन के लक्ष्य को शाह अब्दुललतीफ थिराई के एक शेर द्वारा अभिव्यक्त किया। ऐ अल्लाह तू सूर्योदय बाद में करना। पहले अन्न उगाने वालों के लिए अन्न का इंतेजाम करना।
डॉ. सुनीलम 
डॉ. सुनीलम् ने अपने व्याख्यान में बताया कि 7.30 अरब की दुनिया की आबादी में से 3 अरब लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे है। दुनिया की 500 बड़ी कंपनियों का कुल विश्व की 70 प्रतिशत जी.डी.पी. पर कब्जा है। इस नई आर्थिक नीति से बढ़ी असमानता का परिणाम है। धार्मिक कट्टरवाद, आतंकवाद व बढ़ती बेरोजगारी जहां एक ओर डब्ल्यूटीओ का उद्देश्य विश्व से बेरोजगारी हटाने के लिये प्रचारित किया गया था वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत यह है कि विश्व में 1.20 अरब लोग बेरोजगार है। हमारे देश में वैश्वीकरण की नीतियों के पश्चात् जहां एक ओर 5 लाख से अधिक किसान आत्महत्या कर लेते हैं। अर्थात् गरीबी भूखमरी, लाचारी के शिकार है वही दूसरी ओर एक लाख लोग खरबपति की श्रेणी में आ जाते हैं। जिले नक्सली, माओवादी या अन्य प्रकार की हिंसा के कारण काबू से बाहर हैं।

बार-बार यह भ्रम होता है कि भारत में युवा नेतृत्व सत्ता संभालने के कगार पर खड़ा है। लोकसभा व राज्यसभा जैसे अग्रणी संस्थानों में बुजुर्गों से युवाओं को सत्ता का हस्तातरण हो जाने वाला है। गौर करने पर हम पाते हैं कि किन युवाओं को सामने रखकर यह बात फैलाई जा रही है वे सब अरबपति परिवारों के युवा है वे गरीब युवाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करते। गांव के युवा का तो जिक्र भी नहीं होता। युवाओं का संकट यह है कि वह बड़े अंतविर्रोधों में जी रहा है। उसके आदर्श वे नेता हैं जिन्होंने अपना सर्वस्व न्यौछावर किया लेकिन दूसरी ओर अपना केरियर सबसे पहले बनाना उसकी प्राथमिकता भी है अपनी तरक्की उसका सपना भी है। अब साधन की पवित्रता अहम् नहीं मानी जाने लगी। हमारे युवाओं का यह सामूहिक सपना यथास्थितिवाद व पूंजीवाद को ही पोषित करेगा। आज का युवा यह नहीं समझ पा रहा है कि इस प्रकार के अंतर्विरोध वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था के हैं। युवाओं को आन्दोलित होना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि 1977 सम्पूर्ण क्रान्ति का आन्दोलन में जय प्रकाश नारायण की अगुवाई में युवाओं द्वारा ही आन्दोलित हुई थी।

देश में हो रहे बड़े बड़े घोटालों पर बोलते हुए डॉ. सुनीलम ने कहा कि क्यों नहीं भ्रष्टाचार के मामले निपटाने के लिए विशेष अदालतें बनाई जाए, जो 2-5 महीनों में जांच कर जुर्म साबित हो जाने पर संपत्ति जब्ती के निर्णय दें। डॉ. सुनिलम् जोर देकर कहा कि आर्थिक अपराधी को भी जैल में डालने का प्रावधान होना चाहिए। वर्तमान में केवल पेनाल्टी लगाकर छोड़ देते है। जो सरासर अन्याय है। आज के दौर में अधिकतम विकास का ढांचा वह माना जाता है। जिसमें पूंजीवाद तकनीकी व उर्जा का इस्तेमाल अधिक से अधिक हो एवं व्यक्ति की आवश्यकता कम से कम। आज की जीवन शैली का ही परिणाम है तापमान में