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बिलासपुर में संपन्न ‘फिर फिर नागार्जुन’ की आयोजन रपट

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on बुधवार, मार्च 09, 2011 | बुधवार, मार्च 09, 2011

बिलासपुर

बाबा गिरोहों में नहीं, जनता में क्रांति चाहते थे – अजय तिवारी
 प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा बाबा नागार्जुन की जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी विमर्श फिर फिर नागार्जुन का दो दिवसीय का आयोजन अपने समय के महत्वपूर्ण कवि श्रीकांत वर्मा और आलोचक प्रमोद वर्मा की नगरी बिलासपुर के राघवेन्द्र सभागार में 27-28 फरवरी को ऐतिहासिक सफलता के साथ संपन्न हुआ ।

संस्थान वाद, गुट, आग्रहों से परे - विश्वरंजन
अपने स्वागत भाषण में संस्थान के अध्यक्ष श्री विश्वरंजन ने बाबा नागार्जुन की रचनाओं के बहाने उनकी वास्तविक जनतांत्रिक मूल्यों की चिंता दृष्टि एवं सृष्टि, शिल्प, भाषा का ज़िक्र करते हुए कहा कि नागार्जुन की कविता के समक्ष लगभग सारी काव्य-सिद्वियाँ बौनी प्रतीत होती है। उन्होंने यह भी कहा कि हमारा संस्थान प्रजातांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्व है किन्तु उसे न किसी से परहेज़ है, न ही गुरेज़ । संस्थान के कार्यक्रम किसी भी वादगुटसंगठन से परे है। संस्थान हर तरह के विचारधारों पर विश्वास करनेवाले साहित्यकारों को सम्मान व सम्यक अवसर देता है। उन्होंने बहुत ज़ल्द फ़ैज अहमद फ़ैज़ व केदारनाथ अग्रवाल पर भी राष्ट्रीय आयोजन करने की जानकारी भी दी ।
प्रो. जगमोहन मिश्र का सम्मान
उद्धाटन के पश्चात वयोवृद्ध शिक्षाविद्, लेखक और निबंधकार श्री जगमोहन मिश्र को उनके विशिष्ट योगदान के लिए प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान से सालश्रीफल व स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया गया।
8 कविता संग्रहों का पहला सैट लोकार्पित
इस अवसर पर बाबा नागार्जुन पर केंद्रित एकाग्र फिर फिर नागार्जुन’ (संपादक-विश्वरंजन) जारी किया गया साथ ही संस्थान द्वारा प्रकाशित समकालीन हिंदी कविता के महत्वपूर्ण कवियों के कविता संग्रह का पहला सेट जारी किया गया। ये कविता संग्रह है-बेतरतीब’ कवि (प्रभात त्रिपाठी, रायगढ़), ‘सीढ़ी उतरती है अँधेरे गर्भ गृह में’ (विश्वजीत सेन, पटना), ‘भूलवश और जानबूझकर’ (नासिर अहमद सिकंदर, भिलाई), ‘अबोले के विरूद्ध(जयप्रकाश मानस, रायपुर), ‘राजा की दुनिया’ (बी.एल.पाल, दुर्ग), ‘किताब से निकलकर प्रेम कहानी’ (कमलेश्वर साहू, दुर्ग), ‘चाँदनी थी द्वार पर’ (सुरेश पंडा,रायपुर)।
इसके अलावा संस्थान द्वारा ही प्रकाशित आलोचनात्मक कृतियों युग की नब्ज़(श्रीप्रकाश मिश्र, इलाहाबाद), ‘हिंदी के श्रेष्ठ आख्यानक प्रगीत’ (डॉ. बलदेव, रायगढ़), ‘साहित्य और सहभागिता’ (वारीन्द्र वर्मा, बिलासपुर), ‘समय का सूरज’ (चेतन भारती, रायपुर)इस मौक़े पर संस्थान की त्रैमासिक पत्रिका पाण्डुलिपि’ के तीसरे अंक के साथ-साथ लघुपत्रिकादेशज’ (संपादक-अरुण शीतांश) के आलोचना अंक (अतिथि संपादक-जयप्रकाश मानस) वसाहित्य वैभव’ (संपादक डॉ. सुधीर शर्मा) का भी विमोचन किया गया।

