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आलेख:-राजनीति व संस्कृति में नया रंग भरती शहादत

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on सोमवार, मार्च 21, 2011 | सोमवार, मार्च 21, 2011

   
23 मार्च शहीद भगत सिंहए सुखदेव और राजगुरु का शहादत दिवस है। इन तीन नौजवान क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। इस घटना के 57 साल बाद 23 मार्च 1988 को पंजाब के प्रसिद्ध क्रांतिकारी कवि अवतार सिहं ष्पाशष् को आतंकवादियों ने अपनी गोलियों का निशाना बनाया। 70 वाले दशक में पंजाब में जो क्रांतिेकारी आंदोलन शुरू हुआए उसके पक्ष में कविताएं लिखने के कारण भी पाश कई बार जेल गये थेए सरकारी जुल्म के शिकार हुए तथा वर्षोें तक भूमिगत रहे।

यह महज संयोग है कि पंजाब की धरती से पैदा हुए तथा क्रांतिकारी भगत सिंह के शहीदी दिवस के दिन ही अर्थात 23 मार्च को पंजाबी के क्रांतिकारी कवि अवतार सिहं ष्पाशष् भी शहीद होते हैं। लेकिन इन दोनों क्रांतिकारियों के उददेश्य व विचारों की एकता कोई संयोग नहीं है। यह वास्तव में भारतीय जनता की सच्ची आजादी के संघर्ष की क्रांतिकारी परंपरा का न सिर्फ सबसे बेहतरीन विकास है बल्कि राजनीति और संस्कृति की एकता का सबसे अनूठा उदाहरण भी है।


भगत सिंह और उनके साथियों ने आजादी का जो सपना देखा थाए जिस संघर्ष और क्रांति का आहवान किया थाए वह अधूरा ही रहा। भारतीय जनता के गौरवशाली संघर्षों और विश्व पूंजीवाद के आंतरिक संकट के परिणामस्वरूप जो राजनीतिक आजादी 1947 में मिलीए उसका लाभ केवल इस देश के पूंजीपतियोंए सामंतों और उनसे जुडे मुट्ठी भर विशेषाधिकार प्राप्त लोगों ने ही उठाया है। सातवां दशक आते.आते आजादी से मोहभंग की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। भारत के नये शासक वर्ग के खिलाफ जन असंतोष तेज होता है जिसकी सबसे ठोस और मुखर अभिव्यक्ति चौथे राष्ट्रीय आम चुनाव और नक्सलबाडी विद्रोह में होती है। विशेष तौर से नक्सलबाडी विद्रोह ने भारतीय साहित्य को काफी गहराई तक प्रभावित किया तथा व्यक्तिवादए निषेधवादए परंपरावादए अस्तित्ववादए आधुनिकतावाद जैसी जन विरोधी प्रवृत्तियों को प्रबल चुनौती दी। विकल्प की तलाश कर रही बंाग्लाए तेलुगूए हिन्दीए पंजाबी आदि भाषाओं की नयी पीढी को तो जैसे राह ही मिल गयी। पंजाबी में नये कवियों की एक पूरी पीढी सामने आयी जिसने पंजाबी कविता को नया रंग.रूप प्रदान किया। अवतारसिंह पाश ऐसे कवियों की अगली पांत में थे।

पाश की पहली कविता 1967 में छपी थी। अर्थात पाश ने पंजाबी साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसे दौर में प्रवेश किया जो दूसरी आजादी के क्रांतिकारी राजनीतिक संघर्ष का ही नहीं अपितु नये जनवादी.क्रांतिकारी सांस्कृतिक आंदोलन का भी प्रस्थान बिन्दु था। अमरजीत चंदन के संपादन में निकली भूमिगत पत्रिका ‘दस्तावेज’ के चौथे अंक में परिचय सहित पाश की कविताओं का प्रकाशन तो पंजाबी साहित्य के क्षेत्र में धमाके की तरह था। पाश की इन कविताआंे की पंजाब के साहित्य.हलके में काफी चर्चा रही। उन दिनों पंजाब में क्रांतिकारी संधर्ष अपने उभार पर था। पाश का गांव तथा उनका इलाका इस संघर्ष के केन्द्र में था। इस संघर्ष की गतिविधियों ने पंजाब के साहित्यिक माहौल में नयी ऊर्जा व नया जोश भर दिया था। पाश ने इसी संघर्ष की जमीन      पर कविताएं रचीं और इसके ष्जुर्मष् में गिरफ्तार हुए और करीब दो वर्षों तक जेल में रहे। सत्ता के दमन का मुकाबला करते हुए जेल में ढेरों कविताएं लिखीं और जेल में रहते उनका पहला कविता संग्रह ष्लोककथाष् प्रकाशित हुआ। इस संग्रह ने पाश को पंजाबी कविता में उनकी पहचान दर्ज करा दी। 