वृद्धि जिसके कारण मौसम का चक्र अनिश्चित हो गया है। इससे फसले चौपट होती जा रही है अब 2 सेन्टीग्रेड तापमान बढ़ने से पूरी मानव जाति के लिए खतरा पैदा कर देगा। इस प्रकार की आपदा से बचने का एकमात्र उपाय है। जीवन शैली में परिवर्तन उपभोग के स्तर को कम करना है। युवा पीढ़ी को विकल्पों पर विचार करना ही होगा क्योंकि अमेरीका या यूरोप का विकास का मॉडल भारत में नहीं चलेगा। न्यूयार्क की प्रलोभित करने वाली जीवन शैली की सच्चाई भी यह है कि 2-2 घण्टे जाम लगे रहते हैं। बूढे माता-पिता घर से बाहर अकेले नहीं निकल सकते। मानसिक रोगों की मात्रा व बैचेनी बढ़ी है। भारत में एक ओर एक ऐसा सभ्य तबका पैदा हो रहा है जो चेरिटी करता है। आध्यात्म से जुड़ा है उसे गुस्सा आना बंद हो गया है। हमें अन्याय के खिलाफ गुस्से का प्रदर्शन बंद न करके उसे करने की आवश्यकता इसलिए है  ताकि गैर बराबरी के खिलाफ जंग में हिंसा विकल्प नहीं हो जाय क्योंकि राज्य की हिंसा के सामने व्यक्ति या छोटे समूह की हिंसा टिक नहीं सकती फिर समूह भी बंटे हुए हैं।
डॉ. लोहिया की सप्त क्रांति का जिक्र करते हुए डॉ. सुनीलम ने कहा कि व्यवस्थावादी हिन्दुस्तान का चरित्र बिल्कुल असमानता मूलक है। वर्गविहीन समाज की रचना करने वालों को तीन मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा पूंजीवाद, जातिवाद व भाषावाद क्योंकि अंग्रेजों के बाद भाषा ने भी आज के दौर में एक विकट समस्यात्मक समाज की रचना की है। लोहिया की किताब निराशा के कर्त्तव्य का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि युवाओं को वैचारिक व बौद्धिक गुलामी से बाहर लाना होगा।
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..उन्होंने कहा कि विश्व व्यवस्था को बदलने की ऐतिहासिक आवश्यकता है जिसे पूरा करने के लिए अधिक से अधिक युवाओं को आगे आने की जरूरत है तथा केवल मैं पर केन्द्रीत होने के बजाय हम पर सम्पूर्ण समाज, देश और मानवता पर केन्द्रीत करने की जरूरत है। डॉ. सुनिलम् ने युवाओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि कोई भी परिवर्तन केवल संघर्ष से सम्भव नहीं है। परिवर्तन कामी लोगों को संघर्ष तो करना ही पड़ेगा लेकिन परिवर्तन के संघर्ष के साथ-साथ रचनात्मक कार्य तथा चुनावी प्रक्रिया को जोड़ा जाए। अर्थात् डॉ. लोहिया की शैली में वोट-फावड़ा, जैल तथा सप्त क्रान्ति के रास्ते सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह पर चलकर ही नई विश्व व्यवस्था बनाई जा सकती है।
इसके पहले महावीर समता संदेश के प्रधान सम्पादक ने अतिथियों का स्वागत किया तथा समता संदेश द्वारा अब तक आयोजित राष्ट्रीय समता लेखक सम्मेलन के उद्देश्यों के बारे में प्रकाश डाला। उन्होंने ..कहा कि समाज व पाठकों के साथ संवाद बनाये रखने हेतु राष्ट्रीय समता लेखक सम्मेलन का आयोजन महत्वपूर्ण है। उन्होंने बाहर से आये हुए अतिथियों का परिचय देते हुए कहा कि लगभग 40 लेखक, साहित्यकार, कवि उदयपुर के बाहर से इस सम्मेलन में भाग लेने आये हैं।
