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'जीवन में यात्राओं और साहित्य में यात्रा-वृतांतों का अकाल ही रहा'-डॉ. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, अप्रैल 09, 2011 | शनिवार, अप्रैल 09, 2011

दुर्गा बाबू जी 
(साहित्य-संस्कृति के जानकार और कोलेज शिक्षा से सेवानिवृत प्राचार्य डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल से युवा समीक्षक  डॉ. पल्लव की बातचीत यहाँ पाठकों के हित में हम प्रकाशित कर रहे हैं.ये बातचीत मधुमती के हालिया अंक में छपी है और हम यहाँ इस लिंक के सौजन्य से छाप रहे हैं.-सम्पादक )

हिन्दी में शुरुआत में ही घुमक्कड शास्त्र् (राहुल सांकृत्यायन) जैसी किताब और उससे भी पहले हमारी परम्परा की जड में रामायण (राम का अयन, अयन का अर्थ भ्रमण भी है) होने के बावजूद क्या कारण है कि हिन्दी में यात्रओं पर लिखने की कोई बडी परम्परा नहीं मिलती ? 

उ. तुमने तो शुरू में ही मुझे उलझन में डाल दिया है। आमतौर पर कहा-माना जाता है कि हमारे देश में पर्यटन, देशाटन - चाहे जो भी नाम उसे दे लो, की बडी अच्छी परम्परा रही है। चार धाम वाली परिकल्पना को इस संदर्भ में अक्सर स्मरण किया जाता है, लेकिन मुझे यह लगता है कि हमारा समाज एक यात्रा-भीरु समाज रहा है। अब यही बात देख लो ना कि दूर-दूर के देशों से न जाने कितने विदेशी भारत आए और उन्होंने यहाँ की अनजानी जगहों को देखा और उनके बारे में लिखा। फाह्यान, ह्वेनसांग, इब्न बतूता, अल बरूनी, बर्नियर, मार्कोपालो - ये नाम तो तुरन्त ही याद आ रहे हैं। लेकिन मुझे एक भी ऐसा भारतीय याद नहीं आता जो किसी पराये देश में गया हो, उसने वहाँ की पडताल की हो और उसके बारे में कोई वृत्तांत लिखा हो। पराये देश में भी और अपने देश में भी। ऐसा बिना किसी वजह के तो नहीं रहा होगा ना। तो, इस बात के कारण भी हैं। मसलन हमारी खान-पान की आदतें और संस्कार। हरेक का खान-पान दूसरे से इतना अलग कि पूछिये मत और अनेकानेक वर्जनाएँ। यह भी कि मैं उसके हाथ का खाना नहीं खाता और अगर मैं उसके हाथ का बना खाना खा भी लेता हूँ तो वह मेरे हाथ का बना खाना नहीं खाता। शुद्धता और पवित्रता को लेकर अलग ही किस्म के आग्रह। 

अब तुम्हारे प्रश्न पर आता हूँ। देखो, एक तो मुझे लगता है कि हमारा साहित्य परिदृश्य कविता से अत्यधिक आतंकित रहा है। साहित्य का मतलब ही एक तरह से कविता रहा, जिसे साहित्य में दिलचस्पी होती है, वह फौरन कविता लिखना शुरू कर देता है। अगर कविता नहीं तो कहानी और उससे थोडा आगे बढे तो उपन्यास। बहुत हुआ तो नाटक, बात खत्म। अन्य विधाओं को तो हाशिये तक भी नहीं पहुँचने दिया गया। ऐसा किसने किया ? तो मैं कहूँगा कि साहित्य के अध्यापकों ने यह गडबडझाला किया। साहित्य के संस्कार तो वे ही बनाते हैं ना। तो उन्होंने यह स्थापित कर दिया (चाहे अनचाहे ही सही) कि साहित्य का मतलब कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक हैं, बस। तो जिन्हें लिखना था वे इसी तरफ चल पड़े । 

दूसरी बात यह हुई कि हमारी आलोचना भी मुख्यतः इन्हीं विधाओं के इर्द-गिर्द घूमती रही। परिणाम यह हुआ कि इतर विधाओं में जो कुछ भी, जितना भी और जैसा भी लिखा गया, उस पर लोगों का ध्यान ही नहीं गया.आलोचना का एक काम ‘प्रकाश डालना’ भी तो है। इतर विधाएँ आलोचना के इस प्रकाश से वंचित ही रहीं। अब यात्र साहित्य की ही बात लो, अभी कुछ समय पहले समकालीन सृजन का यात्रओं का जक्र शीर्षक से जो विशेषांक आया था, उसमें परिशिष्ट के रूप में हिन्दी में प्रकाशित यात्र विषयक पुस्तकों की एक सूत्री भी दी गई थी। हममें से शायद ही किसी को पता हो कि हिन्दी में इतनी पुस्तकें इस विधा में आ चुकी हैं और स्वाभाविक ही है कि कोई भी सूची पूर्ण नहीं हो सकती। तो, जितनी बडी यह सूची है, वास्तव में तो पुस्तकों की संख्या उससे अधिक ही है। तो, मैं कहना यह चाहता हूँ कि हिन्दी में यात्रा साहित्य की स्थिति उतनी दयनीय नहीं है, जितनी का रोना रोया जाता है। असल में पल्लव मैं हिन्दी में एक खास बीमारी यह देखता हूँ कि अगर एक बार कोई एक बयान जारी कर देता है तो फिर शेष लोग उसी बयान को दुहराते तिहराते रहते हैं, बिना उसकी सत्यता की पडताल किए। ऐसे अनेक उदाहरण तुम्हें भी ज्ञात हैं ही। 

 मैं तो अगला सवाल आपसे यही पूछना चाहता था कि क्या हिन्दी समाज यात्रा भीरु है ? आपने जिन बातों की तरफ संकेत किया उनमें से अधिकतर गुजरे ज़माने की बातें हैं। अब जबकि काफी कुछ बदल चुका है तब भी, यात्रओं का न होना और यात्रा लेखन का कम होना, किस तरफ इंगित करता है ? 

