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लोहिया यदि होते?:-डॉ. नरेश भार्गव

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on रविवार, मार्च 13, 2011 | रविवार, मार्च 13, 2011

11 वाँ राष्ट्रीय समता लेखक सम्मेलन

डॉ. नरेश भार्गव 
डॉ. नरेश भार्गव महावीर समता संदेश के सम्पादक मण्डल के महत्वपूर्ण सदस्य है। समता संदेश के सारे प्रकाशन, कार्यक्रम व गतिविधिया डॉ. भार्गव से चर्चा करने के बाद ही तय होती है। डॉ. भार्गव का समता संदेश के साथ लगाव व प्रतिबद्धता का प्रमाण यह दोनों लेख है। डॉ. नरेश भार्गव की पत्नी डॉ. सुशीला भार्गव अमेरिकन हॉस्पीटल में मृत्यु शय्या पर जीवन-मृत्यु के युद्ध में व्यस्त थी। डॉ. नरेश भार्गव ‘‘आज अगर डॉ. लोहिया होते और विश्व सामाजिक बदलाव और युवा’’ विषय पर लेख लिख रहे थे। लिखने के बाद उन्होंने दोनों लेखों को साथी पीयूष जोशी को इस टिप्पणी के साथ पहुंचाए की मैं सम्मेलन में आने मंे असमर्थ हूं। लेकिन मेरे लेख वहां पढ़ कर मेरी उपस्थिति सम्मेलन में दर्ज करा देना। श्रीमती भार्गव का 6 फरवरी को देहवसान हो गया। महावीर समता संदेश उन्हें श्रद्धाजंलि अर्पित करता है।  -सम्पादक
सवाल बहुत टेड़ा है यह कुछ ऐसा साफ है जो गांधीजी के बारे में भी किया जाता है। गांधीजी यदि होते तो क्या शक्ल भारत की बनती? पर गांधीजी नहीं है। गांधी आचरण नहीं है और गांधी सिद्धान्त भी नहीं है। इसी प्रकार लोहिया नहीं है, लोहियावादी सड़क के आन्दोलन कर्ता भी नहीं है, मंत्री है और सत्ता के भागीदार हैं और लोहिया का जय जय करते पार्टियां भी चला रहे हैं। लोहिया को ढूंढने की कोशिश अब भी बहुत लोग नहीं कर रहे हैं। तत्त्व मीमांसाओं से जो कुछ भी निकल रहा है वह शुद्ध खांटी लोहिया हो ऐसा भी नहीं है। एक बात जरूर समझ में आती है- लोहिया होते तो सामाजिक संघर्ष जारी रहा होता। सामाजिक, संघर्षों में लोहिया की भूमिका अनुकरणीय रही है। बहुत गैर बराबरिया, गैर बराबरी के विवेचन से अलग है मानव के संघर्ष की व्याख्या का असर लोहिया का संघर्ष अलग था। लोहिया हिंसा को अस्वीकार नहीं करते थे, पर लोहिया का जन विद्रोह सिविलनाफरमानी का था। इस बदलती दुनिया में जड़ता को तोड़ने का लोहियावादी संघर्ष जारी ही रहता है। भारतीय समाज ने जिस प्रकार की करवट ली है, उसमें लोहिया के पास संघर्ष के अलावा कोई हथियार भी नहीं था। समता का स्वप्न और अन्याय का विरोध यही संघर्ष का मूल था। महंगाई के विरूद्ध वे जरूर दाम बांधने की बात कहते। नरेगा की बजाय भूमि सेना स्थापित करने की बात की गई होती। उनका ध्यान गंाव की महिलाओं के पानी ओर ईधन से जूझने की ओर अवश्य गया होता जातियों को तोड़ने की बात उन्होंने अवश्य उठाई होती। वे आमदनी और खर्च की विसंगतियों की अवश्य चर्चा करते है। उत्तर मार्क्सवाद के बाद बढ़ते पूंजीवाद की चर्चा भी उन्होंने की होती। आम आदमी पर सरकारी लाठी गोली के प्रश्न भी उन्होंने उठाये होते। भारतीय संस्कृति में धर्म के स्वरूप की उन्होंने ने अवश्य चर्चा की होती। इस शताब्दी के उभरते प्रतिमानों में लोहिया का योगदान अवश्य रहा होता। लोहिया के प्रश्न उस समय के प्रश्न भी थे और आज के भी लोहिया के प्रश्न उस समय के भी थे और भविष्य के भी।