पटना बिहार से राष्ट्र सेवा दल के राष्ट्रीय महा सचिव सचिदानन्द सिंह, बलिया उप्र से एडवोकेट राम प्यारे सिंह, लखनऊ से लेखक ब्रजेश, इलाहाबाद से रेल्वे से सेवा निवृत एवं मजदूर नेता जी.पी. मिश्रा, दिल्ली से सब लोक के सम्पादक किशन कालजयी, संवदे की प्रबन्ध सम्पादक कुमकुम कालजये, समाजवादी पार्टी के उपाध्यक्ष तथा पूर्व सांसद, बृजभूषण तिवारी, पूर्व सांसद व साहित्यकार रत्नाकर पाण्डे, डॉ. रामशरण जोशी, उदभावना के सम्पादक अजय कुमार, भीवाड़ी से रेनुका अस्थाना, मुल्तई म.प्र. से डॉ. सुनिलम्, कोलापुर महाराष्ट्र से बालसाहब, पूना से राष्ट्र सेवादल के राष्ट्रीय अध्यक्ष भरत नाटकर, गुजरात मजदूर पंचायत के अध्यक्ष पी चिदम्बरम, पंजाब से इंजी सज्जन कुमार, गुजरात से पियुष भाई अम्बू भाई व अन्य साथी अलवर से सुरेश पण्डित, रेवती रमण शर्मा एवं गरिमा शर्मा, विजय नगर से अनन्त दाधिच, भीलवाड़ा से प्रमोद जोशी, बूंदी से अंगद के प्रधान सम्पादक मदन मंदिर, नाथद्वारा से जी.के. सुखवाल, देसुरी से सोहन लाल भाटी, चित्तौड़गढ़ से हस्तीमल कोठारी कोल्यारी से नाहरसिंह भण्डारी का परिचय करवाया।
इसके साथ ही डॉ. राम मनोहर लोहिया जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर महावीर समता संदेश द्वारा प्रकाशित व प्रो. नन्द चतुर्वेदी हिम्मत सेठ, एडवोकेट ईश्वरचन्द भटनागर, डॉ. नरेश भार्गव व डॉ. हेमेन्द्र चण्डालिया द्वारा पुस्तक ‘‘शतायु लोहिया’’ का विमोचन किया गया। पुस्तक विमोचन के अवसर पर बृजभूषण तिवारी पूर्व सांसद, प्रो. नन्द चतुर्वेदी, मदन मंदिर व डॉ. लोहिया के साथ कार्य कर चुकी हबीबा बानु तहसीन भी मंच पर उपस्थित थी। पुस्तक विमोचन की इस कड़ी में महावीर समता संदेश द्वारा प्रकाशित पुस्तक मुस्लिम समाज और शिक्षा व दीपावली व नववर्ष विशेषांक का भी विमोचन किया गया।
सम्मेलन को विशिष्ट अतिथि राष्ट्र सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष भरत नाटकर ने भी सम्बोधित किया। विज्ञान महाविद्यालय मो.ला. सुखाड़िया विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. मधुसुदन शर्मा ने उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कहा कि युवाओं को नेतृत्व छिन्न ना होगा। युवाओं में प्रतिरोध की चेतना विकसित करना जरूरी है। केवल हां में हां मिलाने से युवाओं का भला होने वाला नहीं है। सरवत खान ने धन्यवाद ज्ञापित किया। सम्मेलन के प्रारम्भ में गुजरात से आये लोक कलाकार पीयूष भाई, अम्बू भाई समूह ने देश भक्ति और क्रान्तिकारी गीतों से सम्मेलन का आगाज किया। सम्मेलन में स्वतन्त्रता सेनानी हुकुमराज मेहता, इंजी महेन्द्र प्रताप बया, समाजकर्मी शान्तिलाल भण्डारी, गीतकार किशन दाधिच, डॉ. ए.एल. दमामी, पीसी जैन, डॉ. सौभाग्यवती जैसे गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

सम्मेलन की रिपोर्ट प्रस्तुति:-
हिम्मत सेठ, डॉ. फरहत बानो,
डॉ. प्रेमिला सिंघवी, डॉ. प्रेमसिंह डाबी
डॉ. हेमेन्द्र चण्डालिया
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