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‘जिज्ञासा’ पुनर्जाग्रत हुई

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, अप्रैल 18, 2011 | सोमवार, अप्रैल 18, 2011

जिज्ञासा”’ द्वारा इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर (एनेक्सी) में मनीषा कुलश्रेष्ठ के कश्मीर समस्या पर लिखे गए बहुचर्चित उपन्यासशिगाफ़पर रोचक परिचर्चा हुई, जिसमें प्रमुख वक्ता सुमन केशरी अग्रवाल, देवेन्द्र, लता शर्मा तथा निरंजन देव शर्मा थे. अध्यक्षता अशोक वाजपेयी ने की.गोष्ठी के स्वागत भाषण मेंजिज्ञासाके संस्थापक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल नेजिज्ञासाके गठन और उद्देश्य पर प्रकाश डाला तथा उपन्यास की विशेषता पर बात की. उन्होंने स्वागत भाषण में कहा कि -- ‘जिज्ञासाका गठन हम कुछ दोस्तों ने यही कोई ३० बरस पहले किया था, जब हम जे यू में पढ़ा करते थे. उसका संदर्भ अब भी कुछ लोगों को याद हो शायद, “मेनस्ट्रीममें पी.एन हक्सर और प्रो. नरसिमैय्या और दूसरे कुछ बुद्धिजीवियों का लिखा हुआ जोसाईन्टिफिक टैम्परकी ज़रूरत को  रेखांकित करते हुए एक स्टेटमेंट छपा था, हम लोगों ने उस स्टेटमेंट को लेकर एक टिप्प्णी भेजी थी, उनमें खाक़सार था, सुमन थीं, ज्ञानेन्द्र पाण्डे, अशोक श्रीवास्तव और कुछ अन्य मित्र भी थे, एक तरह से वह स्टेटमेंटजिज्ञासाकी पहली गतिविधि थी. उसके बाद हम गोष्ठियाँ आदि आयोजित करते रहेउनमें से एक गोष्ठी महत्वपूर्ण थी, “भक्ति पोएट्री एण्ड मिडाईवल कल्चर ऑफ प्रोटेस्टउसमें दिए गए प्रो. नामवर सिंह के और प्रो. मुकिया के  व्याख्यान बहुत महत्वपूर्ण माने गए थे और वे प्रकाशित भी हुए. इसके बाद हमने साहित्येतर विषयों परज़िज्ञासानाम से पत्रिका निकाली, हालांकि दो लोगों की स्कॉलरशिप के चलते यह इस पत्रिका के दो ही अंक निकले.'' इसके बाद प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल नेजिज्ञासाके पुनर्जाग्रत होने पर चुटकी लेते हुए कहा कि --“ “जबसे मुझे जे एन यू से मुक्त होने का सौभाग्य मिला तबसेजिज्ञासापुनर्जाग्रत हुई, ठीक उसी तरह जिस तरह जे एन यू से मुक्ति के बाद मेरे लिखने की क्षमता पुनर्जाग्रत हुई. पिछ्ले दोतीन बरसों में हम अनौपचारिक गोष्ठियाँ करते रहे हैं, मगर यह हमारा पहला औपचारिक कार्यक्रम है.” उपन्यास पर चर्चा करने की बात यूँ सूझी, कि यह उपन्यास उस नई तकनीकी महिमा को रेखांकित करता है, जिससे मैं पिछ्ले - महीनों से अभिभूत हूँ. यानि ब्लॉगिंग और फेसबुक. इस उपन्यास की जो एक शिल्पगत विशेषता लगी कि , जिसे हम ब्लॉगिंग कहते हैं या इस तरह की अन्य गतिविधियाँ हैं...एक लेवल पर वह आपके एकांत का कथन है, जब आप अपने कम्प्यूटर पर बैठे हैं, तो आप अकेले हैं मगर दूसरे लेवल पर आप एक ऎसे  समुदाय से जुड़े रहते हैं जिसका अस्तित्व है संसार में.... भले ही एन उस वक्त आपके सामने नहीं है मगर उसका आभास लगातार आपके साथ मौजूद है, और यह आभासी दुनिया जो है वह वास्तविक दुनिया से कैसे निरंतर आवाजाही करती है वह अद्भुत अनुभव है.” **एक तरह का आत्मालाप, लेकिन ऎसा आत्मालाप जिसे करते समय आप जानते हैं ठीक उसी समय संसार में अन्य आत्मालापी लोग उस समय आपसे जुड़े हैं. दूसरी रोचक बात, एक ऎसी स्थिति ,...एक पात्र इसमें कहता है किमैं अपने कश्मीरी होने पर उलझन महसूस करता हूँ. मुझे लगता है यह उलझन सारे साउथ एशिया की उलझन है. ***** इस उलझन को संवेदनात्मक धरातल पर समझने की ये रचनात्मक कोशिश मुझे व्यक्तिगत तौर पर बहुत महत्वपूर्ण लगती है.”

