फिर फिर याद आएँगे जानकी बल्लभ शास्त्री - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

नवीनतम रचना

फिर फिर याद आएँगे जानकी बल्लभ शास्त्री


जानकी बल्लभ शास्त्री के देव लोक गमन की सूचना और उनकी कुछ कवितायेँ हमारे साथी अरुण चन्द्र रॉय के सहयोग से यहाँ हम प्रकाशित करते हुए उन्हें हार्दिक शब्दांजली दे रहे हैं-सम्पादक

ऐ वतन याद है किसने तुझे आज़ाद किया ? 


ऐ वतन याद है किसने तुझे आज़ाद किया ?
कैसे आबाद किया ? किस तरह बर्बाद किया ?

कौन फ़रियाद सुनेगा, फलक नहीं अपना,
किस निजामत ने तुझे शाद या नौशाद किया ?

तेरे दम से थी कायनात आशियाना एक,
सब परिंदे थे तेरे, किसने नामुराद किया ?

तू था ख़ुशख़ल्क, बुज़ुर्गी न ख़ुश्क थी तेरी,
सदाबहार, किस औलाद ने अजदाद किया ?

नातवानी न थी फ़ौलाद की शहादत थी,
किस फितूरी ने फ़रेबों को इस्तेदाद किया ?

ग़ालिबन था गुनाहगार वक़्त भी तारीक़,
जिसने ज़न्नत को ज़माने की जायदाद किया ?

माफ़ कर देना ख़ता, ताकि सर उठा के चलूँ,
काहिली ने मेरी शमशेर को शमशाद किया ? 


कुपथ रथ दौड़ाता जो

कुपथ कुपथ रथ दौड़ाता जो 
पथ निर्देशक वह है, 
लाज लजाती जिसकी कृति से 
धृति उपदेश वह है, 

मूर्त दंभ गढ़ने उठता है 
शील विनय परिभाषा, 
मृत्यू रक्तमुख से देता 
जन को जीवन की आशा, 

जनता धरती पर बैठी है 
नभ में मंच खड़ा है, 
जो जितना है दूर मही से 
उतना वही बड़ा है। 


सांध्यतारा क्यों निहारा जायेगा 

सांध्यतारा क्यों निहारा जायेगा ।
और मुझसे मन न मारा जायेगा ॥

विकल पीर निकल पड़ी उर चीर कर,
चाहती रुकना नहीं इस तीर पर,
भेद, यों, मालूम है पर पार का 
धार से कटता किनारा जायेगा ।

चाँदनी छिटके, घिरे तम-तोम या
श्वेत-श्याम वितान यह कोई नया ?
लोल लहरों से ठने न बदाबदी,
पवन पर जमकर विचारा जायेगा ।

मैं न आत्मा का हनन कर हूँ जिया 
औ, न मैंने अमृत कहकर विष पिया,
प्राण-गान अभी चढ़े भी तो गगन 
फिर गगन भू पर उतारा जायेगा । 

गंध वेदना
 

केसर-कुंकुम का लहका दिगन्त है
गंध की अनन्त वेदना वसन्त


चीर उर न और
धुंधलाए वन की
ओ अनचीती बाँसुरी

गीत या अतीत बुझे द्वीप-द्वीप का
मोती अनबिंधा मुंदी-मुंदी सीप का,


धूला-धूला वर्तमान
धूप-तपा तीखा
चीख़-चीख़कर
हँसना-रोना है सीखा

गोपन मन भावी का काँचनार है
कब फूले क्यों मुरझे बेकरार है


उजले दिन
हरख साँझ-झाँवरी
थके-थके पाँव
अभी बहुत दूर गाँव री

और अंत में.......

  
ज़िंदगी की कहानी 
ज़िंदगी की कहानी रही अनकही !
दिन गुज़रते रहे, साँस चलती रही !

अर्थ क्या ? शब्द ही अनमने रह गए,
कोष से जो खिंचे तो तने रह गए,
वेदना अश्रु-पानी बनी, बह गई,

धूप ढलती रही, छाँह छलती रही !

बाँसुरी जब बजी कल्पना-कुंज में
चाँदनी थरथराई तिमिर पुंज में
पूछिए मत कि तब प्राण का क्या हुआ,

आग बुझती रही, आग जलती रही !

जो जला सो जला, ख़ाक खोदे बला,
मन न कुंदन बना, तन तपा, तन गला,
कब झुका आसमाँ, कब रुका कारवाँ,

द्वंद्व चलता रहा पीर पलती रही !

बात ईमान की या कहो मान की
चाहता गान में मैं झलक प्राण की,
साज़ सजता नहीं, बीन बजती नहीं, 
उँगलियाँ तार पर यों मचलती रहीं !

और तो और वह भी न अपना बना,
आँख मूंदे रहा, वह न सपना बना !
चाँद मदहोश प्याला लिए व्योम का, 
रात ढलती रही, रात ढलती रही !

यह नहीं जानता मैं किनारा नहीं,
यह नहीं, थम गई वारिधारा कहीं !
जुस्तजू में किसी मौज की, सिंधु के- 
थाहने की घड़ी किन्तु टलती रही !

10 टिप्‍पणियां:

  1. परम आदरणीय श्री जानकी बल्लभ शास्त्री(हमारे सच्चे पथ-प्रदर्शक) को शत-शत नमन एवं सादर श्रद्धांजलि.

    उत्तर देंहटाएं
  2. किंचित भी विश्वास नहीं हो रहा कि जिनका साक्षात्कार अभी अभी पढ़ा था,उन्ही के विषय में यह समाचार सुन रही हूँ...

    घोर विषादमय क्षण है यह...

    युगपुरुष को शत शत नमन !!!!

    उत्तर देंहटाएं

ज्यादा जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

Responsive Ads Here