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डॉ.महेश आलोक की एक रचना

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, मार्च 30, 2011 | बुधवार, मार्च 30, 2011

 अंतिम आदमी अंतिम रास्ता 
                                                            - 
        अंतिम रास्ता जहां मैदान के साथ छोड़ता है शहर
        वहीं अंतिम आदमी रास्ता बनाता है
        अंतिम आदमी के पास रास्ता बनाने के नियम हैं
        अंतिम आदमी पहले नियम में रास्ता बनाता है
        नियम में इतना कुहरा है कि
        कुहरा रास्ता की तरह दिखता है।
        कुहरा में सचमुच का अंतरिक्ष है।
सचमुच  का आकाश है अंतरिक्ष में।
अंतरिक्ष में  जितना आकाश है
उतने आकाश में सचमुच का  सूरज है।
जितनी सूरज में रोशनी है
उतना सूरज में रास्ता है।
जितना सूरज में रास्ता है
उतनी पृथ्वी अंतिम आदमी के पास है
जहां उसका घर है जहां
        अंतिम रास्ता मैदान के साथ
        छोड़ता है शहर
       अंतिम आदमी के पास एक अंतिम रास्ता है
       मैंने सुना है जिस दिन बनायेगा वह अंतिम रास्ता
       पृथ्वी किसी लदे-फंदे ट्रक की तरह
       भाग न जाये
       अपने गर्भ में
http://www.maheshalok.blogspot.com/

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