उ. देखो पल्लव, जैसा मैंने अभी कहा, यह सही है कि हिन्दी समाज यात्रा भीरु समाज है और इसके अपने कारण हैं, जिनकी तरफ थोडा-सा संकेत मैंने अभी किया है। अगर हम अपने एक दूसरे के हाथ का छुआ न खाने की और खान-पान विषयक वर्जनाओं की बात करें तो निश्चय ही काफी कुछ बदला है। लोगों के आपसी सम्फ बढे  हैं और उनके व्यवहार में पहले की तुलना में अधिक उदारता का समावेश हुआ है। इसके बहुत सारे कारण हैं, जिन पर अलग से कभी बात हो सकती है, अभी करने लगेंगे तो विषयांतर हो जाएगा। लेकिन एक और बात, जिसका ताल्लुक हमारे वर्तमान से है, अभी की जानी जरूरी है। मुझे लगता है कि हिन्दी का हमारा जो आम लेखक है (अपवादों की बात छोड दो) वह जिस मध्यवर्ग, बल्कि निम्न मध्यवर्ग से ताल्लुक रखता है, उस वर्ग के लिए यात्र अब भी एक बडी और लगभग अलभ्य विलासिता है। उसके अपने रोजी-रोटी के संकट ही उसे साँस लेने की फुरसत नहीं देते। बेचारा यात्रा की कहाँ से सोचेगा ? हम-तुम जो थोडी ठीक-ठाक और सुरक्षित स्थिति में हैं, हमीं कितनी यात्रएँ कर पाते हैं ? यात्राएं शायद हमारी प्राथमिकता में भी नहीं हैं। अगर होतीं तो हम जैसे-तैसे उनके लिए समय और साधन भी निकालते। यह लगभग उसी तरह की बात है जिस तरह की यह कि हिन्दी पट्टी में किताब लोगों की प्राथमिकता सूची में बहुत नीचे हैं। दूसरी बात यह कि सारी बातों के बावजूद हमारे यहाँ  यात्रा आनंद का नहीं असुविधा का पर्याय है। वह हिन्दी-उर्दू का सफ़र  न होकर अंग्रेजी का सफ़र है। हाँ, अगर आप पंच सितारा यात्री हैं  या उच्च सरकारी अफसर हों तो बात अलग है। लेकिन वे लोग भला लिखेंगे क्यों ? यात्रा के साधनों की अस्त-व्यस्तता, बसों, रेलों की भीड-भाड, आरक्षण का नहीं मिलना और मध्यवर्ग अफोर्ड कर सके ऐसी दरों पर रहने-खाने की साफ सुथरी सुविधाओं का अभाव, ये भी हिन्दी समाज के लिए यात्राओं  को बाधित करने वाले तत्त्व हैं। लेकिन, इसके विरुद्ध तुम यह भी कह सकते हो कि यात्रा का अर्थ किसी पर्वतीय पर्यटन स्थल या दूरस्थ प्रदेश की यात्रा ही तो नहीं होता। घर से पाँच मील दूर की किसी जगह का भी तो यात्रा वृत्तांत हो सकता है। तो यहाँ बीच में आता है हमारा प्रकाशन तंत्र्। 

अगर आप अपने घर से पाँच मील दूर की किसी जगह की यात्रा पर जाकर वहाँ का वृत्तांत लिखें तो उसे छापेगा कौन ? न कोई पत्रिका  छापेगी, न कोई प्रकाशक छापेगा। हरेक ही अमृत लाल वेगड तो नहीं होता ना। तो बताइये, लेखक किसके लिए लिखेगा ? हमारे यहाँ तो धारणा ही बन गई है कि जहाँ का वृत्तान्त हो वह जगह बडे नाम वाली होनी चाहिए। शिमला, हिमालय, पेरिस कुछ तो हो। यह क्या बात हुई कि आप साइकिल उठा कर घूम आये, और इसी क्रम में एक और बात यह कि भारतीय मन इतिहास और आत्म प्रक्षेपण में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखता। इसलिए अगर एक भारतीय यात्रा कर भी लेता है तो उसका वृत्तांत लिखने में उसकी कोई खास रुचि नहीं होती। 

तो, बहुत सारी बातें मिलाकर एक परिदृश्य रचती हैं, लेकिन इसके बावजूद काफी लिखा गया है, यह बात मैं जोर देकर कहना चाहूँगा और इसके लिए हमें उन तमाम लेखकों का आभारी होना चाहिए जिन्होंने न केवल सारी असुविधाएँ उठाकर यात्राएं कीं, उनके बारे में लिखा भी, बावजूद इस बात के कि यह विधा मुख्यधारा की विधा नहीं थी। 

यात्रा संस्मरणों के कई नाम हैं...यात्रा आख्यान, यात्र चित्र्, यात्र वर्णन, यात्र संस्मरण आदि। अरुण प्रकाश लिखते हैं कि यात्र आख्यान कहने से आत्मपरकता और वस्तुपरकता का मेल हो जाता है, आप क्या ठीक समझते हैं ? 