विकास के विरोध में हिंसा कहाँ तक वैध है? – अजय तिवारी
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रसिद्ध आलोचक अजय तिवारी ने कहा कि नागार्जुन ने विरोध करना सिखाया है। अविवेकअनीतिअत्याचार जहाँ है वहाँ विरोध है। सरकार और सत्ता का विरोध कभी-कभी सुविधा भी देता है। हिंसा के जवाब में प्रतिहिंसा ज़रूरी है लेकिन विकास के विरोध में हिंसा कहाँ तक वैध हैनागार्जुन ने यही विवेक दिया है कि गिरोहों में नहीं विशाल जनता में क्रांति का बिगुल बजाया जाता है। बाबा ने कहा है कि मैं जनकवि हूँ, हकलाता नहीं, सत्य कहता हूँ। प्रतिहिंसा है स्थायी भाव। हमें जानना चाहिए कि नागार्जुन का देश एवं काल बहुत विस्तृत है।

विशिष्ट अतिथि प्रो. गंगा प्रसाद विमल ने कहा कि हम नए विमर्श का सामना करेंगे। लोक की व्यक्ति पर मुहर लगाई है-लोक-अविश्वास बराबर नागार्जुन होता है। उन्होंने बाबा के विभिन्न भाषाओं पर में दीप्त विचार व दर्शन पर विस्तृत चर्चा की।प्रथम दिवस के तृतीय सत्र (‘बाबा को याद करते हुए’) में आमंत्रित साहित्यकार सर्वश्री श्रीभगवान सिंहश्रीप्रकाश मिश्रडॉ. रघुवंशमणिपरितोष चक्रवर्तीभारत भारद्वाजरमेश खत्रीअमित झाजयशंकर बाबू, शिवदत्त बाघवेलश्री आनंद मदोहीडॉ. शैलेन्द्र कुमार त्रिपाठी आदि ने बाबा से जुड़े रोचक और मार्मिक संस्मरण सुनाया । इन संस्मरणों में बाबा के व्यक्तित्व के विभिन्न और महत्वपूर्ण पहलू उजागर हुए।

अध्यक्ष मंडल से भी रमेश दवे ने कहा कि शब्द पुरूष का शताब्दी वर्ष मनाते हुए भावावेश में आये और तटस्थ हुए बग़ैर जनकवि को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनकी तरह जीने का माद्दा रखें । बाबा के लिए संवेदना को जन की अनुभूतियों में उतार देना ही शर्त है। बाबा आलोचकों की परवाह नहीं करते थे वे जानते थे कि कविता के सही मूल्यांकन का स्त्रोत आखिर जन ही होता है। नागार्जुन की कविता आत्मबोध नहीं संबोध की कविता है। डॉ. अजय तिवारी ने कहा कि उतने अच्छे ढंग से विश्वविद्यालयों जैसी जगहो में भी बातें नहीं की जाती है। कोरा उपदेश पाखंड होता है। नागार्जुन ने विषमता पर ताउम्र कविता लिखीं । वे विषमता का निष्क्रिय विरोध नहीं करते थे। विचार रचना में जितने छिपे हुए आते हैं उतना ही सौदर्य बोध होता है। बिना आत्मसंघर्ष के विवेक जागृत नहीं होता। नागार्जुन विवेक जगाने वाले कवि थे। डॉ. विजय बहादुर सिंह ने अपने उदबोधन में कहा कि भारत की सबसे बड़ी कविता करूण से लिखी गईं है । नागार्जुन करूणा और गहरी मानवीय संवेदना के लेखक है। सत्र के समापन पर स्व. प्रमोद वर्मा की पत्नी डॉ. कल्याणी वर्मा द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया।