1972 में जेल से रिहा होने के बाद पाश ने ष्सिआडष् नाम से साहित्यिक पत्रिका निकालनी शुरू की। नक्सलबाडी आंदोलन पंजाब में बिखरने लगा था। साहित्य के क्षेत्र में भी पस्ती व हताशा का दौर शुरू हो गया था। ऐसे वक्त में पाश ने आत्मसंघर्ष करते हुए पस्ती व निराशा से उबरने की कोशिश की तथा सरकारी दमन के खिलाफ व जन आंदोलनों के पक्ष में रचनाएँ की। पंजाब के लेखकों.संस्कृतिकर्मियों को एकजुट व संगठित करने का प्रयास चलाते हुए पाश ने ष्पंजाबी साहित्य.सभ्याचार मंचष् का गठन किया तथा अमरजीत चंदनए हरभजन हलवारही आदि के साथ मिलकर  ष्हेमज्योतिष् पत्रिका शुरू की। इस दौर की पाश की कविताओं में भावनात्मक आवेग की जगह विचार व कला की ज्यादा गहराई थी। चर्चित कविता ष्युद्ध और शांतिष् पाश ने इसी दौर में लिखी। 1974 में उनका दूसरा कविता संग्रह ष्उडडदे बाजा मगरष् छपा जिसमें उनकी 38 कविताएं संकलित हैं। पाश का तीसरा संग्रह ष्साडे समियां विचष् 1978 में प्रकाशित हुआ। इसमें अपेक्षाकृत कुूछ लम्बी कविताएं भी संग्रहित हैं। उनकी मृत्यु के बाद ष्लडंेगे साथीष् शीर्षक से उनका चौथा संग्रह सामने आया जिसमें उनकी प्रकाशित व अप्रकाशित कविताएॅँ संकलित हैं।

पाश की कविताओं का मूल स्वर राजनीतिक.सामाजिक बदलाव का अर्थात क्रांति और विद्रोह का है। इनकी कविताएं धारदार हैं। जहाँ एक तरफ सांमती.उत्पीडकों के प्रति जबरदस्त गुस्सा व नफरत का भाव हैए वहीं अपने जन के प्रतिए क्रांतिकारी वर्ग के प्रति अथाह प्यार है। नाजिम हिकमत और ब्रतोल्त ब्रेख्त की तरह इनकी कविताओं में राजनीति व विचार की स्पष्टता व तीखापन है। कविता राजनीतिक नारा नहीं होती  लेकिन राजनीति नारे कला व कविता में घुल.मिलकर उसे नया अर्थ प्रदान करते हैं तथा कविता के प्रभाव और पहुंच को आश्चर्यजनक रूप में बढाते हैं.. यह बात पाश की कविताओं में देखी जा सकती हैं। पाश ने कविता को नारा बनाये बिना अपने दौर के तमाम नारों को कविता में बदल दिया। 

