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पुखराज जाँगिड़ की रपट :संजीव कुमार को देवीशंकर अवस्थी आलोचना पुरस्कार

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, अप्रैल 06, 2011 | बुधवार, अप्रैल 06, 2011


नयी दिल्ली : 6 अप्रैल :

हिंदी के युवा आलोचक और नया पथ की संपादकीय टीम के सक्रिय सदस्य संजीव कुमार को कल इस वर्ष के देवीशंकर अवस्थी आलोचना पुरस्कार से सम्मानित किया गया। साहित्य अकादमी के खचाखच भरे हाल में वरिष्ठ कवि कुंवरनारायण से ले कर युवतर कवियों और आलोचकों की उपस्थिति में संजीवकुमार ने पुरस्कार प्राप्ति के अवसर पर अपने हास परिहास भरे भाषण में अपनी प्रतिभा का पूरा परिचय दिया। वे जनवादी लेखक संघ की केंद्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और हमारे संपादकमंडल के एक सक्रिय सदस्य हैं, उनमें अपनी विचारधारात्मक दृढ़ता, रचनात्मक क्षमता और साहित्यिक संवेदनशीलता आलोचनात्मक विवेक ऐसे स्तर का है जो किसी को भी प्रभावित किये बग़ैर नहीं रह सकता, उनकी विचारधारा के विरोधी भी उनसे प्रभावित होते हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता अशोक वाजपेयी ने की, मंच पर विश्वनाथ त्रिपाठी भी बैठे थे जिनका इस अवसर पर शाल ओढ़ा कर विशेष सम्मान किया गया, 92 वर्षीय दिल्ली विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त हिंदी के प्रोफेसर सत्यदेव चौधरी ने देवीशंकर अवस्थी के साथ हिंदी विभाग में बिताये दिनों और उनके देहावसान के समय का जीवंत चित्रण किया। कार्यक्रम का संचालन जाने माने पत्रकार रवींद्र त्रिपाठी कर रहे थे।

"1967 में पटना में जन्मे युवा आलोचक संजीव कुमार की आलोचना नितांत समसामयिकता तक महफूज रहने के बजाए आधुनिक परंपरा के उन तत्त्वों की ओर ध्यान देती है जोकि या तो पहले गंभीरता से देखे-परखे नहीं गए है या गंभीर कुपाठ का शिकार हुए है। वे अध्यवसाय और सूक्ष्म-दृष्टि द्वारा सृजन के सैद्धांतिक नेपथ्य को विचार में लेते है और वो उसकी सहायता से कृति को समझने की कोशिश करते है। उनकी पुस्तकजैनेंद्र और अज्ञेयऐसी कोशिश का ही सुफल है। उन्होंने स्पष्टता से साक्ष्य तथा अंतःसाक्ष्य की पड़ताल कर आधुनिकता के इन दो मूर्धन्यों को अकादमिक आलोचना में रूढ हो गई अवधारणाओं से मुक्त कर, उनके अपने व्यक्त सिद्धातों आदि के आधार पर एक तरह से औपन्यासिक परंपरा में व्यवस्थित करने का उल्लेखनीय प्रयास किया है। उनकी पुस्तक अकादमिक आलोचना की तीखी आलोचना भी है और कृतियों को कृतिकारों की अन्यथापलव दृष्टि और अवधारणाओं के आलोक में पढने का निमंत्रण देती है। जैनेंद्र और अज्ञेय पर फ्रायड के प्रभाव की प्रचलित धारणा का संजीव कुमार ने प्रमाणपूर्वक प्रत्याख्यान किया है। संजीव कुमार को अकादमिक आलोचना की कुछ भ्रांतियों को दूर कर कृतियों को किसी प्रवृति के उदाहरण के रूप में देखकर अपनी स्वायत्ता-दृष्टि के संदर्भ में देखने की चेष्टा करने के लिए हम देवीशंकर अवस्थी सम्मान से विभूषित करते हुए उत्साह अनुभव करते है।"

निर्णायक समिति-,कृष्णा सोबती,विश्वनाथ त्रिपाठी,चंद्रकांत देवताले,अशोक वाजपेयी,मंगलेश डबराल,कमलेश अवस्थी।