युवा आलोचक, तथाबनासके संपादक पल्लव ने संचालन करते हुए कहा कि “- मैं यह मान कर चलता हूँ कि जो मंच और संगठन होते हैं या नए - नए समूहों की शुरुआत होती है वह होती रहनी चाहिए और पुराने समूह अगर फिर पुनर्नवा होते हैं तो यह और भी स्वागतयोग्य बात है. मुझे खुशी है कि मैंजिज्ञासाके इस नई शुरुआत में शामिल हूँ.उपन्यास की थीम में गुम्फित सूफीज़्म को समर्पित करते हुए कार्यक्रम का आरंभ शास्त्रीय गायिका कस्तूरी अट्रवालकर ने अपने उम्दा अन्दाज़ सूफी अंदाज़ गाईजिगर मुरादाबादीकी एक खूबसूरत ग़जल के साथ किया.

जलवाबकद्र - ज़र्फे नज़र  देखते रहे ,
क्या देखते हम उनको मगर देखते रहे

प्रो.पुरुषोत्तम जी 
इसके बाद इस उपन्यास के कवर की डिजाइनर और पहली पाठिका,कनुप्रिया कुलश्रेष्ठ ने अपने ब्लॉग पर लिखे नोट का हिन्दी अनुवाद पढ़ते हुए .”उन्होंने एक बात को बहुत मार्मिक ढंग से कहा किमैं इस उपन्यास को पढ़ कर एक गिल्ट से भर गई कि, मैं भारतीय होने के नाते कैसे इस बात से असम्पृक्त रही? मैं ने कल्पना करने की कोशिश की कि अवंतिपुर के पास एक छोटे से गाँव में आतंक के साये में रहने वाली मेरी ही उम्र की किशोरी हर पल एक भय के साथ बिना स्कूल जाए रहती होगी? क्या वह वे कपड़े पहन पाती होगी जो मैं पहनती हूँ? या वह अगले दिन अपने भाईबहनों के पेट पालने की समस्या से जूझती होगी. या सड़क पार से पानी लाने की सोचती होगी. क्या वह पढ़ पाएगी कभी? क्या उसे भारतीय होने पर गर्व होता होगा? उसका मन नहीं करता होगा इस स्थायी भय से भाग जाने का?”

कृति को उसकी सम्पूर्णता में देखते हुएयाज्ञवल्क्य से बहसकाव्यसंग्रह की लोकप्रिय कवि और संवेदनाओं की सफल कथाकार सुमन केशरी ने अपने आलेख में उपन्यास के बहाने आज की वैश्विक अस्मिता संकट की राजनीति, उसके परिणाम और उसके संभावित खतरे की  विवेचना की है. यह विवेचना बहुकोणीय इस तरह है की उपन्यासशिगाफ़इसके प्रकाश में सम्पूर्ण विश्लेषित हो जाता है.उन्होंने कहा कि आजकल कोई कथा प्रामाणिक तभी है जबकि  वह  ठेठ सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता के अर्थ में विशुद्ध आत् द्वारा बाँची जा रही हो. इस प्रचलित कॉमनसेंस का सर्जनात्मक प्रतिवाद करने के कारण मनीषा कुलश्रेष् का शिगाफ़ गहरे और दूरगामी अर्थों में महत्वपूर्ण हो जाता है.

सुमन केशरी ने विशेष रूप से उल्लेखित किया कि –“ इस उपन्यास में मनीषा विस्थापन की पीड़ा को व्यक् करने के लिए एक बिम् का बार बार उपयोग करती हैं—‘हमारी जड़ें खुल गई हैं’... ‘जड़ें नंगी हो गई हैं...’ आदि. अमिता के माध्यम से लेखिका गोया इन्हीं जड़ों की तलाश करती है. मनीषा एक जगह यह भी नोट करती हैं कि हिन्दुओं के कश्मीर से विस्थापित हो जाने के बाद वहाँ बचे मुसलमानों की भी जड़ें उघड़ गईं हैं, क्यों कि दोनो कौमे एक दूसरे से जुड़ी हुई थीं. यह बात भारतीय सामाजिक- सांस्कृतिक विशेषता को रेखंकित करती है.”