उ. देखो पल्लव, मैं तो पुरानी पीढी से ताल्लुक रखता हूँ, इसलिए नाम भी मुझे पुराना ही पसन्द आएगा। यात्र संस्मरण - इस नाम से मुझे तो कोई दिक्कत नहीं है। इतने वर्षों में यह नाम प्रचलित हो चला है, तो इसे चलते रहने देना चाहिए। वैसे, हर लेखन की अपनी कुछ विशेषताएँ होती हैं। कभी कोई अपनी यात्र को लेकर आख्यान रचता है, तो कभी कोई चित्र् उकेरने की कोशिश करता है। कभी कोई संस्मरणात्मक होता है, तो कोई मात्र् वर्णन करने में रुचि रखता है। इस तरह हर रचना का अपना एक नाम हो जाएगा, लेकिन जहाँ तक विधा के नामकरण का प्रश्न है, मुझे तो अभी भी यात्र संस्मरण नाम ही उपयुक्त लगता है। मुझे नहीं लगता कि हर यात्र वर्णन को यात्र आख्यान कहना उचित होगा, जबकि यात्र आख्यान को भी यात्र वर्णन कह देने में कोई असंगति नहीं होगी। 

आपने योजना बनाकर लिखा या आकस्मिक ही रहा यह लेखन ? 

उ. पूरी तरह से आकस्मिक था यह लेखन। तुम जानते ही हो कि मेरी ये यात्रएँ पारिवारिक थीं। बेटी चारु के पास जाते रहे हैं हम लोग और इन यात्रओं के साथ ऐसी कोई योजना दूर-दूर तक नहीं थी कि कुछ लिखना भी है। वैसे भी मैं बेहद आलसी हूँ। रोज या योजना बनाकर नियमित रूप से लिखने वालों में से मैं नहीं हूँ, लेकिन हो सकता है कि कहीं कोई छोटा-सा कीडा दिमाग में कुलबुला भी रहा हो। मुझे अपने जीवन में बहुत अधिक यात्रएँ करने का अवसर नहीं मिला, ऐसे मैं जब अमरीका जाने का मौका मिला तो शायद लगा हो कि अपने अनुभवों को साझा करना चाहिए। कहीं मन में सतह के नीचे बहुत सारी यात्र पुस्तकों की स्मृतियाँ भी रही होंगी। जब आप किसी को पढते हैं तो साथ ही साथ यह विचार भी चलता रहता है ना कि अगर मुझे ऐसा मौका मिलता तो मैं यह करता। तुम्हें याद होगा हमारे यहाँ बहुत सारे ऐसे लेख आदि हैं कि अगर मैं कामायनी लिखता, अगर मैं गोदान लिखता, तो हो सकता है कि कहीं मेरे मन में भी रहा हो कि अगर मुझे यात्र करने का मौका मिलता तो मैं इस नजर से देखता और यह भी लिखता। एक रोचक बात बताऊँ, जब हम लोग पहली बार अमरीका जा रहे थे, तो उससे कुछ दिन पहले यहाँ जयपुर में एक मुद्रणालय में किसी काम से काफी देर बैठना पडा। वहाँ अमरीका यात्र पर लिखी एक किताब पडी थी, शीर्षक था क्षितिज के उस पार, लेखिका थीं डॉ. सुदेश बत्र, राजस्थान विश्वविद्यालय की तत्कालीन हिन्दी विभागाध्यक्षा। उनसे वैसे भी आत्मीयता है, वक्त काटने के लिए उस किताब को पढना शुरू किया तो खत्म करके ही दम लिया। बल्कि कहूँ कि किताब ने ही अपने आप को पढवालिया, बात खत्म हो गई। जब अमरीका पहुँच गए, तो वह किताब जैसे स्वतः उभर आई, यानी कहीं उस किताब ने भी प्रेरित किया कि मुझे भी कुछ लिखना चाहिए, यह तो हुई एक बात। 