'देवीशंकर अवस्थी स्मृति सम्मान-2011' युवा-आलोचक संजीव कुमार को उनकी आलोचना-पुस्तक 'अज्ञेय और जैनेंद्र' (स्वराज प्रकाशन, दिल्ली) के लिए वरिष्ठ साहित्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा प्रदान किया गया. 05 अप्रैल 2011 को नई दिल्ली स्थित साहित्य अकादमी के रवींद्र भवन में आयोजित सम्मान-समारोह में विश्वनाथ त्रिपाठी ने उन्हें यह पुरस्कार प्रदान करते हुए कहा कि हिंदी-समाज अवस्थी जी के प्रति बहुत ही आत्मीयता और अपनापन महसुस करता रहा है। इसलिए युवा आलोचक संजीव कुमार को यह सम्मान प्रदान करते हुए मैं स्वयं सम्मानित महसुस कर रहा हूँ।देवीशंकर अवस्थी स्मृति सम्मानहिंदी में आलोचना की संस्कृति के विकास में उल्लेखनीय योगदान के लिए 1995 से हर साल दिया जाने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण सम्मान है। प्रसिद्ध आलोचक देवीशंकर अवस्थी की स्मृति में प्रतिवर्ष उनके जन्मदिवस 05अप्रैल (1930) के अवसर पर आयोजित 'सम्मान समारोह' में दिया जाता है. सम्मान-समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी ने की और निर्णायक मंडल की ओर से इस पुरस्कार की चयन-प्रणाली से अवगत कराते हुए सम्मान-समारोह के अध्यक्ष वरिष्ठ कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी ने कहा कि इसमें हम पिछले वर्षों में प्रकाशित आलोचना-कृतियों (जिनमें अप्रकाशित पांडुलिपियां लंबे निबंध भी हो सकते है) पर विचार करते है।


पुरस्कार निर्णायक समिति के वक्तव्य और प्रशस्ति-पाठ का वाचन करते हुए समारोह-संचालक रवींद्र त्रिपाठी ने बताया की इस पुरस्कार का चयन पांच सदस्यीय पुरस्कार निर्णायक समिति (अध्यक्षा कृष्णा सोबती और अन्य सदस्य- विश्वनाथ त्रिपाठी, चद्रकांत देवताले, अशोक वाजपेयी और मंगलेश डबराल) द्वारा सर्वसम्मति से लिया गया। युवा आलोचक संजीव कुमार की आलोचना नितांत समसामयिकता तक महफूज रहने के बजाए आधुनिक परंपरा के उन तत्त्वों की ओर ध्यान देती है जोकि या तो पहले गंभीरता से देखे-परखे नहीं गए है या गंभीर कुपाठ का शिकार हुए है। वे अध्यवसाय और सूक्ष्म-दृष्टि द्वारा सृजन के सैद्धांतिक नेपथ्य को विचार में लेते है और वो उसकी सहायता से कृति को समझने की कोशिश करते है। उनकी पुस्तकजैनेंद्र और अज्ञेयऐसी कोशिश का ही सुफल है। इससे पहले यह पुरस्कार मदन सोनी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, सुरेश शर्मा, शंभुनाथ, वीरेंद्र यादव, अजय तिवारी, पंकज चतुर्वेदी, अरविंद त्रिपाठी, कृष्णमोहन, अनिल त्रिपाठी, ज्योतिष जोशी, प्रणयकृष्ण और प्रमिला के.पी. को मिल चुका है. पुरस्कार निर्णायक समिति की नियामिका और संयोजिका कमलेश अवस्थी और समस्त अवस्थी परिवार ने उपस्थित सभी सुधी साहित्य-प्रेमियों का अभिवादन-स्वागत किया। इस सम्मान-समारोह में दिल्ली विश्वविद्यालय में अवस्थी जी के सहकर्मी रहे सत्यदेव चौधरी ने अपने संस्मरणात्मक वक्तव्य में कहा कि अवस्थी जी अपने अध्ययन-अध्यापन, लेखन जीवन-शैली में आधुनिकता के प्रतीक थे। उन्होंने हमेशा अख्यात और नए लेखकों को लेखन के प्रेरित और प्रोत्साहित किया। उनकी प्रतिभा का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि निधन से पूर्व जहाँ उनकी केवल पाँच पुस्तकें ही प्रकाशित हुई जबकि उसके बाद से अब तक उनकी कई किताबें चुकी है और लगातार चर्चा में रही है।

