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शरद तैलंग की चुनिन्दा गज़लें

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on बुधवार, मार्च 02, 2011 | बुधवार, मार्च 02, 2011


         शरद तैलंग

कोटा, राजस्थान,
सुगम संगीत गायक
व्यंग्यकार रंगकर्मी,
ग़ज़लकार,कवि,आयोजक,
पूर्व कार्यकारिणी सदस्य -
राजस्थान संगीत नाटक अकादमी
संयोजक सप्त शृंगार संस्था,


अपनी बातों में असर पैदा कर

अपनी बातों में असर पैदा कर
तू समन्दर सा जिगर पैदा कर


बात इक तरफा न बनती है कभी,

जो इधर है वो उधर पैदा कर ।



बात है मीर में जो गालिब में ,

शायरी में वो हुनर पैदा कर ।



अपनी पहचान हो न मज़हब से,

मुल्क़ में ऐसी लहर पैदा कर ।



कुछ भरोसा नहीं है सूरज का,

तू नई रोज़ सहर पैदा कर ।



जीस्त का लुत्फ़ जो लेना हो ’शरद’

एक बच्चे सी नज़र पैदा कर ।


जो अलमारी में हम

जो अलमारी में हम अख़बार के नीचे छुपाते हैं,
वही कुछ चन्द पैसे मुश्किलों में काम आते हैं ।

कभी आँखों से अश्कों का खजा़ना कम नहीं होता ,
तभी तो हर खुशी, हर ग़म में हम उसको लुटाते हैं ।

दुआएं दी हैं चोरों को हमेशा दो किवाड़ों ने,
कि जिनके डर से ही सब उनको आपस में मिलाते हैं ।

खुदा हर घर में रहता है वो हमको प्यार करता है,
मग़र हम उस को अपने घर में माँ कह कर बुलाते हैं ।

मैं अपने गाँव से जब शहर की जानिब निकलता हूँ ,
तो खेतों में खड़े पौधे इशारों से बुलाते हैं ।

’शरद’ ग़ज़लों में जब भी मुल्क़ की तारीफ़ करता है ,
तो भूखे और नंगे लोग सुनकर मुस्कराते हैं ।





जब कबाडी़ घर से कुछ 
जब कबाडी़ घर से कुछ चीजें पुरानी ले गया,
वो मेरे बचपन की यादें भी सुहानी ले गया ।

इस तरह सौदा किया है आदमी से वक़्त ने,
तज़रुबे कुछ दे के वो उसकी जवानी ले गया ।

दिन ढ़ले जाकर तपिश सूरज की यूं कुछ कम हुई,
अपने पहलू में उसे सागर का पानी ले गया ।

आ गया अख़बार वाला हादिसे होने के बाद,
बातों ही बातों में वो मेरी कहानी ले गया ।

क्या पता फिर ज़िन्दगी में उनसे मिलना हो न हो,
बस ’शरद’ ये सोचकर उसकी निशानी ले गया ।




ये बडा़ एहसान है



पत्थरों का ये बडा़ एहसान है,
हर क़दम पर अब यहाँ भगवान है ।

जो बुझा पाई न नन्हे दीप को,
ये हवाओं का भी तो अपमान है ।

फिर खिलौनों की दुकाने सज गईं,
मुश्किलों में बाप की अब जान है ।

दफ़्न है सीने में मेरी आरजू़ ,
बन गया दिल जैसे कब्रिस्तान है ।

देखता ही शब्द बेचारा रहा,
अर्थ को मिलता रहा सम्मान है ।

जब कोई प्यारा सा बच्चा हँस दिया,
यूं लगे सरगम भरी इक तान है ।

आप सबके ख्बाब हो पूरे सभी,
बस ’शरद’ के दिल में ये अरमान है ।






दिल के छालों का ज़िक्र आता है

दिल के छालों का ज़िक्र आता है,
उनकी चालों का ज़िक्र आता है ।


प्यार अब बांटने की चीज़ नहीं,
शूल, भालों का ज़िक्र आता है ।


सूर, मीरां, कबीर मिलते नहीं,
बस रिसालों का ज़िक्र आता है ।


लोग जब हक़ की बात करते हैं,
बन्द तालों का ज़िक्र आता है ।


जब बिना शह ही मात खाई है,
कुछ दलालों का ज़िक्र आता है ।


आग जब दिल में जलने लगती है,
तब मशालों का ज़िक्र आता है ।


जल के मिट तो रहे थे परवाने,
पर उजालों का ज़िक्र आता है ।


पाँच वर्षों में ’शरद’ भूखों के,
फिर निवालों का ज़िक्र आता है ।


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1 टिप्पणी:

  1. मनोज जी !
    शरद जी
    सादर नमस्कार !
    शरद जी कि उम्दा ग़ज़लों के लिए , साधुवाद .
    सादर

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