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अवनीश सिंह, आज़मगढ़ की कविता

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on बुधवार, मार्च 02, 2011 | बुधवार, मार्च 02, 2011

काश !

बचपन से लेकर आज तक ये  सुनते आ रहे हैं कि,
हम  बदल रहे हैं,हम परिवर्तन चाहते हैं
रूढ़िवाद,जातिवाद,क्षेत्रवाद सब से छुटकारा चाहते हैं
ये भी सुना था ,
 हम बदलेंगे ,युग बदलेगा,बदलेगा ये हिन्दुस्तान
पर आज सोचता हूँ,
क्या हम सचमुच बदलना चाहते हैं?
बदलना भी तो कैसे?
हम तो आज भी नहीं बदले,
वहीं खड़े हैं दशकों पीछे,सदियों पीछे

प्रश्न ये है की हम क्यों बदलें
क्यों करें ये परिवर्तन,क्यों बदलें ये हिन्दुस्तान
हम नहीं बदलेंगे क्योंकि हम तो हिंदू या मुसलमान हैं,
हम तो  सिख या ईसाई हैं ,
कौन कहता है की हम भाई भाई हैं
क्यों दें हम किसी को सम्मान ,
हमें तो अपना अहं प्यारा है
क्यों ना करें हम एक दूसरे का अपमान
क्यों ना फैलाएं हम दंगे प्रतिदिन,
यह तो जन्मसिद्ध अधिकार हमारा है
हम दंगे करेंगे , मारपीट करेंगे
अपने राज्य में दूसरे राज्य की भाषा नहीं सुनेंगे
क्योंकि हमारे लिए राष्ट्र का कोई महत्त्व नहीं है
हम पहले भाषा हैं , राज्य हैं , संप्रदाय हैं,
राष्ट्र उसके बाद कहीं है\
हम जातिवाद फैलायेंगे , क्षेत्रवाद फैलायेंगे
राष्ट्रभाषा में शपथपत्र पढ़ने पर हंगामा करेंगे
हम क्यों बदलें ,हम नहीं बदलेंगे \

       पर कब तक ?
       आखिर कब तक ?
कब तक भाषा , धर्म और जाति का रोना रोयेंगे?
कब तक दंगे फसाद करके अपने ही भाइयों का खून बहायेंगे?
कब तक हम एक दूसरे से दूर रहेंगे?
कब तक अपना प्यार सबसे नहीं बाँटेंगे?
       हमें बदलना ही होगा
जात-पाँत,भाषा,क्षेत्र जैसी नफरत की दीवारों को गिराना ही होगा\
"वसुधैव कुटुम्बकम" के अनुयायी अपने ही कुटुंब से दूर क्यों?
         हमें बदलना होगा
पर क्या हम ये परिवर्तन कर पायेंगें?

काश ! हम बदल जाते ,
सब कुछ भूलकर सबके गले लग जाते
सबको प्यार देते और सबसे प्यार पाते
सबके साथ सुख और दुःख बांटते
सबके दर्द में मरहम बन जाते
                 काश ! हम बदल जाते,
                            काश !

अवनीश सिंह 
आज़मगढ़ 
साहित्य और कला में प्रवृति हैं. 
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