देवीशंकर अवस्थी जी की स्मृति को नमन करते हुए पुरस्कृत आलोचक संजीव कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा कि यह अवसर मुख्यतः अवस्थी जी का जन्मदिन मनाने का है और किसी युवा आलोचक को उसके कार्य के लिए प्रोत्साहित करना तो उसका हिस्सा भर है। उन्होंने इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाया कि छत्तीस साल की छोटी सी उम्र में अवस्थी जी ने साहित्यिक हलके में जैसा और जितना हस्तक्षेप दर्ज किया वह हम जैसों के लिए गहरे आश्चर्य का विषय है और अपने समय का कोई भी ज्वलंत प्रश्न नहीं रहा होगा जिसपर अवस्थी जी ने लिखित मुटभेड़ की हो। और इस मुटभेड़ के लिए भारतीय काव्य तथा काव्यशास्त्र की परंपरा से लेकर पश्चिम के साहित्य सिद्धांतों के अपने ज्ञान का समुचित उपयोग किया हो।

इस अवसर पर आयोजित 'उपन्यास और हमारा समय' विषयक विचार-गोष्ठी का प्रारंभ करते हुए पंकज बिष्ट (रामजी यादव द्वारा पढे पर्चे में) ने कहा कि उपन्यास की पहली और आखिरी विशेषता उसकी समकालीनता ही है और इस रूप में उपन्यास और हमारे समय पर बात करने का दूसरा अर्थ उपन्यास और हमारा समाज या फिर समाज और उपन्यास के रिश्ते को रेखांकित करना है। आजादी के बाद से ही हिंदी में उपन्यास को हाशिए पर धकेल दिए जाने के परिणाम भी हम देख रहे है। कितनी बड़ी विडंबना है कि 40 करोड़ हिंदीभाषियों के पास 40 अच्छे उपन्यासकार भी नहीं है। रवींद्र त्रिपाठी ने कहा कि समाज कोई निश्चित या पारिभाषिक शब्द नहीं है। इसमें गाँव-शहर, परंपरा-आधुनिकता के साथ बहुत कुछ समाया है। हिंदी में उपन्यास-आलोचना का आत्मविश्वास कविता-आलोचना की तुलना में काफी संकट में रहा है। आशुतोष कुमार ने समय के साथ उपन्यास के रिश्ते को विश्लेषित करते हुए कहा कि उपन्यास समय की समूची अवधारणा के खिलाफ खड़ा है और स्मृति, यथार्थ और कल्पना के बीच की दूरी उपन्यास की औपन्यासिकता को तय करती है, औपनिवेशिक इतिहास के शोषण के रूपों का आख्यान बनाती है और इस तरह वह खंडित होते मनुष्य के मनुष्य होने के अहसासों को रेखांकित करता है।

पुरस्कृत आलोचक संजीव कुमार ने कहा कि लेखक पाठक का रोना तो रोते है लेकिन खुद उन्होंने इसे पाठक से जोड़ने, उसे लोकप्रिय बनाने के लिए क्या किया? अगर किसी ने ऐसा किया भी तो उसे भाषायी खिलंदड़ापन करता गप्पोड़ कहा गया। उपन्यासकार को अगर उपन्यासकार बने रहना है तो उसे तरह-तरह की आवाजों को स्पेस देना ही होगा। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में अशोक वाजपेयी ने महाकाव्य और उपन्यास के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि महाकाव्य मनुष्य की पवित्रता के बोध से मुक्त नहीं हो पाता और उपन्यास मनुष्य की अपवित्रता के बोध से। एक लोकतांत्रिक कर्म के रूप में उपन्यास ने ही सबसे अधिक चालू नैतिकता को चुनौती दी है, एक तरह की नैनिक प्रश्नवाचकता को चिह्नित किया है। इस मायने में वह हमारी स्वतंत्रता का विस्तार करता है, उसके प्रति हमारी जवाबदेही पुष्ट करता है। अंत में अनुराग अवस्थी ने सभी आगंतुकों का धन्यवाद ज्ञापित किया।

संपर्क :-                                                                                                                               
पुखराज जाँगिड़ की रपट , शोधार्थी,
भारतीय भाषा केंद्र, जेएनयू, नई दिल्ली-110067
-मेल :- pukhraj.jnu@gmail.com

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1 टिप्पणी:

  1. माणिक भाई, हिंदी आलोचना के लिए दिए जाने वाले युवाओं के सबसे बड़े सम्मान की इतनी भव्य प्रस्तुति के लिए आपका बहुत शुक्रिया।
    आपका - पुखराज जाँगिड़।

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