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डॉ. नरेश अग्रवाल की किताब के अंश

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, मार्च 31, 2011 | गुरुवार, मार्च 31, 2011

1. सुबह किस लिए होती है कभी पूछा है तुमने अपने आप से ? सूरज उगते ही
सारे कामों में जागृति ला देता है . रात के सारे रुके हुए काम फिर से
शुरु हो जाते हैं . यह वैसा समय है जब चारों ओर सुंदर-सुंदर फूल और पत्ते
दिखाई देने लगते हैं . पक्षी उड़ते हुए और जहां बर्फ है वह पिघलती हुई.
फिर ऐसे समय में आलस्य क्यों? कभी थके हुए पक्षी मिल जाएं तो मुझे बताना.
कभी बादल रुके हुए दिखाई दें तो बताना. जिस दिन सागर की लहरों में शांति
आ जाएगी उस दिन समझ लो, सारा जीवन मूर्छित हो जाएगा. मुझे चाहिए तुम्हारे
दोनों हाथ जो यह महसूस करते हों कि उनके पास दस अंगुलियां भी हैं और
उन्हें संचालित करने वाला एक सक्रिय दिमाग भी. अपने सारे साधनों का उपयोग
करने को प्रेरित करती है सूरज की रोशनी. अब तुम इससे कितनी अधिक प्रेरणा
लेती हो, यह तुम पर निर्भर है. तुम्हें गंभीर होना चाहिए उस नमक की तरह
जो अपने एक छोटे से टुकड़े भी अपनी ताकत दिखला देता है.


2. चमकते हुए सूरज का प्रकाश जब दर्पण पर पड़ता है तो वह उसे इतनी तेजी
से लौटाता है कि  उस तेज से आंखें बंद कर लेनी पड़ती हैं. हमारा मस्तिष्क
एक दर्पण है. जितना ज्ञान इसे दिया जाता है वह दूसरों को भी उतना ही देने
के काबिल हो जाता है. यह शिक्षा केवल तुम्हारे लिए ही नहीं है, कल दूसरों
के भी काम आएगी. इस शिक्षा का हू – ब – हू  इस्तेमाल नहीं होता, बल्कि
इसके सहारे जो तुमने जाना है उससे मिलती – जुलती  चीजों से संबंधित
समस्याओं का निवारण भी होता है. जैसे एक बार तैरना सीख जाने पर किसी भी
जल में तैर सकती हो या पेड़ उगाने की विधि जान लेने पर कहीं भी उसे उगा
पाओगी. लेकिन भ्रमित और अधूरी शिक्षा से कुछ बड़ा कर पाने की लालसा,
अच्छी शिक्षा के मार्ग में बाधक है. धैर्य ही समय को जीतता है और अज्ञान
को भी. जिस तरह से सूई में तुम धागे को धीरे-धीरे पिरोती हो वैसे ही समय
चुपचाप पास से गुजरता जाता है. उसे पहचानो और उसका उपयोग करो.


3. जैसे एक कौआ थोड़ी सी धमक से ही तुरंत उड़ जाता है और शोर मचाने लगता
है वैसे ही मन थोड़ा सा भी डरा नहीं कि ढेर सारे विचारों की बाढ़ लाकर
हमें अशांत कर देता है. फिर घंटों हम परेशान रहते हैं और परेशान और डरे
हुए मन से किसी भी चीज का सृजन नहीं हो सकता, ना ही किसी तरह की पढ़ाई.
जिस समय तुम सबसे अधिक खुश होती हो, वही सृजन का  श्रेष्ठ  समय है उसी
वक्त सब कुछ अच्छी तरह से पढ़ा जा सकता है. परीक्षा के अंतिम दिनों में
बेहद दबाव में आकर पढ़ी गई चीजें अक्सर किसी काम की नहीं होतीं. बल्कि जो
हमारी सामथर्य  है यानी जिन चीजों को हम अच्छी तरह से लिख सकते थे, उन पर
भी यह  दबाव की स्थिति बुरा असर डालती है.


4. रात में हमारी गतिविधियां सिमट कर छोटी हो जाती हैं. लैंप के प्रकाश
में किताबें सामने होती हैं और अकेली तुम. एक प्रेम चल रहा होता है-
दोनों के बीच. किताबें किसी तरह से भी तुम में प्रवेश चाहती हैं और तुम
भी उन्हें हृदय में बैठा लेना चाहती हो. कुछ डूब रहा होता है तुम्हारे
अंदर में हर पल. इस वक्त थोड़ी सी भी आवाज तुम्हें बहुत कष्ट  पहुंचाती
है. ज्ञानार्जन अधिक संतुष्ट  करता है  हमें. लगता है विशाल से विशाल
चीजें हममें आश्रय ले रही हैं. हम स्थिर क्यों न हों फिर भी कमरे से बाहर
निकल कर कितना कुछ देख पा रहे हैं. हर बार अपने में आत्मविश्वास बढ़ता
हुआ और लगता है कि यह सुबह कभी आए नहीं. विषयों  को अच्छी तरह से पढऩा
हमें इसी तरह की संतुष्टि देता है.

नरेश अग्रवाल वर्तमान में जमशेदपुर में रहते हुए 
राजस्थानी पर आधारित पत्रिका 'मरुधर' का सम्पादन
 कर रहे हैं.यदा कडा कविता करते हुए एक लेखक 
के रूप में भलीभांति पहचाने जाते हैं.-उनसे संपर्क हेतु 
पता:-9334825981,www.nareshagarwala.com
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1 टिप्पणी:

  1. नरेश जी की किताब के अंश पढे और उनका मनोविज्ञान जाना…………अच्छा लगा।

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'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


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