शहर कोतवाल की कविताजैसे एक ही कहानी संग्रह से कथाजगत मेंलोकप्रिय हो जाने वाले कथाकार देवेन्द्र ने अपने चिरप्रिचित अन्दाज़ में उपन्यास पर बात की.उनके अनुसारमूल रूप से इस उपन्यास की जो विशेषता है जो कि लम्बे समय तक जहन में गढ़ जाती है, वह है ब्लास्फेमी से ग्रस्त पूरी कश्मीर समस्या को वैश्विक परिदृश्य पर नई तकनीकी के माध्यम से यूँ रख दिया है जैसे कि किसी अलाव के सामने कोई समस्या रख दी जाए और वह हर कोण से साफ़ दिखने लगे. “उन्होंने एक बात को बहुत ज़ोर देकर कहा कि - उपन्यास के एक अध्यायजुलेखा के मिथकमें ही सारी कश्मीर त्रासदी का सार छिपा है, कि ज़ुलैखा की मंगनी भारतीय सेना के नौजवान से हुई है और प्रेम एक पाकिस्तानी आतंकवादी से होता है. इस अध्याय की भाषा संगीत कीसी तरल भाषा, लोकगाथाओंमिथगाथाओं सी, पहले कभी नहीं पढ़ी. इस अध्याय का पहला पैरा ही  बता देता है कि इस खुशनुमा शुरुआत में कहीं कोई गहरी त्रासदी छिपी है.

कुल्लू से आए युवा आलोचक निरंजन देव शर्मा ने अपने आलेख में कहा कि – “ किसी समाज की अपनी पहचान के मसले तब और पेचीदा हो जाते हैं जब उन मसलों को सुलझाने की कवायद में लोग इस कदर भटक जाते जाते हैं कि समस्याओं के अंतहीन धागे उलझते चले जाते हैं। आतंकवाद के साये में जलते कश्मीर का एक छोर कश्मीरी अवाम है तो दूसरा छोर कश्मीरी पंडित एक छोर आतंकी हैं तो एक छोर आर्मी एक छोर हिन्दोस्तान है तो एन छोर पाकिस्तान। अमेरिका , एमनेस्टी , मीडिया और एन जी जैसे कितने ही और छोर हैं। अनसुलझे धागों के सिरे पकड़ पाने के प्रयास में लिखा गया उपन्यास है - शिगाफ़। मनीषा कुलश्रेष्ठ ने इस उपन्यास को रचते हुए अमानवीयता के पीछे खो चुके मानवीय चेहरे को ढूंढने की कोशिश की है। कितने ही चेहरों को ठीकठीक पहचानने से कई बार चूक जाते हैं हम।

इसके बाद जानी-मानी उपन्यासकार लता शर्मा ने इस उपन्यास के हर छोटेबड़े पात्र पर बहुत खूबी के साथ विश्लेषण किया. उनके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तरों को उभारा. लता शर्मा ने कहा किमनीषा का एक कहानीसंग्रह है, “कुछ भी तो रूमानी नहींवैसे ही उसके उपन्यास शिगाफ के पात्रों के बारे में कहूँगी कि यहाँ कोई भी तो साधारण नहीं, सब के सब विचलित हैं अपने पथ से हटे हुए*****मैं ऎसे पात्रों से पहले कभी नहीं मिली. मैंने क्रिकेट खेलते, गलियों में फिल्मी नायकों की नकल उतारते छोटे लडके पढ़ेदेखेसुने भी, मगर थैले में बम लिये भागा जाता, अगले दिन की रोटी के लिए टूरिस्ट बस पर बम फेंकता लड़का नहीं देखा.

कथाकार लता शर्मा के इस वक्तव्य के बाद लेखकपाठक संवाद आरंभ हुआ. जिसमें श्रोताओं की तरफ से उपन्यास के कथ्य को लेकर कुछ रोचक और सटीक सवाल उठाए गए. कुछ कश्मीर मुद्दे के समाधान को लेकर, कुछ इस मसले के ऎतिहासिक तत्वों को लेकर कुछ पात्रों को लेकर कार्यक्रम में माहौल में ऊष्मा भर देने वाले सवाल भी पूछे गए, जिनके उत्तर मनीषा ने दिए, साथ ही श्रोताओं के बीच भी कई हास्यमय चुट्कियाँ ली गईं, और ठहाके उछ्ले जिससे चर्चा बहुत रोचक हो गई.

