अकेले जितेन्द्र कुमार सोनी,पांच ख़ास किताबें और सात दिन - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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अकेले जितेन्द्र कुमार सोनी,पांच ख़ास किताबें और सात दिन

बाबा नागार्जुन 
(जहां समाज में किताबें पढ़ने के लिए कम ही खरीदी जाती है,और तो और सजाने के लिए पुस्तकालय बनाने वाले इस आलम में जितेन्द्र भैया ने ये बहुत अच्छी आदत बना रखी है कि वे सप्ताह में पांच ठीकठाक किताबें चयन कर पढ़ते हैं और अपने साथियों तक विचार बाँटते भी हैं.हम उनकी इस रुचि को सलाम करते हैं-सम्पादक )

मूर्धन्य साहित्यकारों को पढने का अवसर निश्चित तौर पर आपके साहित्यिक मन की प्यास बुझा देने में सक्षम होता है इस हफ्ते यह सुअवसर मुझे प्राप्त हुआ जब मैंने बाबा नागार्जुन ,अज्ञेय , अशोक वाजपेयी और किश्वर नाहिद की किताबें पढ़ी 
                     
कुल 5 किताबों में से नागार्जुन की 2 किताबें  'तुमने कहा था ' और  'भूल जाओ पुराने सपने' पढ़ी नागार्जुन एक ऐसे जनकवि  हैं जो व्यवस्था के दबावों से अविचलित रहकर आम आदमी की त्रासदी , पीड़ा , आक्रोश और आकांक्षाओं को काव्य की उर्वर जमीन देते हैं ....... एक ऐसी जमीन जो पाठक के साहित्यिक समझ के बीज को एक जागरूक मगर आक्रोशित नागरिक के रूप में जो किसी भी प्रकार की नाजायज स्थिति का विरोध कर देता है और मानवीयता के फलों का आस्वादन करता है, के रूप में बदल देती हैं   मार्क्सवादी विचारधारा के अंतिम लक्ष्य और उस तक पहुँचने के सभी सोपान यानी एक न्यायपूर्ण समाज और जन संघर्ष में विश्वास रखने वाले बाबा का सम्पूर्ण साहित्य उनके इन्हीं विचारों का प्रतिबिम्ब है। निराला के बाद नागार्जुन अकेले ऐसे कवि हैं, जिन्होंने इतने छंद, इतने ढंग, इतनी शैलियाँ और इतने काव्य रूपों का इस्तेमाल किया है।
                      इनकी पुस्तक 'तुमने कहा था ' में इनकी 1964 से 1979 तक की रचनाएँ हैं और ये सब रचनाएं सामाजिक अन्तर्विरोध और छद्म का विरोध करती नज़र आती हैं इस काव्य संग्रह में उनकी कविताओं के साथ उनके रागात्मक प्रकृति प्रेम को दर्शाती कुछ गीत रचनाएँ भी हैं यह काव्य संग्रह 1980 में प्रकाशित हुआ था 'तीनो बन्दर बापू के ' , 'अब तो बंद करो हे देवी यह चुनाव का प्रहसन ', 'शासन की बन्दूक ' ,' अच्छा किया , उठ गये हो दुष्ट ' आदि कवितायें पढ़कर हैरत होती है कि इन्होने किस तरह सत्ता शीर्ष पर बैठे हर आदमी को अपने लेखनी से चुनौती दे दी थी , और शायद इनकी ये निर्भीकता ही इनकी विशिष्टता है जो आज कुछ चमकदार नामों को सत्ता चापलूसी से कभी भी प्राप्त नहीं हो सकती है  'अब तो बंद करो हे देवी यह चुनाव का प्रहसन ' से एक अंश इनकी इस बेबाकी का प्रतीक है ....


अधभूखे - अधनंगे डोलें , हरिजन -गिरिजन वन में
खुद तो चिकनी रेशम डाटे उडती फिरो गगन में
महंगाई की सूपनखा तो कैसे पाल रही हो
शासन का गोबर जनता के मत्थे डाल रही हो
                                                     एक और कविता ' शासन की बन्दूक ' देखिए --
खड़ी हो गई चाँपकर कंकालों की हूक
नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक
उस हिटलरी गुमान पर सभी रहें है थूक
जिसमें कानी हो गई शासन की बंदूक
बढ़ी बधिरता दसगुनी, बने विनोबा मूक
धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बंदूक
सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक
जहाँ-तहाँ दगने लगी शासन की बंदूक
जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक
बाल बाँका कर सकी शासन की बंदूक