यह बात भी कह देना जरूरी है कि लोहिया की बौद्धिकता और अन्वेषणी प्रकृति बहुत काम की रही होती। राष्ट्र की बौद्धिक धरती उन्हें पाकर जरूर संतुष्ट होती। लोहिया के सैद्धान्तिक परिप्रेक्ष्य अभी भी समझने लायक हैं लोहिया का अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और राजनीति शास्त्र भारत की समझ से पैदा हुआ था। ऐसी समझ भारत के राज नेताओं में अब नहीं मिलती। शाब्दिक आडम्बर, शाब्दिक जोश और बुद्धिहीन राजनीति भाषा में लोहिया कुछ अलग ही होते हैं। लोहिया वैसे भी अलग ही थे।
हम ऐसा क्यों सोच रहे है कि यदि लोहिया होते? ऐसा क्यों नहीं सोचते कि बजाये संसद के यदि लोहिया के विचारों से प्रभावित मैं जान बूझ कर यहां लोहियावादी शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहता। लोग समझ के साथ सामाजिक परिवर्तन के क्रान्तिकारी संघर्ष के साथ जुड़ते तो क्या होता? कहीं पर यह समझने की जरूरत है कि जो लोग लोहिया के साथ रहे वे सहसा सड़क की क्रांति छोड़कर संसदीय शिथिलता के शिकार कैसे हो गये। मंत्री होते ही वे फाइलों के जंगल में कैसे घिर गये और अपने मंत्रों का उच्चारण करना कैसे भूल गये। क्या सत्ता विचारों को पंगू और कमजोर बनाती है। मात्र उपदेशक बनना और विचारों का पाखण्ड ही किसी बौद्धिक की अन्तिम परिणति है। कहीं शायद हमें सोचना होगा। संसद के अंदर और संसद के बाहर लोहिया एक थे। पर जो लोग लोहिया के साथ रहे उनके संसद के अन्दर के आचरण और संसद के बाहर के आचरण मंे अंतर है। लोहिया यदि होते तो आचरण के इस दोहरे मानदण्ड पर अवश्य प्रहार कर गये होते।
फिर भी इस सामाजिक सोच में दम है। शायद यह भी सोचने की बात है जो कुछ भी उभरा है। उससे लोहिया कहीं फंस तो नहीं गये होते। आज की राजनीतिक फौज और तत्कालीन राजनीतिक फौज में बड़े अंतर है। जैसी कि आदत है और परम्परा भी लोहिया की पीठ पर भाजपा चढ़कर बाजे तो नहीं बजा रही होती। हमारे साम्यवादी मित्र का कहीं लोहिया के समता पर सोच पर अबूझ मार्क्सवादी सवाल तो नहीं उठा रहे होते और कांग्रेस कहीं इस संघर्ष पर लाठी गोली बरसा कर विनायक सेन की तरह उन्हें देश द्रोही तो करार नहीं दे देती। और क्या माओवादी लोहिया के सबसे बड़े समर्थक तो नहीं होते? ये बड़े स्वप्न भरे सवाल है जिनका कोई उतर नहीं है। हां उत्तर ढूंढने की प्रक्रिया जारी रहनी चाहिये। भारतीय समाज के जटिल प्रश्नों के उतरों की खोज संभवतः लोहिया को सब से बड़ी श्रद्धांजलि होगी क्योंकि उन्होंने खोज को एक नया आयाम दिया था।