मनीषा कुलश्रेष्ठ ने उपन्यास के प्रस्थान बिन्दु पर और पाठकों के सवालों के विस्तृत उत्तर में अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया. उनके अनुसार --  कश्मीर पर लिखते हुए अतीत के खाली स्थानों को भरना मेरा उद्देश्य नहीं था, नएपुराने तथ्यों का संकलन ही समाधान सुझाना. झेलम के पुलों के नीचे से बहे खूनी समय के बहाव में मेरे पास कुछ जुडे हुए ऎसे क्षण थे जिन्हें मैं यास्मीनअमिताज़ुलैखा के माध्यम से व्यक्त करना चाहती थी.
आस्था और अनास्था की बर्बर लड़ाई में ज़मीन पर गिर चुके जीवन केदिशा संकेतक बोर्डको दुबारा ठोक कर गाड़ देना चाहती थी कि एक पगडंडी यह है, जो अमन की तरफ होकर गुज़रती है, राह ज़रा कठिन और लम्बी है, मगर है तो...देखो..वो वहाँ उधर से. “शिगाफ़आतंक की गाथा नहीं, धर्म की पैरवी या मुख़ालफत नहीं, मनुष्य मात्र के आपसी बारीक रिश्तों के पैरहन में खिंचाव, उधड़न और नए सिरे से बुनावट की सफलअसफल कोशिशों की कहानी है.

अंत में उन्होंने कृष्ण बलदेव वैद को याद किया औरकृष्ण बलदेव वैद फैलोशिपके लिए उनका अभार व्यक्त किया.अंत में अशोक वाजपेयी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि - “बहुत बरसों से यह बात कही जाती है कि उपन्यास का एक अपना विज़डम होता है, एक  विवेक होता है, इस उपन्यास का विवेक यही है कि ...जो कि सवाल पूछा गया कि आपने इस उपन्यास में कश्मीर समस्या कोई समाधान प्रस्तुत क्यों नहीं किया?”वे आगे कहते हैंहम सब अपने भूगोल में बन्दी है, अपने जीवन में बन्दी हैं, चाहे तयशुदा ज़िन्दगी हो कि गैरतयशुदा, हम अपने समय में बन्दी हैं ...मनुष्य का एक बड़ा काम यह है कि इन बंदिशों से मुक्त होकर एक अपनी बुनियादी इंसानियत का पुनर्वास करना...यह जद्दो जहद इस उपन्यास के मूल में है. बाईबल में कहा गया है किफैसला मत दो कि तुम पर भी फैसला आयद होगा. “ खासकर उपन्यास का काम फैसला देना नहीं बल्कि जो लोग फैसले पर उतारू हैं उन्हें फैसला देने से ठिठकाना है, सोचो ऎसी हालत में तुम्हें कोई फैसला देने का हक़ है? इस उपन्यास में इस अध्यात्म को बहुत खूबी से विन्यस्त किया गया.

आगे उन्होंने कहा कि – “ दूसरी खूबी जो इस उपन्यास की है वह है भाषा, कई रजिस्टर भाषा के इसमें हैं. जहाँ आजकल उपन्यास और कहानियाँ निहायत लापरवाही से लिखी जा रही हैंमुझे प्रसन्नता इसकी है कि मनीषा ने अपनी भाषा बखूबी विन्यसत की. वो भाषा सीधी राह चलने वाली भाषा नहीं है जो कई अर्थों में विपथगामी भाषा है, क्योंकि दुर्भाग्य या सौभाग्य से सच्चाई जो है वह भी बार बार अपना पथ बदलती है. उसको चरितार्थ करने के लिए ही ये विधियाँ अपनाई गई हैं.युवा आलोचक तथाबनासके संपादक पल्लव ने संचालन करते हुए कहा कि '' मैं यह मान कर चलता हूँ कि जो मंच और संगठन होते हैं या नए - नए समूहों की शुरुआत होती है वह होती रहनी चाहिए और पुराने समूह अगर फिर पुनर्नवा होते हैं तो यह और भी स्वागतयोग्य बात है. मुझे खुशी है कि मैंजिज्ञासाके इस नई शुरुआत में शामिल हूँ.''

अंत में आभार ज्ञापित करते हुए  प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि – “उपन्यास अगर कश्मीर की समस्या के बारे में और भाषा की संभावनाओं के बारे सम्वेदन शील बनाता है तो उपन्यास सफल है और एक ऎसे सफल उपन्यास की चर्चा के लिए आप जिज्ञासा के इस कार्यक्रम में आए हमारा यह आयोजन सफल है.” 

युवा आलोचक और बनास पत्रिका के सम्पादक 
डॉ.पल्लव के सहयोग से 

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