                                                                                                      इनकी दूसरी किताब 'भूल जाओ पुराने सपने'  १९९४ में प्रकाशित हुई और इसमें इनकी ५१ कवितायें हैं ' इतना भी क्या कम है प्यारे ' ,' सर्वोदय सिंह ' ,'आदरणीया जी ' ,' कौन हांफ रहा है ' आदि कवितायें पढ़कर सहजता से समझ में जाता है कि क्यों वैद्यनाथ मिश्र यानी हिंदी में नागार्जुन और मैथिली में  'यात्री ' नाम से लिखने वाले इस बाबा के लिए कहा जाता है कि ये डेढ़ हजार सालों का काव्यबोध अपनी कविताओं में समेटे हुए हैं
इनकी पुस्तक नाम से ही एक रचना ' भूल जाओ पुराने सपने ' कविता को देखिए --
  
सियासत में
अड़ाओ
अपनी ये काँपती टाँगें
हाँ, मह्राज,
राजनीतिक फतवेवाजी से
अलग ही रक्खो अपने को
माला तो है ही तुम्हारे पास
नाम-वाम जपने को
भूल जाओ पुराने सपने को
रह जाए, तो-
राजघाट पहुँच जाओ
बापू की समाधि से जरा दूर
हरी दूब पर बैठ जाओ
अपना वो लाल गमछा बिछाकर
आहिस्ते से गुन-गुनाना :
‘‘बैस्नो जन तो तेणे कहिए
जे पीर पराई जाणे रे’’
देखना, 2 अक्टूबर के
दिनों में उधर मत झाँकना
-जी, हाँ, महाराज !
2 अक्टूबर वाले सप्ताह में
राजघाट भूलकर भी जाना
उन दिनों तो वहाँ
तुम्हारी पिटाई भी हो सकती है
कुर्ता भी फट सकता है
हां, बाबा, अर्जुन नागा !
अज्ञेय जी 
                                            तीसरी किताब थी सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' की 'चुनी हुई कविताएं ' जिसमें इनकी सभी प्रतिनिधि रचनाएँ हैं प्रतिभासम्पन्न कवि, शैलीकार, कथा-साहित्य को एक महत्त्वपूर्ण मोड़ देनेवाले कथाकार, ललित-निबन्धकार, सम्पादक और सफल अध्यापक [ कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से लेकर जोधपुर विश्वविद्यालय तक में अध्यापन ] अज्ञेय जी को 1964 में आँगन के पार द्वार पर उन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार प्राप्त हुआ और 1979 में कितनी नावों में कितनी बार पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ इनकी रचनाएँ इनकी भाषा बोध पर पकड़ , प्रतीक रचाव , प्रयोगवाद और तत्सम्बन्धी जिज्ञासा का सीधा-सा प्रमाण हैं 'कलगी बाजरे की ', ' नदी के द्वीप ', उषा-दर्शन' , 'मैं वहां हूँ ', 'नंदा देवी ' , 'हिरोशिमा ' आदि प्रसिद्ध रचनाएँ इस पुस्तक में  हैं    इनकी एक रचना 'कलगी बाजरे की' यहाँ प्रस्तुत है --

हरी बिछली घास।
दोलती कलगी छरहरे बाजरे की।

अगर मैं तुम को ललाती सांझ के नभ की अकेली तारिका
अब नहीं कहता,
या शरद के भोर की नीहारन्हायी कुंई,
टटकी कली चम्पे की, वगैरह, तो
नहीं कारण कि मेरा हृदय उथला या कि सूना है
या कि मेरा प्यार मैला है।

बल्कि केवल यही : ये उपमान मैले हो गये हैं।
देवता इन प्रतीकों के कर गये हैं कूच।

कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।
मगर क्या तुम नहीं पहचान पाओगी :
तुम्हारे रूप के-तुम हो, निकट हो, इसी जादु के-
निजी किसी सहज, गहरे बोध से, किस प्यार से मैं कह रहा हूं-
अगर मैं यह कहूं-

बिछली घास हो तुम
लहलहाती हवा मे कलगी छरहरे बाजरे की ?

आज हम शहरातियों को
पालतु मालंच पर संवरी जुहि के फ़ूल से
सृष्टि के विस्तार का- ऐश्वर्य का- औदार्य का-
कहीं सच्चा, कहीं प्यारा एक प्रतीक बिछली घास है,
या शरद की सांझ के सूने गगन की पीठिका पर दोलती कलगी
अकेली
बाजरे की।

और सचमुच, इन्हें जब-जब देखता हूं
यह खुला वीरान संसृति का घना हो सिमट आता है-
और मैं एकान्त होता हूं समर्पित

शब्द जादू हैं-
मगर क्या समर्पण कुछ नहीं है ?