अब बताता हूँ कि वास्तव में क्या हुआ। तुम्हें पता ही है कि हम लोग चारु की डिलीवरी के लिए अमरीका गए थे। यह जो अनुभव था, डिलीवरी से सम्बद्ध, अस्पताल का, चिकित्सा सुविधाओं का, अस्पताल कर्मियों के व्यवहार का, वहाँ रह रहे भारतीयों के पारस्परिक सम्बन्धों का - इन सबने मुझे बहुत प्रभावित किया और जाने कब ऐसा हुआ कि वह सारा अनुभव शब्दबद्ध हो गया, कोई योजना नहीं थी। चारु ने पूछा कि पापा क्या लिख रहे हो, तो उसे बताया और उसने इसका जक्र अपनी कुछ मित्रें से कर दिया। फिर एक दिन यह संयोग हुआ कि कुछेक परिवार इकट्ठे हुए तो मुझसे कहा गया कि मैं वह लेख पढकर सुनाऊँ। वाचन किया तो जिस तरह की प्रतिक्रियाएँ मिलीं, वे बहुत उत्साहवर्धक थीं। एक मित्र् ने कहा कि आपने जो लिखा है उसका एक पहलू यह भी है कि इसमें इस समाज के सकारात्मक पहलू को देखने-दिखाने की कोशिश की गई है, जबकि आम तौर पर भारत से जो आता है वह इस समाज की लानत-मलानत ही करता है। तो यह लेख अमरीकी समाज का दूसरा पहलू सामने लाता ह। यह टिप्पणी मुझे महत्त्वपूर्ण लगी, महत्त्वपूर्ण इसलिए लगी कि क्या मैं वाकई अमरीकी समाज की तारीफ करना चाहता था ? क्या मैं अमरीका का पक्षधर बन गया था ? क्या मेरा राजनीतिक सोच बदल गया था ? और यही वह बिन्दु था जिसने मुझे प्रेरित किया कि मुझे इस समाज को खुले मन से देखना-परखना चाहिए। लिखने की बात तब भी मन में कुछ खास नहीं थी, लेकिन जब इस तरह चीजों को देखने लगा, तो लिखता भी गया और इस तरह एक पूरी किताब बन गई। लेकिन अब पीछे मुडकर देखता हूँ तो पाता हूँ कि पारम्परिक अर्थ में तो मेरी किताब यात्र संस्मरण, यात्र आख्यान या यात्र वृत्तान्त नहीं है, लेकिन क्योंकि इसका सम्बन्ध यात्र से है, इसलिए मैंने भी इसे यात्र वर्णन मान लिया है। 

मूलतः आलोचक होने के कारण क्या किस्सागोई में असुविधा नहीं रही ? क्या यही कारण मानना चाहिए कि आपने छोटे-छोटे प्रसंग लिखे, न कि लम्बे और धारावाहिक ? 

उ. मैंने जो लिखा उसमें विस्तार नहीं है, इस बात को मैं स्वीकार करता हूँ। लेकिन मुझे नहीं लगता कि मेरे आलोचक होने से इस बात का कोई सम्बन्ध है। असल में बात यह है कि विस्तार मेरे स्वभाव में ही नहीं है, जो कहना है सीधे-सीधे कह दो। क्यों व्यर्थ में लम्बी भूमिका बनाई जाए ? जो लोग बात को विस्तार देते हैं, उनसे मुझे ईर्ष्या नहीं चिढ होती है। मन ही मन कहता हूँ कि इसे इतना लम्बा खींचने की कहाँ जरूरत थी ? आप मुझे बोलने को कहेंगे तो बिना किसी भूमिका के अपनी बात कहकर बैठ जाऊँगा। कहने को नहीं होगा तो खडा ही नहीं होऊँगा। लिखते वक्त भी ऐसा ही होता है। मैं कोशिश करूँ तो भी अनावश्यक विस्तार नहीं ला पाता और यह इस बात के बावजूद कि मैं पूरी जिन्दगी अध्यापक रहा हूँ जो इस बात के लिए कुख्यात हैं कि अगर उनके पास कहने को कुछ भी न हो तो भी वे 45 मिनिट तो बोलेंगे ही। तो, एक बात तो यह है।दूसरी बात यह कि जहाँ तक इस किताब का सवाल है, यहाँ संक्षेप के कारण दूसरे भी हैं। 

 वे दूसरे कारण क्या हैं ? 

उ. उन कारणों की तरफ इस किताब की भूमिका में संकेत हो ही गया है। असल में अपनी दो यात्रओं के समय मैंने क्रमशः राजस्थान पत्र्किा और डेली न्यूज के लिए लगभग नियमितता से वहाँ से स्तम्भ लेखन किया था। राजस्थान पत्र्किा में देस में निकला होगा चाँद शीर्षक से और डेली न्यूज में हम तो हैं परदेस म शीर्षक से। जब आप कोई कॉलम लिखते हैं तो शब्द सीमा पहले से तय होती है। आपको उसके भीतर ही रहना होता है। अब इधर हमारी पत्र्कारिता में एक और प्रवृत्ति तुम भी लक्षित कर रहे होंगे। वहाँ चीजों का, मतलब पाठ्यसामग्री का, आकार निरन्तर छोटा होता जा रहा है। अखबार चलाने वालों ने मान लिया है कि उनके पाठक अब लम्बी चीजें नहीं पढते। तुम देखोगे कि सम्पादकीय टिप्पणियाँ भी छोटी होती जा रही हैं, सब कुछ छोटा, तो शायद यही वजह रही होगी कि अपनी बाद वाली यात्रओं में जब मैं कॉलम लिख रहा था तो मुझसे कहा गया कि मैं एक ही कॉलम में दो-तीन मुद्दे उठाऊँ। स्वाभाविक है कि मुझे बहुत कम शब्दों में अपनी बात कहनी थी, मजाक में कहूँ तो यह कि मुझे अपनी बात को कम शब्दों में कहने का एक और बहाना मिल गया। संक्षेप मेरे स्वभाव में है, लेकिन इतना अधिक संक्षेप बाह्य कारणों से ही हुआ। 

अमरीका जैसे देश पर लिखते हुए आफ मन में संशय रहे, यह बात आपने ‘आँखन देखी’ की भूमिका में लिखी है और अभी भी कही। संशय इसलिए कि आप अमरीका के उजले पक्ष को देख-दिखा रहे थे। मेरा प्रश्न यह है कि आप वहाँ के अँधेरे पक्ष को भी तो देख सकते थे ?

