समीर लाल का आंकलन:-प्रिंट माध्यम और इंटरनेट साहित्य के आपसी समीकरण - अपनी माटी

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रविवार, मार्च 13, 2011

समीर लाल का आंकलन:-प्रिंट माध्यम और इंटरनेट साहित्य के आपसी समीकरण

(आज की राजस्थान पत्रिका से ये आलेख पाठकों के हित में साभार प्रकाशित कर रहे हैं. देश में लगभग जानेमाने सीनियर ब्लोगर समीर लाल ने यहाँ ब्लॉग्गिंग को लेकर चल रहे चिंतन पर एक ज़रूरी विमर्श की भी मांग की है.)

अभी बहुत समय नहीं बीता है जब श्रीलाल शुक्ल जी की मौखिक स्वीकृति से उनकी कालजयी पुस्तकराग दरबारीको नेट पर एक ब्लॉग के माध्यम से लाए जाने का प्रयास किया गया था। निश्चित ही यह स्वीकृति देते वक्त उनके मन में एक चिट्ठाकार कहलाने का लोभ तो नहीं ही रहा होगा। अगर कोई मंशा होगी तो मात्र इतनी कि इस कालजयी रचना को और अधिक लोग पढ़ें। उस दौर में जब हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार का जज्बा लिए मात्र मुट्ठी भर क्ख्भ् चिट्ठाकार सक्रिय थे और आज भी, जब यह संख्या तीस हज़ार पार कर चुकी है, एक कोशिश हमेशा होती है कि जो साहित्य किताबों में उपलब्ध है या बंद है, उसे इंटरनेट पर लाया जाए और एक ऐसे माध्यम पर दर्ज कर दिया जाए जो सर्व सुलभ है और दीर्घजीवी है। विभिन्न आयोजनों के दौरान चाहे फिर वो इलाहाबाद या वर्धा का हिन्दी विश्वविद्यालय का ब्लॉग सम्मेलन रहा हो या अन्य कोई, सभी में प्रख्यात साहित्यकारों को इंटरनेट से जोड़ने के प्रयास हुए हैं। कुछ स्वभाविक उम्रजनित, अक्षमताओं जनित एवं अहमजनित विरोध भी इंटरनेट की ओर आने की दिशा में रहा है मगर वह तो हर परिवर्तन का स्वभाव है। आज कविता कोश, अनुभूति, साहित्यशिल्पी, हिंदी विकीपीडिया, गद्यकोश जैसे इंटरनेट पर साहित्य को सर्व सुलभ कराने के कई अभियान अपने चरम पर हैं। 

ब्लॉग बंधुओं के साझा भागीरथी प्रयासों से राम चरित मानस (http://ramayan.wordpress.com/) ब्लॉग स्वरूप में ऑन लाइन किया गया। यदि इस पर गहन विचार किया जाये तो यह तय है कि यह सब जो कार्य किया जा रहा है वो एक उज्ज्वल भविष्य के निर्माण को दृष्टिगत रख कर किया जा रहा है। इसका तात्कालिक लाभ तो मात्र एक छोटा सा वर्ग उठा रहा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो आज विश्व की मात्र क्भ्त्न आबादी इंटरनेट का प्रयोग कर रही है और इन उपयोगकर्ताओं में भारत |वें स्थान पर है, जहां इसका उपयोग करने वालों की संख्या पूरी आबादी का मात्र ढाई प्रतिशत ही है यानिकी सत्यानवे प्रतिशत आबादी का हिस्सा अभी भी इंटरनेट से कोई सरोकार नहीं रखता। अगर विकास की दर बहुत त्वरित भी रही तो भी आने वाले बीस सालों में यह प्रतिशत बहुत बढ़ा तो चार गुना हो जाएगा याने तब भी क्षेत्र आबादी इंटरनेट का उपयोग नहीं कर रही होगी। हालांकि प्रतिशत के बदले यदि संख्या के आधार पर आंका जाये तो यही क्0त्न आबादी की संख्या, कई बड़े देशों की आबादी से अधिक ही होगी, जो कि एक बहुत संतोष का विषय है। ऐसे में एक बहुत बड़ा वर्ग निश्चित रुप से ऐसा बच रह जाता है, जिसे साहित्य एवं पठन पाठन में तो रुचि है किन्तु इंटरनेट से कोई संबंध नहीं है। इस वर्ग की जरुरतें पूरी करने के लिए किताबें, पत्रिकाएं, अखबार आदि ही मुख् भूमिका निभाते रहेंगे, यह भी तय है। आज इंटरनेट पर हो रहे प्रयासों को आमजन तक पहुंचाने के लिए प्रिन्ट माध्यमों की जरुरत है, वहीं किताबों, पत्रिकाओं, अखबारों आदि को अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए इंटरनेट की जरुरत है। 

निश्चित ही इंटरनेट एक त्वरित, तेज, और व्यापक माध्यम है तो इसके प्रारूप का आधार भी वैसा ही है। फिलहाल, इंटरनेट पर छोटी छोटी प्रस्तुतियां जो कम समय में त्वरित रुप से पढ़ी जा सकें, ज्यादा लोकप्रियता हासिल कर लेती हैं। ठीक इसके विपरीत किताबों की दुनिया में, पाठक समय निकाल कर विस्तार ढूंढता है चाहे वो दृश्यांकन का विस्तार हो या कथानक का। ब्लॉग का पाठक टिप्पणी या प्रतिक्रिया यह जानते हुए और लिखने के लिए लिखता है कि वो पढ़ी जायेगी, सिर्फ लेखक के द्वारा बल्कि अन्य पाठकों के द्वारा भी, जो उस टिप्पणी के आधार पर ही टिप्पणीकर्ता का व्यक्तित्व आंकलन करेंगे, यह विशिष्टता शायद इस वजह से भी हो कि वर्तमान में चिट्ठे के पाठक खासतौर पर टिप्पणीकर्ता स्वयं भी अधिकतर चिट्ठाकार ही हैं और उन्हें भी अपनी रचनायें एवं कृतियां इन्हीं पाठकों को पढ़वानी होती हैं। इससे इतर किताब और पत्रिकाओं का पाठक टिप्पणी लिखता नहीं, पठन के साथ मन ही मन बुनता चलता है और फिर पठन समाप्ति पर अपनी इस बुनावट को काल्पनिक तौर पर निहार कर लेखक एवं उसके लेखन के विषय में एक धारणा स्थापित कर भूल जाता है। उसी लेखक की अगली कृति पर जब उसकी नजर पड़ती हैं और तो वो उस लेखक के प्रति अपनी अतीत में स्थापित अवधारणाओं को खंगालता है। इस आधार पर देखें तो एक दूसरे की पूरक होते हुए भी दोनों फिलहाल अलग अलग दुनिया हैं और निश्चित ही उनमें कोई टकराहट नहीं होना चाहिए। इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री का किताबीकरण और किताबों के इंटरनेटीकरण जैसी धाराओं का स्वागत होना चाहिए। अच्छे या बुरे का निर्णय भी पाठक ही करेगा, इस पर किसी की भी टीका टिप्पणी कैसी? यह सिर्फ एक विचार है जो विमर्श मांगता है।

समीर लाल
लेखाक्षेत्र में वरिष्ठ सलाहकार
और साहित्यकर्मी 
कनाडा

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