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अनिल सिन्हा:-काम जब आदमी को बड़ा बनाता है रह रहकर याद आता है

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शनिवार, मार्च 05, 2011 | शनिवार, मार्च 05, 2011

लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा के अचानक अपने बीच से चले जाने से हमने ऐसा मजबूत और ऊर्जावान साथी खोया है जिनसे जन सांस्कृतिक आंदोलन को अभी बहुत कुछ पाना था। उनके व्यक्तित्व व कृतित्व से नई पीढ़ी को बहुत कुछ सीखना था। सत्तर के दशक में और उसके बाद चले सांस्कृतिक आंदोलन के वे अगुआ थे। अनिल सिन्हा कलाओं के अर्न्तसम्बन्ध पर जनवादी, प्रगतिशील नजरिये से गहन विचार और समझ विकसित करने वाले विरले समीक्षक और मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता के मानक थे। अपनी इन्हीं विशेषताओं की वजह से प्रगतिशील रचनाकर्म के बाहर के दायरे में भी उन्हें सम्मान प्राप्त था।

यह विचार कवि व जसम के संयोजक कौशल किशोर ने ‘स्मृति अनिल सिन्हा’ के अन्तर्गत आयोजित स्मृति सभा में शोक प्रस्ताव के माध्यम से व्यक्त किये। जाने.माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा का निधन 25 फरवरी को पटना में मस्तिष्क आघात से हुआ। उनकी स्मृति में जन संस्कृति मंच ने उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ के प्रेमचंद सभागार में 27 फरवरी को शोकसभा का आयोजन किया। कार्यक्रम का संचालन कवि.आलोचक चन्द्रेश्वर ने किया। चन्द्रेश्वर का कहना था कि इससे बढ़कर हमारे लिए दुख की बात क्या होगी कि आज इस सभागार में शमशेर, केदार व नार्गाजुन जन्मशती का आयोजन था। अनिल सिन्हा इस समारोह के मुख्य कर्ता.धर्ता थे। लेकिन अनिलजी हमारे बीच नहीं रहे और हमें इस सभागार में उनकी स्मृति में शोकसभा करनी पड़ रही है।

11 जनवरी 1942 को जहानाबाद, गया, बिहार में जन्मे अनिल सिन्हा ने पटना विश्वविद्यालय से 1962 में एम. ए. हिन्दी में उतीर्ण किया। विश्वविद्यालय की राजनीति और चाटुकारिता के विरोध में उन्होंने अपना पी एच डी बीच में ही छोड़ दिया। प्रूफ रीडिंग, प्राध्यापिकी, विभिन्न सामाजिक विषयों पर शोध जैसे कई तरह के काम किये। 70 के दशक में उन्होंने पटना से ‘विनिमय’ साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया था जो उस दौर की अत्यन्त चर्चित पत्रिका थी। आर्यावर्त, आज, ज्योत्स्ना, जन, दिनमान से वे भी जुड़े रहे। 1980 में जब लखनऊ से अमृत प्रभात निकलना शुरू हुआ, वे मंगलेश डबराल, अजय सिंह, मोहन थपलियाल आदि के साथ यहीं आ गये। तब से लखनऊ ही उनका स्थाई निवास था। अमृत प्रभात लखनऊ संस्करण के बन्द होने के बाद उन्होंने नवभारत टाइम्स में काम किया। दैनिक जागरण, रीवाँ के भी वे स्थानीय संपादक रहे। लेकिन वैचारिक मतभेद की वजह से उन्होंने वह अखबार छोड़ दिया। ‘राष्टीªय सहारा’ में साहित्यिक पृष्ठ ‘सृजन’ का भी उन्होंने सम्पादन किया था।

