Latest Article :
Home » , , , » डॉ. लोहिया मानते थे कि हथियार माने अन्याय- प्रो. नन्द चतुर्वेदी

डॉ. लोहिया मानते थे कि हथियार माने अन्याय- प्रो. नन्द चतुर्वेदी

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on रविवार, मार्च 13, 2011 | रविवार, मार्च 13, 2011


डॉ. लोहिया स्मृति व्याख्यान
प्रो.नन्द चतुर्वेदी 
सांयकालीन सत्र में डॉ. राम मनोहर लोहिया स्मृति व्याख्यान हुआ। यह कार्यक्रम मोहनसिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट, गांधी मानव कल्याण सोसायटी व महावीर समता संदेश के संयुक्त तत्वावधान में विद्याभवन के सभा भवन में आयोजित किया गया। विषय था ‘‘अगर आज डॉ. लोहिया होते।’’ विषय पर बोलते हुए मुख्य वक्ता समाजवादी पार्टी के उपाध्यक्ष ब्रजभूषण तिवारी ने कहा कि डॉ. लोहिया पूंजीवाद के विरूद्ध इसलिए थे कि इसके द्वारा हुआ मशीनरी व औद्योगिकी विकास मुनष्य को उपभोक्तावादी बनाता है। जिसके कारण जीवन मूल्य समाप्त हो जाते है। उनका मानना था कि साम्यवाद में धर्म नहीं रहता द्वेष व हिंसा से सुधार नहीं होता। उनका मानना है कि लोहिया पहले ऐसे व्यक्ति थे जो भारतीय समाज में मानवता परक मूल्यों की स्थापना के लिए जाति तोड़ों व समरसता पैदा करों की बात करते थे। डॉ. लोहिया का दर्शन मानवता वादी इसलिए है क्योंकि वे नैतिकता स्वतन्त्रता व मानवता को विकास के दर्शन केन्द्र मानते हैं। उनकी किताब इकोनोमिक्स आफ्टर मार्क्स का िजक्र करते हुए ब्रज भूषण तिवारी ने कहा कि आज जहां एक ओर 10 प्रतिशत कॉरपोरेट धरानों के पास 70 प्रतिशत संसाधन सिमट गए हैं। वहीं दूसरी ओर 70 प्रतिशत जनसंख्या 20 रूपये रोज से कम कमाती है। डॉ. लोहिया ने आरक्षण के लिए पांच वर्ग सुझाए महिला, शूद्र, गरीब, मुस्लिम, पिछड़ी जाति व आदिवासी और कहा कि सौ में से 60 पद इनके लिए आरक्षित होने चाहिए।
इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. नन्द चतुर्वेदी ने लोहिया के आलेख निराशा के कर्तव्य और डॉ. लोहिया के अवदान पर अपनी बात को केन्द्रीत रखा। प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि डॉ. लोहिया निराशा के कर्तव्यों की बात करने के पहले वो तीन प्रकार की निराशा बताते हैं। एक राष्ट्रीय निराशा दूसरी अन्तर्राष्ट्रीय निराशा और तीसरी मानवीय निराशा, राष्ट्रीय निराशा की बात करते वक्त वो कहते हैं 1500 साल पहले तक अन्दरूनी जालिम के खिलाफ जनता के विद्रोह का कोई उदाहरण इतिहास में नहीं मिलता। जालिम राजा के खिलाफ कोई विद्रोह नहीं होने को हमारा इतिहास समन्वय समाज का नाम देता है। लोहिया जी उस निराशा की चर्चा करते है जो आजादी के बाद शुरू होती है वो कहते है जोखीम, क्रान्तिकारी कर्म करने और तरह-तरह की गैर बराबरी के विरूद्ध खडे होने का युग बीत गया है। राष्ट्रीय निराशा की बात करते समय डॉ. लोहिया कहते हैं शासक वर्ग पुश्तैनी गुलाम है जो किसी के भी सामने जुक जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय निराशा की बात करते हुए वे मशीन और युद्ध के हथियारों से पैदा होने वाली निराशा की बात करते हैं। प्रो. नंद चतुर्वेदी कहते हैं कि लोहिया के अनुसार गोरी दुनिया मशीनों के जरिए चीजों का उत्पादन बढाए जा रही है। जिसका परिणाम सब चीजें एक जैसी हो रही है।
दूसरा कारण हथियारों की प्रतिस्पर्धा है। डॉ. लोहिया मानते थे कि रूस ओर अमेरिका के बीच चलने वाली आयुद्ध की विनाशकारी प्रतिस्पर्धा के परिणाम भयावह हो सकते। डॉ. लोहिया मानते थे कि हथियार माने अन्याय।प्रो. नन्द चतुर्वेदी ने लोहिया के अवदान को रेखांकित करते हुए कहा कि डॉ. लोहिया ने भारतीय समाज में व्याप्त सांस्कृतिक मुद्दों को तोड़ने का काम किया जो हजारों वर्षा से अपने कर्म शून्य अध्यात्म के ढोंग में फंसी है। लोहिया ने अनेक छोटी-छोटी पुस्तकंे लिखकर क्रान्तिकारी विषयों पर चर्चा चलाई। डॉ. लोहिया ने समाजवाद की नई संस्कृति का प्रचार करने की दिशा में जन हिन्दी मासिक का प्रकाशन प्रारम्भ किया। इसी प्रकार अंग्रेजी में मेनकाइण्ड नामक अंग्रेजी मासिक का प्रकाशन किया जिसका उद्देश्य दुनिया के सत्यशोधन और आदर्श भविष्य का अन्वेषण कम से कम संकुचित और ज्यादा से ज्यादा विश्व व्यापी आदर्श की लगातार खोज जारी रखनी चाहिए ऐसा डॉ. लोहिया मानते थे।
कार्यक्रम में हबीबा बानू जिन्हें डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ काम करने का अवसर मिला ने अपने सस्मरण सुनाये उन्होंने कहा कि डॉ. लोहिया महिलाओं को बहुत सम्मान देते थे और कभी भी नर-नारी में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करते थे। डॉ. लोहिया ने युवजन सभा बनाई ओर युवाओं के कई कार्यक्रम चलाये।संगोष्ठी में सुधा चौधरी सज्जन कुमार बसन्ती लाल कुकड़ा पीयूष जोशी ने भी विचार रखें। संगोष्ठी में विषय प्रवेश डॉ जैनब बानू ने किया। मदन नागदा ने अतिथियों का स्वागत किया। डॉ हमेन्द्र चण्डालिया ने धन्यवाद दिया और नन्द किशोर शर्मा ने संचालन किया।

सम्मेलन की रिपोर्ट प्रस्तुति:-
हिम्मत सेठ, डॉ. फरहत बानो,
डॉ. प्रेमिला सिंघवी, डॉ. प्रेमसिंह डाबी
डॉ. हेमेन्द्र चण्डालिया
Share this article :

1 टिप्पणी:

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

सह सम्पादक:सौरभ कुमार

सह सम्पादक:सौरभ कुमार
अपनी माटी ई-पत्रिका

यहाँ आपका स्वागत है



यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template