प्रथम दिवस के अंतिम सत्र वाणी में आमंत्रित कवयित्रियों में जया जादवानी,किरण अग्रवालमीता दासप्रभा सरसविद्या गुप्ताजया द्विवेदीरानू नागआभा श्रीवास्तव,गीता विश्वकर्मासुषमा श्रीवास्तव आदि द्वारा काव्य-पाठ किया गया। संचालन युवा कवि नासिर अहमद सिकंदर ने किया।

भारतीयता का मतलब सिर्फ़ न्याय नहीं होता
दूसरे दिन प्रथम सत्र बाबा का गद्य सत्र में द्वारा बाबा की कहानीउपन्यास,निबंधपत्र आदि गद्यात्मक विधाओं को केंद्र में रखकर आमंत्रित रचनाकारों, आलोचकों द्वारा बातचीत की गई। आलोचक डॉ. प्रफुल्ल कोलख्यान (कोलकाता) ने कहा कि रचनाकार के निर्माण में संपूर्ण समाज का योगदान होता है। कविता के पीछे (गद्य) आख्यान होता है। नागार्जुन के हर कविता में एक गद्य (आख्यान) विचार रहा है। छत्तीसगढ़ी का लेखक संवेदना से छत्तीसगढ़ी ही होता है चाहे वह अन्य किसी भी भाषा में लिखता हो। इसलिए नागार्जुन हिंदी में मैथिली ही लिखते थे। गीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र (देहरादून) ने बाबा के गद्य के स्त्रोतों पर चर्चा की, राहुल सांस्कृत्यायन से जुड़े होने के कारण उनके गद्य के स्वभाव में आये बदलाव का ज़िक्र भी किया। उन्होंने कहा कि अपनी रचना में नागार्जुन रेणु से एक क़दम भाषा प्रसार में आगे हैं। आलोचक डॉ. देवराज ने कहा कि जन विरोधों को सीधे-सीधे अस्वीकार मत करो, नागार्जुन की कविता एवं गद्य यही सिखाता है। प्रतिरोध को समझदारी से विकसित और विस्तारित करना बाबा सिखाते थे।

आलोचक-कवि श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा कि रतिनाथ की चाचीकुंभीपाक अपने मूल स्वर में स्त्रीवादी उपन्यास है। युवा आलोचक डॉ. रघुवंश मणि ने अपने उद्बोधन में कहा कि परंपरा का एक तरह से चुनाव होता है भारतीयता का मतलब न्याय नहीं होता है नागार्जुन ने अपने लेखन में भिन्न चुनाव किया। निराला से प्रेरणा ली, निराला को क्रिएट करने का प्रयास किया। यहाँ से नागार्जुन की विचारधारा को समझा जा सकता है। सुपरिचित कवि श्री उद्भ्रांत(दिल्ली) ने कहा कि बाबा की भाषा जन सामान्य की भाषा है अज्ञेय की भाषा नहीं है । युवा आलोचक पंकज पराशर (अलीगढ़) ने अपने वक्तव्य में बाबा की हिंदी गद्य रचनाओं के अन्य भाषा में लिखी गई रचनाओं की महत्ता को विद्यापतिग़ालिब लेखक के बहाने आँकने का प्रयास किया।