कहानी, समीक्षा, अलोचना, कला समीक्षा, भेंट वार्ता, संस्मरण आदि कई क्षेत्रों में उन्होंने काम किया। ‘मठ’ नम से उनका कहानी संग्रह पिछले दिनों 2005 में भावना प्रकाशन से आया। पत्रकारिता पर उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘हिन्दी पत्रकारिता: इतिहास, स्वरूप एवं संभावनाएँ’ प्रकाशित हुई। पिछले दिनों उनके द्वारा अनूदित पुस्तक ‘साम्राज्यवाद का विरोध और जतियों का उन्मूलन’ छपकर आया। अनिल सिन्हा जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में थे। जन संस्कृति मंच उत्तर प्रदेश के पहले सचिव के रूप में सांस्कृतिक आंदोलन का उन्होंने नेतृत्व किया था। इस समय वे उसकी राष्ट्रीय परिषद के सदस्य थे। इंडियन पीपुल्स फ्रंट जैसे क्रान्तिकारी जनवादी संगठन के गठन में भी उनकी भूमिका थी। भाकपा ;मालेद्ध से उनका जुड़ाव उस वक्त से था जब पार्टी भूमिगत थी।

अनिल सिन्हा को याद करते हुए उनके घनिष्ठ सहयोगी तथा कवि.पत्रकार अजय सिंह ने शोकसभा के मौके पर कहा कि अनिल सिन्हा से मेरा साथ सत्तर के दशक के शुरू में ही हो गया था। हमने सांस्कृतिक.राजनीतिक आंदोलनों में मिलकर काम किया। लखनऊ से जब अमृत प्रभात निकलना शुरू हुआ, हम यहीं आ गये। हमारी घनिष्ठता और बढ़ी। हमने यहाँ नवचेतना सांस्कृतिक संगठन बनाया। जन संस्कृति मंच, इंडियन पीपुल्स फ्रंट तथा भकपा ;मालेद्ध में हमने साथ काम किया। इन आंदोलनों में तपकर ही अनिल सिन्हा के रचनात्मक व वैचारिक व्यक्तित्व का निर्माण हुआ था। लेखन व पत्रकारिता के साथ ही अनिल की चित्रकला व संगीत में भी गहरी रूचि थी। पिछले दिनों दिल्ली में शमशेर जन्मशती आयोजन के अवसर पर अनिल ने शमशेर की कलाकृतियों पर व्याख्यान दिया था। इससे कला के बारे में उसकी गहरी समीक्षा दृष्टि का पता चलता है। अनिल के इस तरह असमय हमारे बीच से चले जाने से जो सूनापन पैदा हुआ है, उसे भर पाना आसान नहीं होगा।

अनिल सिन्हा को याद करते हुए वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने कहा कि अनिल सिन्हा शान्त स्वभाव के बेहतर इन्सान थे। आत्मप्रचार से दूर उनका लेखन सादगी व संघर्ष का लेखन है। उनका व्यक्तित्व ऐसा रहा है जिस पर आप भरोसा कर सकते हैं। आज के समय में ऐसे इन्सान का मिलना कठिन होता जा रहा है। वे मानवीयता के ऐसे उदाहरण हैं जिनसे सीखा जा सकता है।

प्रगतिशील लेखक संघ की ओर अनिल सिन्हा को श्रद्धांजलि देते हुए आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि 1980 के बाद अमृत प्रभात में काम करते हुए राकेश के साथ अनिल सिन्हा से हर इतवार को हमारी मुलाकात हुआ करती थी। हमारे बीच कला, साहित्य तथा वामपंथी राजनीति को लेकर विचार.विमर्श होता था। विचारों की साफगोई उनके लेखन में हमें देखने को मिलती है। वे एक अच्छे समीक्षक थे। उन दिनों मैं ‘प्रयोजन’ साहित्यिक पत्रिका निकालता था। इस पत्रिका को उनका सहयोग व सुझाव मिला। उन्होंने अब्दुल बिस्मिल्लाह के उपन्यास ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ की समीक्षा की थी। अनिल सिन्हा का नजरिया मूलतः समाज को बदलने का रहा है। उनका लेखन व पत्रकारिता इसी के प्रति प्रतिबद्ध है।

जनवादी लेखक संघ की ओर से ‘निष्कर्ष’ के सम्पादक गिरीशचन्द्र श्रीवास्तव ने श्रद्धासुमन अर्पित किये।। उनका कहना था कि अनिल सिन्हा अत्यन्त सक्रिय रचनाकार थे। इनके जीवन में कोई दोहरापन नहीं था। जो अन्दर था, वही बाहर। आज के दौर में ऐसे रचनाकार का मिलना कठिन है। आज तो हालात ऐसी है कि दो.चार रचनाएँ क्या छपी, लेखक महान बनने की महत्वाकांक्षा पालने लगते हैं। अनिल सिन्हा इस तरह की महत्वकांक्षाओं से दूर काम में विश्वास रखने वाले रचनाकार रहे, साहित्य की राजनीति से दूर। इसीलिए उपेक्षित भी रहे।

