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रपट:-रामस्वरूप ‘किसान’ का रचना पाठ चुरू में

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on रविवार, मार्च 27, 2011 | रविवार, मार्च 27, 2011

चूरू, 27 मार्च। 

राजस्थानी व हिंदी के ख्यातनाम साहित्यकार रामस्वरूप किसान ने मौजूदा दौर में मरती-जीती मानवीय संवेदनाओं से लबालब अपनी एक से बढकर एक कविताओं और कहानियों के जरिए चूरू के साहित्यप्रेमियों को झकझोर कर रख दिया। किसान की प्रस्तुतियों पर भावविभोर श्रोताओं ने उनके सृजन को दिल खोलकर सराहा। 

अवसर था शहर के लोक संस्कृति शोध संस्थान नगरश्री में पंडित कुंजबिहारी शर्मा की स्मृति में हर माह होने वाली सृजन से साक्षात्कार गोष्ठीमाला की 47 वीं कड़ी में आयोजित सृजन से साक्षात्कार गोष्ठी का। साहित्यकार हकीम जलालुद्दीन खुश्तर की अध्यक्षता में आयोजित गोष्ठी का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। किसान ने अपनी प्रस्तुतियों का आरंभ खत कविता से किया। इस कविता में बेटी की ओर से लिखे गए पत्र में पिता की मजबूरियों और विवशताओं के चित्रण ने सभागार में मौजूद प्रत्येक श्रोता की आंखें नम कर दीं। अगली कविता पेशकश ‘मैं अन्नदाता कोनीं...’ में किसान ने कृषक जीवन की विडंबनाओं और संघर्ष से भरपूर जिंदगी का जीवंत चित्रण कर श्रोताओं की दाद पाई। अपनी कविता ‘आ बैठ बात करां...’ के जरिए किसान ने टूटते हुए मानवीय मूल्यों को मार्मिक अभिव्यक्ति देकर श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया। अपनी कहानी दलाल में उन्होंने वर्तमान समय में भौतिकतावादी मूल्यों में फंसे व्यक्ति के भीतर जिंदा संवेदना और अंतद्वंद्व को स्वर दिए तो ‘गा कठै बांधू...’ कहानी के जरिए लुप्त होती संवेदनाओं का जोरदार चित्र उकेरते हुए प्रभावित किया।  

चर्चा सत्र में हरिसिंह, विजय कुमार शर्मा, रवींद्र शर्मा, प्रदीप शर्मा, मधुकर गौड़, दुलाराम सहारण आदि ने किसान के सृजन पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वाकई किसान सच को कहने की हिम्मत रखने वाले ऐसे साहित्यकार हैं, जिनकी रचनाओं में मानवीय संवेदनाओं को सशक्त अभिव्यक्ति मिली है और सृजनधर्म के प्रति न्याय हुआ है। अध्यक्षीय उद्बोधन में साहित्यकार हकीम जलालुद्दीन खुश्तर ने कहा कि किसान की रचनाओं में अनुभवों से उपजी परिपक्वता साफ नजर आती है। नगरश्री के रामगोपाल बहड़ ने संस्थान की गतिविधियों का परिचय दिया। गोष्ठी का सफल संचालन कमल कोठारी ने किया। इस दौरान श्यामसुंदर शर्मा,  राजस्थानी साहित्यकार कुमार अजय, शंकर झकनाड़िया, रामावतार साथी, मोहन लाल हेमालंकार सहित बड़ी संख्या में शहर के साहित्यप्रेमी मौजूद थे। इस मौके पर नगरश्री की ओर से शॉल व श्रीफल भेंटकर किसान का अभिनंदन किया गया। 

क्षण के इर्द-गिर्द बुनी जाती है कहानी

किसान ने अपने आत्मकथ्य में कहा कि सृजन की प्रक्रिया बड़ी विचित्र व अद्भुत है और कभी-कभी सृजनधर्मी की स्थिति पागल जैसी नजर आती है। उन्होंने कहा कि उन्होंने कहा कि किसी विषय को लेकर निबंध लिखा जा सकता है, कहानी नहीं। जब साहित्यकार को किसी घटना का कोई अंश अपील करता है तो उस क्षण के इर्द-गिर्द कहानी का ताना-बाना बुना जाता है। उन्होंने कहा कि कभी वे स्वयं के कवि में कहानीकार को बड़ा होते देखते हैं तो कभी सोचते हैं कि उनके कथाकार से उनके भीतर  के कवि को बल मिला है। 

राजस्थानी के जाने-माने हस्ताक्षर हैं किसान

14 अगस्त 1952 को जन्मे परलीका के रामस्वरूप किसान राजस्थानी साहित्य के जानेमाने हस्ताक्षर हैं। दो कथा संग्रह, एक लघुकथा संग्रह, तीन कविता संग्रह, एक अनुवाद पुस्तक सहित उनकी आठ पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। राजस्थानी और हिंदी की सभी पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। 

दुलाराम सहारण
संस्कृतिकर्मी

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