उ. तुम जानते ही हो, कि पिछले बरस मैं चौथी बार अमरीका जाकर आया हूँ। पहली और दूसरी बार जब वहाँ गया था तो मुझे अच्छाई नजर आई थी और वैसा ही मैंने लिखा भी। आँखन देखी की भूमिका में मैंने अपने एक विद्यार्थी की टिप्पणी का उल्लेख किया है, जिसने मुझ पर यह आरोप लगाया था कि आप तो चीजों के उजले पक्ष को ही देखते हैं, वह तुम्हें स्मरण होगा। इसे मेरी कमजोरी भी कह सकते है, लेकिन, अगर मैं वहाँ के अँधेरे पक्ष को देखता और लिखता तो भी तुम या कोई और पूछ सकता था कि आप अमरीका का उजला पक्ष भी तो देख सकते थे ? असल में वहाँ के बारे में लिखते समय हर वक्त मेरे मन में अपना देश रहा है। वहाँ जो भी मुझे अच्छा लगा उसे मैंने कुछ इस विचार से लिख दिया कि काश हमारे यहाँ भी ऐसा ही हो। कुछ-कुछ प्रेरणा लेने जैसी बात और मुझे यह देखकर खुशी हुई भी कि मैंने जो लिखा उसका कुछ असर भी हुआ। लेकिन अपनी तीसरी और चौथी यात्रओं में ऐसा नहीं हुआ। इस किताब की कई टिप्पणियों में तुम वहाँ के जीवन के अँधेरे पक्षों को भी देखोगे। 

तुम्हारे इस सवाल ने मुझे एक बार फिर से अपने लिखे के बारे में सोचने को प्रेरित किया है और मैं पाता हूँ कि लिखने से पहले मैंने यह तय नहीं किया था कि मुझे अच्छाइयों के बारे में लिखना है या बुराइयों के बारे में। मैं नहीं जानता कि वैसा करना, यानी पहले से तय करके लिखना, कितना उचित होता। लेकिन मैंने जो किया, उसके लिए लज्जित होने की, क्षमा प्रार्थी होने कोई जरूरत मुझे अब भी नहीं लगती है। अपने वैचारिक प्रतिबद्धता को बरकरार रखते हुए, पूँजीवाद से पूरी तरह असहमत होते हुए और जहाँ भी प्रसंग आया इसे अभिव्यक्त करते हुए जैसा मुझे लगा, मैंने लिख दिया। वैसे, मुझे यह भी लगता है कि मैं ही नहीं, कोई भी अगर पहली बार वह सब देखेगा जो मैंने देखा, तो वह भी प्रशंसा ही करेगा। 

आपको वहाँ के जीवन में ऐसा सबसे बडा क्या गुण नजर आया जिसका हम भारतीयों में सर्वथा अभाव है ? 

उ. अगर मुझे एक ही गुण बताना हो तो मैं कहूँगा, दूसरों का ख्याल रखने का भाव। वहाँ के आम नागरिक में भी मैंने यह बात लक्ष्य की कि वह हमेशा यह ध्यान रखता है कि उसके कारण किसी अन्य कोई असुविधा न हो। अगर उसे जरा भी ऐसा लगता है कि उसके कारण आपको असुविधा हुई होगी तो वह आपसे अनिवार्यतः क्षमा याचना करेगा। मुझे एक प्रसंग याद आता है, सिएटल में जहाँ चारु का घर है, वह खासा सुनसान इलाका है। एक बात बताऊँ, अमरीका में सुनसान इलाकों में रहनाअधिक प्रतिष्ठापूर्ण माना जाता है। तो एक दिन हमारे पडोस के घर में गैस लीकेज जैसा कुछ हो गया, एक अमरीकी परिवार रहता है उसमें। परिवार मतलब पति पत्नी, दो छोटे बच्चे और तीन कुत्ते। तो गैस लीकेज हुई तो स्मोक अलार्म बज गया और आनन-फानन में फायर ब्रिगेड की गाडयाँ आ गईं। कुछ ऐसा माहौल बन गया मानो कोई बहुत भयंकर दुर्घटना घट गई हो। यह व्यवहार वहाँ की व्यवस्था का अंग है, आपको मदद माँगी या उसकी याचना नहीं करनी पडती है, वह स्वतः और तुरन्त सुलभ होती है। शोर सुनकर हम लोग भी घर से बाहर निकल आए, जैसे ही हम लोग बाहर आए, वे दोनों पति पत्नी आकर हमसे क्षमा याचना करने लगे कि उनके कारण हमें असुविधा हो रही है। अब यह बात मुझे बहुत महत्त्वपूर्ण लगती है। वे और उनका घर संकट में है, लेकिन वे पहले हमसे क्षमा याचना आवश्यक समझते हैं, क्या आप अपने देश में इस तरह के व्यवहार की कोई कल्पना भी कर सकते हैं ? कोई सार्वजनिक स्थान पर या अन्यत्र् भी अपने मोबाइल पर उच्च स्वर में बात नहीं करता है, कोई आपका मार्ग अवरुद्ध नहीं करता है, कोई सफाई करके अपने घर का कचरा आफ घर के सामने नहीं खिसकाता है। अगर आप क्यू में खडे हैं और बाद में आने वाले को संशय है तो बजाय बीच में घुस जाने के वह आपसे पूछता है कि क्या आप क्यू में हैं ? आपकी निजता का हर व्यक्ति पूरा सम्मान करता है, अगर आप पैदल सडक पार कर रहे हैं तो हर वाहन आफ सडक पार कर लेने तक रुका रहता है। कहाँ तक गिनाऊँ और याद रखिये, ये सारे उदाहरण एक ही गुण के हैं, क्योंकि आपने मुझसे एक गुण के ही बारे में पूछा था। इसी सिलसिले में, जब बात निकल ही गई है तो एक जक्र और कर दूँ। सिएटल शहर में, जहाँ हमने अपने प्रवास का अधिकांश समय बिताया, सार्वजनिक पुस्तकालयों की एक बहुत बडी चेन है। मेरे वहाँ के पुस्तकालय अनुभव पर आँखन देखी में एक पूरा लेख तुमने भी पढा ही है, जिन्होंने वह लेख नहीं पढा है उन्हें यह बताता चलूँ कि अमरीका में सार्वजनिक पुस्तकालय व्यवस्था बहुत उम्दा है। 