हिन्दी.उर्दू लेखक शकील सिद्दीकी का कहना था कि लखनऊ के जिन दो रचनाकारों के व्यक्तित्व ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया, वे अनिल सिन्हा व मोहन थपलियाल थे। ये दोनों विश्वसनीय व्यक्ति थे। अनिल सिन्हा ने गलत को कभी स्वीकार नहीं किया। उनकी खूबी यह भी थी कि अपने विरोध को भी बड़ी शालीनता से दर्ज कराते थे। कथाकार शिवमूर्ति ने अनिल सिन्हा को याद करते हुए कहा कि रेणुजी भी पटना में लम्बी मूर्छा में रहते हुए दिवंगत हुए। उनके निधन ने सबको मर्माहत किया तथा बड़ी भारी रिक्तता छोड़ी। अनिल सिन्हा ने फिर वही कथा दोहराई है। इनकी बातचीत तथा व्यवहार में जो शीतलता व शान्ति थी, वह सचमुच अदभुत थी। ये बातचीत में न सिर्फ अपनी बात कहते बल्कि दूसरों को सुनने का स्पेस भी प्रदान करते।

अनिल सिन्हा के पुत्र शाश्वत सिन्हा ने इस मौके पर कहा कि मेरे पापा बेटे.बेटियो के बीच कोई फर्क नहीं करते थे और हम सभी के साथ उनका रिश्ता दोस्तों जैसा था। सात साल से मैं अमरीका में हूँ। वे इतने संवेदनशील थे कि फोन पर ही वे बातचीत से ही मेरी समस्याओं को, यहाँ तक कि मेरी खामोशी को भी पढ़ लेते थे। पापा जिस पारिवारिक परिवेश से आये थे, वह सामंती व धार्मिक जकड़न भरा था। उन्होंने इस जकड़न के खिलाफ संघर्ष करके अपने को आधुनिक व प्रगतिशील बनाया था। उन्होने यही संस्कार हमें दिये। आज हमारे लिए बड़ी चुनौती है कि पापा ने सच्चाई, सहजता, आत्मीयता, मानवता व जनपक्षधरता के जो मूल्य सहेजे थे, उन्हें हम कैसे जियें, अपने जीवन में हम उन्हें कैसे सफलीभूत करें।

इस अवसर पर पी यू सी एल व राही मासूम रजा अकादमी की ओर से कवयित्री.पत्रकार वंदना मिश्र, एपवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन, कथाकार सुभाषचन्द्र कुशवाहा, लखनऊ विश्वविद्दालय के प्रो0 रमेश दीक्षित, जसम की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवयित्री शोभा सिंह, जसम दिल्ली इकाई की सचिव पत्रकार भाषा सिंह, पत्रकार महेश पाण्डेय व अनुराग सिंह, कवि अशोक चन्द्र व भगवान स्वरूप कटियार आदि ने भी अनिल सिन्हा को अपनी शोक संवेदना प्रकट की तथा अपने विचार रखे।

वक्ताओं का कहना था कि अनिल सिन्हा बेहतर व मानवोचित दुनिया की उम्मीद के लिए निरन्तर संघर्ष में अटूट विश्वास रखने वाले रचनाकार हैं। वे मानते रहे हैं कि एक रचनाकार का काम हमेशा बेहतर समाज का निर्माण करना है, उसके लिए संघर्ष करना है। उनका लेखन इसी लक्ष्य को समर्पित है। इसीलिए अनिल सिन्हा जैसे रचनाकार कभी नहीं मरते। अपने काम और विचारों के साथ हमेशा हमारे बीच जिन्दा रहते हैं। ये हमारे आंदोलन के ऐसे प्रकाश स्तम्भ हैं जो हमें आगे बढ़ने की रोशनी दिखाते हैं।

संस्कृतिकर्मी और जसम के कर्ताधर्ता

कौशल किशोर

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