डॉ. सत्यनारायण व्यास के ''काव्य संग्रह 'असमाप्त यात्रा' से - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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डॉ. सत्यनारायण व्यास के ''काव्य संग्रह 'असमाप्त यात्रा' से

वेदना का भील-नृत्य

काली रात
भयानक सन्नाटा
विचारों का मरघट धधकता है,
माटी की हंडिया-सा माथा
बूढ़े बरगद की डाल पर लटका कर 
प्रेत-सा उन्मत्त मैं
वेदना का भील-नृत्य करता हूँ

जलती चिता को ठोकर लगा
अधजली लाश बाहर खींच लेता हूँ
देखता प्रतिबिम्ब उसमें,
ढूँढता हूँ नियति अपनी
अचानक तभी-
कलेजे की धड़कन को चीरता
चीखता एक चमगादड़
मेरा अवचेतन-घट फोड़ जाता है
और फड़फड़कर वह
जबरे बरगद की लम्बी जटा में
उलटा लटक जाता है,
तब मैं और अधिक
बर्बर हो उठता हूँ,
अभिव्यक्ति के ब्रह्मराक्षक से
निर्णायक युद्ध लड़ने को
लाश के भीतर अपनी
रीढ़ की हड्डी ढूँढता हूँ
ताकि शब्दों का वज्र निर्मित हो

माटी का हाड-चाम
माटी का लौंदा
हर रात रौंद जाता है
मेरे विचार-मरघट को
जिजीविषा की दारू
जी भर पी कर मैं
अपने नयनांगारों में
हाथ की नंगी तलवार के बिम्ब नचाता हूँ
और दूसरे क्षण
भीषण अट्टहास के साथ
घने रोमीले अपने वक्ष की रेत पर
लहू की धार में
दुनिया को नहाते देखता हूँ
वेदना का यह भील-नृत्य
रचना की शब्द-परे पीड़ा है
भीतर के बीहड़ अंध जंगल में
न मरघटों की गिनती है
न लाशों,चिमगादड़ों की
रह-रह कर अंधड़
इस वेग से उठते है
की दबाते-दबाते भी
 उन धधकती चिताओं की राख के कतरे
चंद कागजों पर फ़ैल जाते हैं
गोया
भीषण विनाश की अशब्दता को
रचना के आकार में ठेल जाती हैं



डॉ. सत्यनारायण व्यास 
(कवि और समालोचक  )
29,छ्तरीवाली खान,
सैंथी,चित्तौडगढ 01472-241532.








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