पुस्तकालय में न केवल पुस्तकें और पत्र्-पत्र्किाएँ, बल्कि कैसेट, रिकॉर्ड्स, वीडियो कैसेट्स, सीडी, डीवीडी, सीडी रोम वगैरह भी होती हैं और इन सबको आप इश्यू करवा के घर ले जा सकते हैं। यह भी कि हमारे देश की तरह प्रति व्यक्ति एक या दो पुस्तकों की सीमा भी वहाँ नहीं है। आप चाहें तो एक साथ पचास चीजें इश्यू करवा कर ले जाएँ, तो जिस शहर में हम लोग थे, वहाँ की लाइब्रेरी का मैं भी नियमित उपयोग करता था। उसमें हिन्दी पुस्तकें, हिन्दी पत्र्-पत्र्किाएँ, हिन्दी फिल्में और भारतीय संगीत भी विपुल मात्र में था। एक बात जो मैंने लक्षित की, और जिसे बताने के लिए मैंने यह सब बताया, वह बहुत त्रसद है। मैंने पाया कि वहाँ सबसे ज्यादा बुरी हालत में हिन्दी की किताबें, हिन्दी की पत्र्किाएँ और हिन्दी फिल्मों की सीडी, डीवीडी वगैरह थीं। इसलिए कि जो लोग इन्हें ले जाते, वे शायद इनकी कतई परवाह नहीं करते। किताब का पन्ना फट रहा है, पत्र्किा पर सब्जी के दाग लग रहे हैं और सीडी पर खरोंच पड रही है, तो हमारी बला से। कौन हमारे घर की सम्पत्ति है, इस भाव का जीता-जागता नमूना थी वह सारी सामग्री जिसका उपयोग हम भारतीय करते हैं। होने को तो यह भी हो सकता है कि कोई किताब या पत्र्किा हमें थोडी फटी हुई मिले तो हम उसे दुरुस्त करके लौटायें, लेकिन नहीं। यह बात तो हमारे संस्कार में ही नहीं है ना। अब एक और गुण की चर्चा मैं अपनी तरफ से कर रहा हूँ। मैंने पाया कि वहाँ हर नागरिक हर व्यवस्था का अक्षरशः पालन करता है, चाहे कोई देख रहा हो या न देख रहा हो। किसी क्रॉसिंग पर अगर ब्लिंक करती हुई लाल बत्ती है तो हर वाहन वहाँ रुक कर ही आगे बढेगा। हो सकता है हमारे यहाँ तो अधिकतर ड्राइव करने वालों को ब्लिंक करती हुई लाल बत्ती का अर्थ ही पता न हो। मैंने कभी किसी को रेड लाइट जंप करते हुए, गलत तरफ से ओवरटेक करते हुए, गलत दिशा में ड्राइव करते हुए, सडक पर कचरा फेंकते हुए नहीं देखा। सफाई के एक प्रसंग का तो मैंने जक्र किया भी है। 

कौनसा प्रसंग ? 

