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जयसिंह राजपुरोहित की राजस्थानी रचना

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on मंगलवार, मार्च 08, 2011 | मंगलवार, मार्च 08, 2011

करसौ 
(ये रचना उनके काव्य संग्रह  'मरुधर रा मोती' से ली गयी है )


रात दिन मैंणत करतां
आँखियाँ में नींद भरतां
फाट्या पैरे कपड़ा लत्ता
झूंपड़ा में रैवे है

जुगां सून अन्न उपजावणिया
अन्न खातर अब तरसै है
वाह रे सांवरिया थूं भी
देख-देख मन हरखै है

सियालै री ठरती रात
ऊबौ एकलो कोइ न साथ
पाणत करतां धूजै हाथ
कुण जानै मनडै री बात

जीमेला कुण मीठा भात
जिण खातर औ तड़फै है
जुगां सून अन्न उपजावणिया
अन्न खातर अब तरसै है

तपयोडी बालू रेताँ में
हल हांके करसौ खेताँ में
खुद री उपज दूजां देतां नै
कुण पूछे अब इण  नेताँ नै

रगत पसीनौ सींच ज़मीं
माटी सूँ सोनौ उपजावै है
जुगां सून अन्न उपजावणिया
अन्न खातर अब तरसै है

मूसलाधार बरसतौ पाणी
पड़गा झूंपा बहगी ढाणी
फाटी गूदड़ ऊपर ताणी
टाबर के माँ रोटी खाणी

गहणां गांठा मेल अडानै 
खाद बीज मोलावै है
जुगां सून अन्न उपजावणिया
अन्न खातर अब तरसै है

मत दीजै करसां रौ ज़मारौ
जिणरै कोई नहीं सहारौ
इणनै जो भी चाहे लूटै
इण सूँ सांवरियौ भी रूठे

करज़ में जन्मी
करज़ में रेवै
करज़ में जागे
कर्ज़ में सोवै

मरतां वेल्याँ खाँपण रौ लीरौ
भी करजां सूँ लावै है
जुगां सून अन्न उपजावणिया
अन्न खातर अब तरसै है

वाह रै सांवरिया थूं भी
देख-देख मन हरखे है
जुगां सून अन्न उपजावणिया
अन्न खातर अब तरसै है
राजस्थानी कवि
स्टेशन मास्टर
चित्तौड़गढ़

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