विश्व सामाजिक बदलाव और युवा:-डॉ. नरेश भार्गव
पिछली एक सदी में विश्व व्यवस्था या विश्व सामाजिक व्यवस्था के सवाल उठते रहे हैं पर सच यही है कि आज कोई विश्व व्यवस्था है ही नहीं। अभी भी न कोई विश्व सरकार है ना ही कोई विश्व सेना। ना ही कोई विश्व कानून। मानव अधिकारों की विश्व स्वीकारोक्ति अभी बकाया है। यदि विश्व में देशों की संख्या बराबर बढ़ रही है संयुक्त राष्ट्र संघ संस्था बनी हुई है। देशों की सेनाओं को मिलाकर शांति सेना भी बनाई गई है पर यह सब कुछ बड़ा प्रभावशाली सिद्ध नहीं हुआ है। फिर भी एक विश्व समाज के बनाने की आकांक्षा बरकरार है। एक अंतर यहां बड़ा स्पष्ट है। पहले विश्व साम्राज्य की कल्पना को साकार करने के प्रयास थे। फौजंे चलती थी और साम्राज्य स्थापित करती थी। बाद में उपनिवेशवाद ने विश्व औपनिवेशिक समाज को स्थापित करने के प्रयास कियें। तानाशाही भी इसी दृष्टिकोण के साथ उभरी है। पर धीरे धीरे विश्व व्यवस्था के नये शांतिमय रूप भी उभरे। आज का सोच विश्व व्यवस्था के बारे में कुछ और है। मार्क्स ने विश्व साम्यवादी सामाजिक व्यवस्था की कल्पना की थी। ऐसा विश्व समाज जिसमें शोषण न हो और समता का समावेश हो। अंतर्राष्ट्रीय साम्यवाद ऐसी ही सोच थी। पर पूंजीवाद बदलता है। संशोधित होता है और स्थान्तरित होता है। अतः जाने अनजाने विश्व सामाजिक व्यवस्था का स्वरूप पूंजीवादी बन गया। जो कुछ भी हो रहा है। यदि अयादुराई की बात मान ले तो कई अवसर ऐसे खड़े हो गये है जो विश्व व्यवस्था को जन्म दे रहे है। जैसे दुनिया के लोगों को एक जगह से दूसरे जगह जाने के अवसर मिल गये हैं। विभिन्न प्रजातियां अब एक दूसरे से मिल रही हैं। और संस्कृति समन्वय स्थापित कर रही हैं। मिली जूली सांस्कृतिक व्यवस्था अब बन रही है। तकनीकी प्रसार तथा विनिमय विभिन्न समाजों की आवश्यकताओं को एक कर रहे है। वित्तीय आदान-प्रदान अधिक है और नई आर्थिक पूंजीगत नीतियां वित्तीय परिदृश्य बदल रही है। सूचना क्राति और संचार माध्यम जानकारियों के आदान-प्रदान के बहुत बड़े स्रोत हैं। सबसे बड़ी बात विचारधाराओं की एकता है। विचारधारा की एकता विश्व व्यवस्था के स्वप्न का बहुत बड़ा स्रोत है।
ये सभी परिदृश्य विश्व व्यवस्था की संरचना के परिदृश्य है, जिन्हें महज वैश्वीकरण कह कर छिन्न भिन्न नहीं किया जा सकता है। घटनाओं की इन यथार्थताओं को हमें चिन्हित करना पडेगा। संयोग से विश्व व्यवस्थाओं के इस स्वप्न और संरचना के निर्माण में युवा मन और युवा सोच ही अधिक है। विभिन्न परिदृश्यों में युवा सोच ही अधिक प्रभावशाली हैं नई पीढ़ी की विश्व दृष्टि रचनात्मक है। नई विश्व राजनीति और आर्थिक संरचनाओं में युवा मन आगे आया और अपनी सोच को जोरदार तरीके से कह भी रहा है। लेकिन कहीं हमें वैचारिक संरचनाओं को तैयार करना पड़ेगा। शायद यह सोच संरचना समता के प्रश्न इसके सामने होंगे ओर मानवीय भावनाओं को इसमें पूर्ण समावेश होगा। पिछले चार दशकों में विश्व युवा सोच बदली है। शायद यह एक नई विचारधाराओं के उभरने का संकेत है जो विश्व व्यवस्था के नये ढांचे को तैयार करने में मदद दे सकती है।



प्रस्तुति:-हिम्मत सेठ, डॉ. फरहत बानो,डॉ. प्रेमिला सिंघवी, डॉ. प्रेमसिंह डाबी,डॉ. हेमेन्द्र चण्डालिया 
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