इस सत्र में समीक्षक राजेन्द्र उपाध्याय(दिल्ली)आलोचक डॉ. बल्देव(रायगढ़)युवा कवि अरूण शीतांश(आरा) भी ने अपने विचार रखे। अजय तिवारी ने कहा कि उनकी गद्य रचना नि:संग है और कुछ बिंदुओं को छोडक़र रामविलास शर्मा से निकट है। नागार्जुन मैथिली को अलग भाषा मानते हैं लेकिन शर्मा हिंदी की भाषा । नागार्जुन अपनी रचना में काल्पनिक समाधान की ओर नहीं जाते इसलिए नागार्जुन के उपन्यास प्रासंगिक रहेंगे। नागार्जुन आधुनिक हैं, कबीर प्रगतिशील थे परंतु आधुनिक नहीं है। विजय बहादुर सिंह ने हिंदी कथा साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकारों के बहाने से बाबा के उपन्यासों पर बात की। वे बाबा के गद्य पर बात करते हुए देश के प्रतिष्ठित रचनाकारों की रचनात्मकता का भी स्मरण कराते रहे। उन्होंने कहा कि बाबा का उपन्यास जमनिया का बाबा’ गढ़ाधीशों के ख़िलाफ़ है तो दुख:मोचन में राजनीति व आदर्शवाद सब कुछ है। उन्होंने बलचनमा’ व उग्रतारा’ पर भी विस्तार से अपनी बात रखी। इस सत्र का संचालन आलोचक और कवि डॉ. प्रेम दुबे ने किया आभार प्रदर्शन नवभारत बिलासपुर के वरिष्ठ पत्रकार श्री सईद खान द्वारा किया गया।

द्वितीय सत्र प्रारंभ करने के पूर्व दिवंगत हुए देश और राज्य भर के उपस्थित प्रमुख साहित्यकारों द्वारा भवदेव पांडेय, सत्येंद्र सिंह नूरविनोद तिवारी को मौन श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

स्मरण सत्र (बाबा को याद करते हुएमें उनके सानिध्य में बिताए क्षणों को उपस्थित साहित्यकारों ने याद किया। डॉ. पालेश्वर शर्माप्रभात त्रिपाठीविजय बहादुर सिंह,रमेश दबेमुमताजरवि श्रीवास्तवनंद किशोर तिवारीमहावीर अग्रवालरघुवंश मणि,श्रीप्रकाश मिश्रउदभ्रांतडॉ.देवराज के संस्मरणों में बाबा पुन: जीवित हो उठे।

50 कवियों ने किया कविता पाठ
रात्रि वाणी के अंतर्गत आमंत्रित कवियों- डॉ. बुद्विनाथ मिश्रउदभ्रांतरमेश खत्री,डॉ. देवराजविश्वरंजनपरितोष चक्रवर्ती, श्रीप्रकाश मिश्रडॉ.शैलेंद्र कुमार त्रिपाठीरघुवंश मणि,प्रफुल्ल कोलख्यानविमलेश त्रिपाठीप्रभात त्रिपाठीभारत भरद्वाजसुधीर सक्सेनाअरूण शीतांशशिवदत्त बावलकरडॉ.चितरंजन करडॉ.बलदेवडॉ.अजय पाठकमुमताजसतीश जायसवालडॉ. राजेन्द्र सोनीअब्दुल सलाम कौसरबी.एल.पालजयप्रकाश मानसकमलेश्वर साहूचेतन भारतीरामकुमार तिवारीवंदना केंगरानी आदि ने विभिन्न रंगों और शिल्पों वाली कविताओं का पाठ किया ।

देश भर से पधारे लगभग 300 साहित्यकारों एवं साहित्य प्रेमियों की निंरतर और सफलता उपस्थिति वाले इस दो दिवसीय आयोजन में संस्थान के कार्यकारी निदेशक जयप्रकाश मानस, सचिव सुरेंद्र वर्मा, कोषाध्यक्ष राजेश सोंथलिया, राम पटवा, बेणुधर देवांगनहरि नायकविनय सिंह ठाकुरलीलाधर पटेलआदि का उल्लेखनीय सहयोग रहा ।

जयप्रकाश मानस
संपादक,
कार्यकारी संपादक,
पांडुलिपि (त्रैमासिक)
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1 टिप्पणी:

  1. इस कार्यक्रम में मैं भी आमंत्रित था लेकिन जा ना पाया.. अफ़सोस है इस रिपोर्ट को पढ़कर !

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