पाश की कविताओं की नजर में एक तरफ ष्शांति गॉंधी का जांघिया है जिसका नाड़ा चालीस करोड़ इन्सानों की फाँसी लगाने के काम आ सकता हैष् और ष्शब्द जो राजाओं की घाटियों में नाचते हैंध्जो प्रेमिका की नाभि का क्षेत्रफल मापते हैं जो मेजों पर टेनिस बाल की तरह दौडते हैं और जो मैचों की ऊसर जमीन पर उगते हैंध्कविता नहीं होतें ३३ण्ण्ष् तो दूसरी तरफ ष्युद्ध हमारे बच्चों के लिएध्कपड़े की गेंद बनकर आएगाध्युद्ध हमारी बहनों के लिए कढाई के सुन्दर नमूने लायेगाध्युद्ध हमारी बीवियों के स्तनों में दूध बनकर उतरेगाध्युद्ध बूढी माँ के लिए नजर का चश्मा बनेगाध्युद्ध हमारे पुरखों की कब्रों पर फूल बनकर खिलेगाष् और ष्तुम्हारे इंकलाब मेें शामिल है संगीत और साहस के शब्दध्खेतों से खदानं तक युवा कंधों और बलिष्ठ भुजाओं से रचे हुए शब्दए बर्बर सन्नाटों को चीरते हजार कंठों से निकलकर आज भी एक साथ गूंज रहें शब्द’ हजारों कंठो से निकली हुई आवाज ही पाश की कविता में शब्दबद्ध होती है। पाश की कविताओं में इन्हीं कंठों की उष्मा है। इसीलिए पाश की कविताओं पर लगातार हमले हुए हैं। पाश को अपनी कविताओं के लिए दमित होना पडा है। बर्बर यातनाएं सहनी पडी हैं। यहाँ तक कि अपनी जान भी गवांनी पड़ी हैं। लेकिन चाहे सरकारी जेंलें हों या आतंकवादियों की बन्दूकें.......... पाश ने कभी झुकना स्वीकार नहीं किया बल्कि हजारों दलित.पीड़ित शोषित कंठों से निकली आवाज को अपनी कविता में पिरोते रहेए रचते रहेए उनका गीत गाते रहे और अपने प्रिय शहीद भगत सिंह की राह पर चलते हुए शहीद हो गये।

23 मार्च के दिन ही अपना खून बहाकर पाश ने राजनीति और संस्कृति के बीच खडी की जाने वाली दीवार को ढहाते हुए यह साबित कर दिया कि बेहतर जीवन मूल्यों व शोषण उत्पीड़न से मुक्त मानव समाज की रचना के संघर्ष में कवि व कलाकार भी उसी तरह का योद्धा है जिस तरह एक राजनीतिककर्मी या राजनीतिक कार्यकर्तां। राजनीति और संस्कृति को एकरूप करते हुए पाश ने यह प्रमाणित कर दिया कि अपनी विशिष्टता के बावजूद मानव समाज के संघर्ष में राजनीति और संस्कृति को अलगाया नहीं जा सकता बल्कि इनकी सक्रिय व जन पक्षधर भूमिका संघर्ष को न सिर्फ नया आवेग प्रदान करती है बल्कि उसे बहुआयामी भी बनाती है।

भगत सिंह मूलतरू एक राजनीतिक कार्यकर्ता थे। राजनीति उनका मुख्य क्षेत्र था। लेकिन उन्होंने तमाम सामाजिक.सांस्कृतिक साहित्यिक सवालों पर भी अपनी सटीक टिप्पणी पेश की थी। अपने दौर में ब्रिटिश साम्राज्यवादियोंए देशी विदेशी प्रतिक्रियावादी शाक्तियों व विचारोंए धार्मिक कठमुल्लावादीए सांप्रदायिकताए अस्पृश्यताए जातिवाद जैसे मानव विरोधी मूल्यों के खिलाफ संघर्ष करते हुए भगत सिंह ने जनवादी.समाजवादी विचारों को प्रतिष्ठित किया। पाश की कविता,  विचारधाराए पत्रकारिता व सांस्कृतिक सक्रियता से साफ पता चलता है कि उनकी राजनीतिक समझ बहुत स्पष्ट थी।

यही भगत सिंह और पाश की समानता है। भले ही इनकी शहादत के बीच 57 वर्षों का अंतर है। ये दोनों क्रांतिकारी योद्धा राजनीति और संस्कृति की दुनिया को बहुत गहरे प्रभावित करते हैं साथ ही ये राजनीति और संस्कृति की एकताए पंजाब की धर्मनिरपेक्षए जनवादी व क्रांतिकारी परंपरा के उत्कृष्ट वाहक हैं तथा अपनी शहादत से ये राजनीति और संस्कृति की एकता में नया रंग भरते हैं।   

२३ मार्च पंजाबी कवि पाश  का शहीदी दिवस है . उनकी एक कविता यहाँ पेश है -कविता 

सबसे ख़तरनाक 

 पाश


मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती 


 कौशल किशोर
 एफ-3144, राजाजीपुरम,
 लखनऊ-226017
  मो- 09807519227, 08400208031


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