उ. एक रात जब हम लोग किसी पार्टी में थे, मैंने देखा कि एक वृद्ध दम्पत्ति अपने कुत्ते को घुमाने निकले हैं। कुत्ते ने एक जगह, सडक पर अपनी हाजत रफा की। उन लोगों ने अपने हाथ से वह गंदगी एक पॉलीथिन में समेटी और उसको इसी निमित्त विशेष रूप से निर्धारित जगह पर डाला। क्या आप इस बात की भी कल्पना अपने देश में करेंगे ? बहुत छोटे बच्चे अगर अपनी गली में भी साइकिल चलायेंगे तो हेलमेट लगाकर ही चलायेंगे। अब आप चाहें तो इन बातों के लिए बहुत कुछ कह सकते हैं। मसलन यह कि वहाँ दण्ड के प्रावधान बहुत कडे हैं या कि उन्हें आजाद हुए दो सौ बरस हो गए हैं और यह सब उनकी आदत में शुमार हो गया है वगैरह। जब भी मैंने अपने मित्रें से यहाँ इन मुद्दों पर बात की, मुझे ऐसे ही तर्क सुनने को मिले। लेकिन अभी तो मेरा कहना यह है कि हम इस विस्तार में नहीं जा रहे हैं कि वहाँ ऐसा क्यों है, और यहाँ क्यों नहीं। आपने गुण पूछे मैंने बता दिए। लेकिन अगर कारण के मूल में जाना चाहें तो ? क्या केवल दण्ड प्रावधान होने से ही इतना अंतर पड जाता है ? दण्ड प्रावधान तो हमारे यहाँ भी हैं, लेकिन हमारा व्यवहार तो इस बात से तय होता है कि कोई देख रहा है या नहीं देख रहा है। अगर चौराहे पर ट्रैफिक का सिपाही न हो तो आप बतायें, कितने लोग रेड लाइट होने पर अपनी गाडी रोकेंगे ? आप कभी किसी चौराहे पर खडे होकर देख लीजिये। किसी भी गंभीर से गंभीर गोष्ठी या कंसर्ट में लोग अपना मोबाइल स्विच ऑफ नहीं करेंगे। सिनेमा हॉल में लोग बिना दूसरों के रस भंग की फिक्र किए फुल वॉल्यूम में बतियाते मिल जायेंगे। गलत साइड से ओवरटेक करते हुए किसी को संकोच नहीं होगा। ड्राइव करते हुए मोबाइल पर बात करने में लोग शान समझते हैं। एक प्रसंग याद आता है, एक दिन हम कुछ मित्र् गपशप कर रहे थे। एक पुलिस अधिकारी, एक प्रोफेसर और मैं। प्रोफेसर साहब बहुत गर्व से बोले कि जब तक इस शहर में वे पुलिस अधिकारी मित्र् पदस्थापित हैं, वे कार ड्राइव करते हुए सीट बैल्ट नहीं लगाने वाले। 

आखिर पुलिस अधिकारी मित्र् होने का कुछ तो लाभ हो। और इसी से मुझे यह बात भी याद हो आती है कि जब मैं एक कॉलेज में विश्वविद्यालय परीक्षा करवा रहा था तो एक परिचित पुलिस अधिकारी का फोन आया कि उनकी साली परीक्षा दे रही है, मैं ‘जरा ध्यान रख लूँ।’ ध्यान रख लेने का आशय समझाने की जरूरत नहीं है। मैंने बहुत मुश्किल से खुद को उन्हें यह अनुरोध करने से रोका कि मेरा साला आज रात एक घर में चोरी करेगा, वे भी जरा उसका ध्यान रख लें। आप देखते ही हैं कि सरकारी तंत्र् कोई कार्यवाही करता है तो तुरन्त ही उसके विरुद्ध सिफारिशें होती हैं और किए कराये पर पानी फिर जाता है। कहाँ तक गिनाऊँ ? चौराहे पर खडा सिपाही ट्रैफिक नियम के उल्लंघन के लिए आपका चालान करता है, आप अपने परिचित किसी पुलिस अधिकारी को फोन करते हैं, पुलिस अधिकारी उस सिपाही को फोन करता है और उस बेचारे को आपको छोड देना पडता है। अपनी रोजमर्रा की जन्दगी में हम सब ये तमाशे रोज देखते हैं। होता है शबो-रोज तमाशा मेरे आगे। अमरीका में ऐसा नहीं होता। अगर कोई व्यवस्था है तो हरेक उसका पालन करता है। यह मामूली बात नहीं है। 

हिन्दी में आफ पसंदीदा यात्र आख्यान लेखक कौन हैं ? 

उ. यह तुम भी जानते हो कि मेरा उत्तर क्या होगा। शायद सभी का उत्तर एक-सा ही होगा। अज्ञेय, निर्मल वर्मा, कृष्णनाथ, मंगलेश डबराल और अमृतलाल वेगड। ये नाम मैंने किसी क्रम में नहीं लिए हैं। वैसे यह सूची थोडी और लम्बी हो सकती हैं। मैं राहुल सांकृत्यायन से शुरू कर सकता हूँ। मोहन राकेश, धर्मवीर भारती, हरिवंश राय बच्चन, कुमुद, कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी, मुज्तबा हुसैन आदि के नाम ले सकता हूँ, लेकिन हम यहाँ सूची तो बना नहीं रहे हैं ना, इसलिए यह मोह तो छोडना होगा। अगर मुझे मन से किसी एक किताब का नाम लेना हो तो मैं निर्मल वर्मा की ‘चीडों पर चाँदनी’ का नाम लेना चाहूँगा। शायद मैं कॉलेज का विद्यार्थी था जब मैंने पहली बार यह किताब पढी थी। देखो, एक तो उस समय तक हम दुनिया के देशों के बारे में अधिक नहीं जानते थे, दूसरे निर्मल जी की भाषा, जो आप पर जादू करती है। लेकिन महत्त्व इन दोनों बातों का नहीं है। यह बात मुझे काफी बाद में समझ आयी। असल में निर्मल जहाँ जाते हैं उन जगहों की आत्मा से साक्षात्कार करते और करवाते हैं। आप उन स्थानों को केवल देखते जानते नहीं, उन्हें महसूस करने लगते हैं। निर्मल जी की बाद में एक और किताब आई ‘धुंध से उठती धुन’। इस किताब में उन्होंने यात्र वृत्तान्त तो दिए ही, उसी के साथ भारतीय सभ्यता और संस्कृति को नई तरह से देखने-दिखाने की चेष्टा भी की। निर्मल जी के नजरिए की काफी आलोचना हुई है, लेकिन मुझे लगता है कि तमाम असहमतियों के बावजूद उनके दाय को खारिज तो नहीं किया जा सकता। यह माद्दा बहुत कम लेखकों में होता है, जितना मुझे इन किताबों ने प्रभावित किया, उतना ही प्रभावित मुझे एक दूसरी तरह के यात्र वृत्तान्त ने भी किया। मेरा इशारा अमृतलाल वेगड की किताब ‘सौंदर्य की नदी नर्मदा’ की तरफ है। इस किताब के एक-एक शब्द से नर्मदा के प्रति वेगड जी का प्यार टपकता है। अद्भुत है यह किताब और जब मैं वेगड जी के लेखन की बात करूँ तो मुझे कृष्णनाथ जी याद न आ जाएँ ऐसा कैसे हो सकता है। ‘स्फीति में बरिश,’ ‘लद्दाख राग विराग’ उनकी ऐसी किताबें हैं जो हिम प्रदेश की धार्मिक सांस्कृतिक विरासत को समझने में भी हमारी सहायता करती है। वैसे बहुत सारे लेखकों ने अपने-अपने वृत्तांतों में अपने कमाल दिखाये हैं, लेकिन उन सबकी बात फिर कभी। 