अशोक वाजपेयी 
                        अगली किताब पढ़ी अशोक वाजपेयी की 'पुरखों की परछी में धूप '..............अशोक वाजपेयी ने सार्वजनिक जीवन में अनेक शीर्ष पदों पर काम किया है और इन्हें साहित्य अकादमी और दयावती मोदी पुरस्कार से नवाजा जा चुका है  भारत भवन , कालिदास अकादमी , उस्ताद अल्लाउद्दीन खान संगीत अकादमी , महात्मा गाँधी अन्तराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय आदि के संस्थापक और 'समास', 'बहुवचन ' , 'पूर्वाग्रह ' आदि के संपादक अशोक जी की यह पुस्तक समकालीन कविता में एक अहम स्थान रखती है इस पुस्तक में उनकी सारी कविताएं घर , परिवार और पड़ोस की उलझनें , सुख-दुःख , संभावनाएं आदि का दर्पण हैं ' पूर्वजों की अस्थियों में ', ' कहाँ है घर ', 'माँ', 'पिता के जूते ,' घर में मृत्यु' आदि इस काव्य संग्रह की शानदार रचनाएँ हैं   इनकी एक रचना 'पूर्वजों की अस्थियों में ' को देखिए --

हम अपने पूर्वजों की अस्थियों में रहते हैं-
हम उठाते हैं एक शब्द
और किसी पिछली शताब्दी का वाक्य-विन्यास
विचलित होता है,
हम खोलते हैं द्वार
और आवाज़ गूँजती है एक प्राचीन घर में कहीं-

हम वनस्पतियों की अभेद्य छाँह में रहते हैं
कीड़ों की तरह

हम अपने बच्चों को
छोड़ जाते हैं पूर्वजों के पास
काम पर जाने के पहले

हम उठाते हैं टोकनियों पर
बोझ और समय
हम रुखी-सुखी खा और ठंडा पानी पीकर
चल पड़ते हैं,
अनंत की राह पर
और धीरे-धीरे दृश्य में
ओझल हो जाते हैं
कि कोई देखे तो कह नहीं पायेगा
कि अभी कुछ देर पहले
हम थे

हम अपने पूर्वजों की अस्थियों में रहते हैं-

                                           अंतिम किताब पढ़ी - पाकिस्तानी लेखिका किश्वर नाहिद की 'दायरों में फैली लकीर'  .......... सितारा इम्तियाज़ से सम्मानित  इस लेखिका को सर्वाधिक प्रसिद्धि 'हम गुनाहगार औरतें ' कविता से मिली जिसका अनेक भाषाओँ में अनुवाद हुआ।  इनकी शायरी और गजलें रचनात्मक ताकत और अभिव्यक्ति की क्षमता का प्रमाण हैं और अपने तजुर्बों और इज़हार के दम पर यह शाइरा पकिस्तान के संकुचित पुरुष सत्तात्मक समाज को लेखनी के दम पर चुनौती देने वाली एक नारीवादिन लेखिका हैं 'तुम से ', 'मोम महल ', 'तीसरे दर्जों वालों की पहली ज़रूरत ',' असीं बुरियाँ वे लोको ! ' आदि इनकी शानदार रचनाएँ हैं उर्दू भाषा की  मिठास और अपने मदरसे में पढने के दिनों को याद करते हुए मैंने इस पुस्तक को बड़े ही आराम से पढ़ा कहीं - कहीं कुछ शाब्दिक दिक्कतें आई मगर मेरे उर्दू के लेक्चरर ने वह समस्या दूर कर दी   इनकी एक कविता 'नाईट मेअर ' का एक अंश देखिए --

बकरी , ज़िबह होने के लिए इन्तिज़ार करती है
और मैं सुबह होने का
कि मैं रोज़ दफ़्तर की मेज़ पर ज़िबह होती हूँ
झूठ बोलने के लिए
यही मेरी क़ीमत है

                                            इनकी एक ग़ज़ल देखिए.......

हौसला , शर्ते वफ़ा , क्या करना
बंद मुठ्ठी में हवा, क्या करना

जब सुनता हो कोई , बोलना क्या
कब्र में शोर बपा , क्या करना

क़हर है लुत्फ़ की सूरत आबाद
आपनी आँखों को भी वा [खोलना ], क्या करना

दर्द ठहरेगा वफ़ा की मंजिल
अक्स शीशे से जुदा , क्या करना

                                            इन सब किताबों को पढ़कर केवल सहित्यिक दृष्टि से उन्नयन हुआ अपितु परिवेश को देखने की एक नई नज़र से भी रूबरू हुआ

जितेन्द्र कुमार सोनी
साहित्यधर्मी और
प्रशासनिकसेवा प्रशिक्षु  

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