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शिक्षा पर निवेश बढ़ाने से ही शिक्षा के अधिकार का क्रियान्वयन सम्भव - कालजयी

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on रविवार, मार्च 13, 2011 | रविवार, मार्च 13, 2011


11 वाँ राष्ट्रीय समता लेखक सम्मेलन 

समान बचपन अभियान महावीर समता सदेश एंव कासा संस्थान उदयपुर के सयुंक्त तत्वाधान में शिक्षा एवं रोजगार में समान अवसर की चुनौतियो पर दूसरा सत्र आयोजित किया।वक्ता के तौर पर डॉ. प्रेमसिंह डाबी ने कहा की समान शिक्षा का अवसर ग्रामीण क्षे़त्रों में  ही नहीं मिल रहा है। शिक्षा की जो भी सुविधा है वो तो शहरी स्कूल में ही है। सुविधाओं से वंचित ग्रामीण छात्र कैसे आगे बढ पायेंगे। बचपन से ही हमारे क्षेत्र के बच्चों को आगे बढ़ने का अवसर नहीं दिया जा रहा है। जिससे वह आगे बढकर विकसित क्षेत्र के बच्चों अर्थात शहरी या महानगरीय क्षेत्र के बच्चों से पिछड़ जाते है। जिसका परिणाम कई पीढियों को भुगतना पड़ता  है। आज हमारे क्षेत्र के युवाओं को अपने केरियर के बारे में मालूम नही है। तभी तो हमारे क्षैत्र का बच्चा एम.बी.ए., बी.एण्ड. करने के बाद भी रोजगार गारंटी में गेंती फावडा चला रहा है। या गुजरात में मजदूरी कर रहा है। आज हम हमारे क्षेत्र के युवाओं को कहते हैं की आप डाक्टर, इंजीनियर, वै़ज्ञानिक, पायलट या अधिकारी बने। उनको हम सपने दिखाते हैं पर हमारे क्षेत्र के विद्यालयों में न तो साइन्स व कोमर्स फेकल्टी है न शिक्षक ऐसी स्थिति में हमारे क्षे़़त्र के युवा कहां आगे बढ पायेगें। इस खाई को दूर करने के लिए यहां की जनता को आवाज उठानी पडे़गी यहां के युवाओं को इकठा होना पडेगा। जब तक समान शिक्षा के अवसर नहीं दिये जाते ये कमियाँ दूर होने वाली नहीं हैं।
मुख्य वक्ता के तौर पर किशन कालजेयी सब लोग पत्रिका के प्रधान सम्पादक ने कहा कि वर्तमान में शिक्षा का बाजारीकरण हो गया है। एक तरफ अमीर वर्ग के लोग अपने बच्चों की शिक्षा पर लाखों रूपया खर्च कर महंगें स्कूलों में पढा रहें है तो दूसरी और भारत की 70 प्रतिशत जनसंख्या की प्रतिदिन की आय 20 रूपया है तो वे अपने बच्चों को महंगी एंव अच्छी शिक्षा कैसे दिला पायेगें। उन्होंने कहा कि संसदीय प्रणाली के खर्चे और वेतन की गैर बराबरी सारी व्यवस्था को नकारा बनाती है। उन्होंने कहा कि लंगड़ों और साबुत दो पैर वाले को एक साथ दौड़ाकर कहते हैं कि कम्पिटिशन में जीत हासिल करों जो असम्भव है। सब लोग के सम्पादक ने कहा कि विचारों की कमी नहीं है। लेकिन इन पर ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा सरकार एक तरफ तो विलासिता पूर्ण खर्च कर रही है। और दूसरी ओर शिक्षा की दुरर्शा हो रही है। शिक्षा पर जी.डी.पी. का 2.84 प्रतिशत ही खर्च हो रहा है। जबकि 1965 -66 में कोठारी कमीशन कि रिपोर्ट में 6 प्रतिशत खर्च करने का सुझाव दिया गया था। आरटीई के आने के बाद तो जी.डी.पी. का 10 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च होना चाहिए। सम्मेलन के इस सत्र का संचालन कासा संस्थान के कार्यक्रम समन्वयक दिनेश व्यास ने किया।
कार्यशाला की अध्यक्षता कर रहे बिहार से राष्ट्र सेवा दल राष्टीय महासचिव सच्चिदान्दसिंह ने कहा कि शिक्षा में समान अवसर होना बहुत ही जरूरी है। आज ग्रामीण एवं शहरी शिक्षा मंे बहुत बडा अन्तर है। उन्होंने शिक्षा में बाजारीकरण का विरोध करते हुए कहा की उच्च शिक्षा सिर्फ धनाढय वर्ग के लोगों के बीच में रह गई है। ऐसे में गरीब एंव अमीर वर्ग में असमानता आ गई है। समान अवसर को लेकर जनता को एक आवाज उठानी पडेगी तथा एक राजनीतिक इच्छा शक्ति कायम करने पडेगी। राजनीतिक पार्टीयों कोे समान अवसर के मुद्दे को लेकर अपने चुनावी ऐजन्डे में रखना होगा।
इस सत्र में बहस में हस्तक्षेप करते हुए सोहनलाल भाटी दूसरा दशक के संस्थान देसूरी ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था ठीक करने के लिए जज्बे की जरूरत है। दिशा विहीन शिक्षा से देश में बदलाव नहीं आ सकता हैं शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की जरूतर है। इसी बहस को आगे बढ़ाते हुए दशरथ शर्मा ने कहा कि हमारे गांव को आदर्श बनाने का जिम्मा पंचायत ले। हेमन्त सेन ने कहा कि युवा अंग्रेजीयत को बर्खास्त करे न की अंग्रेजी को। महेन्द्र ने कहा कि गरीब छात्रों पर बहुत दबाव है और वो उच्च शिक्षा के खर्चे नहीं उठा सकते है। इसके चलते अपनी पढ़ाई छोड़कर काम धन्धों में लगना पड़ता है। धीरेन्द्र त्यागी ने सवाल किया कि इस व्यवस्था की इस हालात के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या सरकार या समाज का या और कोई? अरूण तिवारी ने कहा कि वर्तमान शिक्षा सामाजिक बदलाव की और नहीं ले जाती है, यह यथा स्थितिवादियों की व्यवस्था है। रविन्द्र प्रतापसिंह ने पुछा कि दक्षिणी राजस्थाान के इन बच्चो के लिए कौन जिम्मेदार है। इंजी सज्जन कुमार ने कहा कि राजनैतिक एजेण्डे के चलते सभी स्वयं की सुरक्षा और पूंजी के पिछे चलने को विवश है।


सम्मेलन की रिपोर्ट प्रस्तुति:-
हिम्मत सेठ, डॉ. फरहत बानो,
डॉ. प्रेमिला सिंघवी, डॉ. प्रेमसिंह डाबी
डॉ. हेमेन्द्र चण्डालिया
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