आपकी इस किताब ‘आँखन देखी’ पर राजस्थान साहित्य अकादमी का कन्हैयालाल सहल पुरस्कार मिलने पर कैसा लगा ? 

उ. बेझिझक कहूँगा, अच्छा लगा। मैं इतना महान नहीं हूँ कि कहूँ कि पुरस्कार का मेरे लिए कोई अर्थ नहीं है। मुझे लगता है कि मैंने जो लिखा वह किसी को पसन्द आया, इस पर तो मुझे खुश होना ही चाहिए, मेरी खुशी का एक और कारण यह भी है कि यह पुरस्कार मुझे उस समय मिला जब अकादमी वैचारिक रूप से भिन्न मताग्रहियों के नियंत्र्ण में थी। अगर आपसे भिन्न विचार वाले भी आपको स्वीकार करते हैं तो प्रसन्नता स्वाभाविक ही है। लेकिन जितनी खुशी मुझे इस पुरस्कार से हुई, उतनी ही खुशी, बल्कि उससे भी ज्यादा, मुझे पाठकों की प्रतिक्रियाओं से हुई। पाठकों की यानी ऐसे पाठकों की प्रतिक्रियाएँ जिनका मुझसे कोई परिचय नहीं है। असल में इस किताब को मैंने नेट पर डाल दिया था। वहाँ से पूरी दुनिया में इसे डाउनलोड करके लोगों ने पढा। दुनिया भर से, लोगों ने मुझे अपनी प्रतिक्रियाएँ भेजीं, जिनसे आपका कोई परिचय ही न हो, जब वे आपको अपनी प्रतिक्रिया भेजने का, सराहना करने का कष्ट करें तो खुशी होना स्वाभाविक ही है। लेकिन इसी स्वर में यह भी कहूँगा कि मुझे लगा कि मेरी मुद्रित किताब उतने पाठकों तक नहीं पहुँची जितनों तक इसे पहुँचना चाहिए था। हो सकता है, इसमें मेरे प्रकाशक की भी सीमा हो। 

क्या आप यात्र वृत्तान्त के शिल्प पर भी कुछ कहना चाहेंगे ? 

उ. हिन्दी के दो अध्यापक (भले ही उनमें से एक भूतपूर्व ही क्यों न हो) बात करें और उसमें शास्त्रीय, बल्कि अध्यापकीय शैली का समावेश न हो तो फिर बात करने का मतलब ही क्या है ? अगर अध्यापक की अब कुख्यात हो चली शैली में मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देना चाहूँ तो मुझे भी काफी जोर लगाना पडेगा, क्योंकि यह शैली मेरी भी है नहीं। लेकिन मैं वैसा उत्तर नहीं दूँगा। असल में बात यह है कि मुझे लगता है कि किसी भी विधा के लिए कोई एक शिल्प हो ही नहीं सकता। क्या गोदान, बाणभट्ट की आत्मकथा, राग दरबारी, मैला आँचल और कलिकथा का शिल्प एक है ? इसी तरह कौन यह कहेगा कि रामचरितमानस, प्रियप्रवास और कामायनी का शिल्प एक है ? मुझे तो हमेशा लगता है कि हर समर्थ रचना शिल्प के पुराने ढाँचे को तोड कर अपने लिए एक लिए शिल्प को गढती है। ऐसे में यात्र वृत्तान्त के लिए किसी सामान्य शिल्प की बात करने का कोई अर्थ मुझे नहीं लगता। 

बहुत-बहुत धन्यवाद ! 

उ. धन्यवाद मेरी तरफ से भी। इसलिए कि इस बातचीत के बहाने मुझे भी काफी कुछ सोचने का अवसर मिला। एक बार फिर धन्यवाद।
डॉ. पल्लव
हिंदी के सह आचार्य
हिंदी विभाग
हिन्दू कोलेज,नई दिल्ली 

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