डॉ. वीरेंद्र सिंह गोधारा की एक कविता - अपनी माटी Apni Maati

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डॉ. वीरेंद्र सिंह गोधारा की एक कविता

हताशा

देवासुर संग्राम
अब केवल पौराणिक पोथों में होता है
समाज में होती रही इस सतत प्रक्रिया को
समय ने लील लिया है
देव कहाँ हैं अब?
असुर ही असुर हैं
देव जैसे दिखने वाले
अध्यात्म की दुकानें सजाए बैठे हैं
संग्राम अब भी हो रहा है
किन्तु असुर और असुर के बीच
अब यह हमारे बस में नहीं
कि सत्य तथा न्याय का पक्ष ले सकें
साथ किसी का भी दें
हमारा चरण
असत्य तथा अन्याय के मार्ग पर होगा


(वीरेंद्र सिंह गोधारा,कोटा राजस्थान के वासी है,
पेशे से चिकित्सक थे, अब सेवानिवृत होकर  साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय  है,ख़ास तौर पर पुराने संगीत संग्रह के वे शौक़ीन है.godharavs1947@hotmail.com,09829961235)

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