डॉ.नमन दत्त "साबिर" की चुनिन्दा गज़लें - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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डॉ.नमन दत्त "साबिर" की चुनिन्दा गज़लें

डॉ.नमन दत्त "साबिर"
वरिष्ठ व्याख्याता
   इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय
  खैरागढ़ (छत्तीसगढ़)
"घरौंदा" - 61 क
वार्ड नंबर 19
सिविल लाइन्स
खैरागढ़ (छत्तीसगढ़)
पिन - 491881
फ़ोन - 07820 -234099
+919425560699




एक


अश्क भरे हैं इन आँखों में, कैसे हम मुस्कायें.
                    हम लोग सताए हैं ग़म के, क्या गीत ख़ुशी के गायें.
क्या कहिये हम अहले ग़म की, ज़िंदगी कैसे कटती है,
                    दिन जो गुज़रा रो रो के तो रात की ख़ैर मनाएँ.
रात घिर आई, राहें कहती हैं घर अपने वापस चल,
                    हम हैं अहले-गर्दे-सफ़र, हम क्या घर लौट के जायें.
मत बहलाओ दिल मेरा, मुझको नाशाद ही रहने दो,
                    चंद ख़ुशी के लम्हे अपना ग़म दूना कर जायें.
क्यूँ कर गया परेशाँ “साबिर” ज़िक्र बहारें आने का,
                    क्यूँ ख़ुशगवार मौसम में भी दीवाने घबराएँ.
                              

दो 

कि जितनी कोशिशों से मैं तुम्हें भुलाता हूँ.
                    क़रीब उतने ही तुमको मैं अपने पाता हूँ.
उन्होंने की ही नहीं, फिर वो निबाहें क्यूँ कर,
                    मैंने तो की है मुहोब्बत सो मैं निभाता हूँ.
तुम्हारे ग़म से रौशनी है दिले बिस्मिल में,
                    सरे मज़ार मैं हर शब दिया जलाता हूँ.
ग़म की राहों पे कोई आ सके न बाद मेरे,
                    इसी ख़याल से ख़ुद नक्शे पा मिटाता हूँ.
ये मेरे शेर नहीं, दिल के दाग़ हैं “साबिर”
                    मिले हैं आपसे जो, आपको दिखाता हूँ.

(डॉ. नमन दत्त जी का 'अपनी माटी' परिवार में हार्दिक स्वागत है.-सम्पादक )

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