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'वर्ण व्यवस्था ही छूआछूत की जड़ है'- डॉं. सत्य नारायण व्यास

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, अप्रैल 15, 2011 | शुक्रवार, अप्रैल 15, 2011

चित्तौडगढ 14 अप्रैल 2011 

प्रयास कार्यालय में अम्बेडकर जयन्ति के अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में सर्वप्रथम संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर को माल्यार्पण कर विचार विमर्श प्रारम्भ हुआ. प्रारम्भ में हिंदी साहित्य के समालोचक और कवि डॉ. एस.एन.व्यास ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि देश में वर्णाश्रम व्यवस्था ही छूआछूत की जड़ है इसे नष्ट करने पर ही देश में समतामूलक समाज का विकास और असल रूप में राष्ट्र का विकास सम्भव है। डॉ. व्यास ने कहा कि मैं अम्बेडकर को कई मायनों में महात्मा गांधी से भी बडा मानता हूं.हिन्दू धर्म के बहुत से ग्रान्ह्तों का सांगोपांग अध्ययन करने के बाद ये पाया कि मनुस्मृति और गीता भी प्रमाणिकता की दृष्टि से संदिग्ध है। सही मानवीय संदेश तो अम्बेडकर ने अपने कृतित्व में दिया है।वे कहते थे कि  देशहित में व्यक्तिगत हित को त्याग दूंगा।मगर जब जातिहित के बात होगी तो राष्ट्रहित को भी वे अलग थलग कर देंगे.देशहित तभी गरिमामयी होगा जब तक समानतामूलक समाज बन पाएगा। डॉ. व्यास कहते हैं कि आज जाती के आधार पर आदमी की पहचान होने के ज़माने गए अब तो व्यक्तिगत जीवन में चरित्र और विचार सर्वोपरी स्थान पाकर पहचान है. 

कोलेज शिक्षा के पूर्व प्राचार्य पुरुषोत्तम गहलोत ने अपने संघर्षमयी जीवन के अनुभवों से अवगत कराते हुए कहा कि उन्होंने जहां-जहां पर भी अपनी सेवाएं दी वहां-वहां छूआछूत को समूल नष्ट करने का पूरा प्रयास किया। उन्होने दलित को समाज का डाक्टर बताते हुए कहा कि यदि ये डाक्टर नही होते तो पूरा गांव सड़ जाता। आरक्षण की उपज असल में आदिवासी,जंगली जातियों या अछूत की वजह से है. इससे आज देश में जातीयता के आधार पर बांटकर जो भयावह और विकट स्थिति उत्पन्न हो की गई है ऐसे में बहुत बड़ा संकट आ गया लगता है.। उन्होंने वर्तमान राजनिति पर कटाक्ष करते हुए कुछ काव्य रचनाएं भी प्रस्तुत की। 

नगर के वरिष्ठ अधिवक्ता बी.एल.शिशोदिया ने कहा कि हमने कभी भी छूआछूत नही किया.उन्होंने खुद के जीवन से कई संस्मरण सुनाएं. हालिया प्रकाशित हंस पत्रिका और ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ''झूठन''  से कई बातें उदाहरण के रूप में कहते हुए उन्होंने दलित साहित्य को बहुत ज़रूरी और धारदार कहा. ऐसे साहित्य को पढ़ने की ज़रूरत भी वक्त की। सामाजिक कार्यकर्ता प्रभात सिन्हा ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आजाद भारत में दास प्रथा किसी न किसी रूप में आज भी मौजूद है। जाति आधारित व्यवसाय अब नही रहे है । इस बदली हुई परिस्थितियों में आज की जरूरत बदल रही है.जाने क्यों आज भी दलित के हाथो से मंदिरों का निर्माण होता है मगर गंगाजल प्रवेश  के बाद उन्ही मज़दूरों का वहाँ प्रवेश बंद हो जाता है। पेशे से चिकित्सक डॉ. वी.पी. पारिक ने कहा कि इन्सानियत की कोई जात नही होती । 

वरिष्ठ अधिवक्ता के.एल. श्रीमाली ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि देश में आर्थिक आधार पर शोषण जारी है। उन्होंने बताया कि आदिकाल में जातियता इतनी हावी हो गई कि दलितों को अपने पद चिन्ह मिटाने के लिए शरीर के पीछे कोडा या झाडू बान्ध कर चलना पडता था वे ज़मीन पर थूक नही सकते थे। लेकिन शिक्षा के व्यापक प्रसार और दलितो की जागरूकता के कारण परिस्थितियां कुछ हद तक बदल गई है,इन्हें और भी बदलने की जरूरत है।आज के दौर में एक सोची समझी चाल के तहत पूंजीवादी व्यवस्था कैसे कायम रहे इसी बात के प्रयास अब भी जारी है। अम्बेडकर को कुछ जाति विशेष के लोगों तक सिमित समझना संकीर्ण सोच का परिचायक होगा,वे असल मायनों में मानवता के पुजारी थे वे किसी जाति, धर्म के बन्धन से मुक्त थे।राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक रहे प्रो. सी.एम. कोली ने अम्बेडकर के जीवन के सिलसिलेवार कई वृतान्त करते हुए बताया कि अब आरक्षण राजनीति का शिकार हो गया है। निजी स्वार्थो के वशीभूत होकर अब समूह और वर्ग बनने लगे है। 

संगोष्ठी के अन्त में सामुदायिक स्वास्थ्य वैज्ञानिक और आयोजक प्रयास संस्थान के सचिव डॉ. नरेन्द्र गुप्ता ने दलितों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर गहरी चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि हमारे देश में आधे से अधिक लोग पर्याप्त भोजन नही मिलने के कारण कुपोषण के शिकार है ऐसे ही समय में बातें उठ रही है कि विश्व के अमीर व्यक्तियों में से हमारे देश में 5वां अमीर व्यक्ति है यह हमारे लिए गर्व की नही शर्म की बात है।  पूंजीपति लोग आर्थिक संसाधनों पर अपना अधिपत्य जमाकर उसे एक ईश्वरीय सत्ता का स्वरूप देने  के साथ ही उसे सांस्कृतिक और धार्मिक जामा पहनाने में लगे हैं ताकि उनके अपने स्वार्थ पूर सकें. अपनी हाल ही की दक्षिणी अफ्रिका यात्रा का जिक्र करते हुए डॉ. गुप्ता ने कहा कि वहां रंगभेद संग्रहालय में ये अनुभव किया जा सकता है कि जो संसाधनों के वास्तविक मालिक है उन्हें ही उसके असल लाभ से वंचित करके बड़ी चतुरता से सेवक बना दिया जा रहा है। संगोष्ठी में पूर्व प्राचार्य डॉ. ए.एल. जैन,लोकगीतों पर काम करने वाली लेखिका  चन्द्रकान्ता व्यास,स्पिक मैके समन्वयक जे.पी. भटनागर ने भी अपने विचार व्यक्त किये। संचालन 'अपनी माटी वेब पत्रिका के सम्पादक और संस्कृतिकर्मी माणिक ने किया। कार्यक्रम प्रभारी रामेश्वर शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापित किया। 

इस प्रकार इस अवसर पर वरिष्ठ नागरिक मंच अध्यक्ष नवरतन पटवारी,विजयपाल सिंह, रितेष लढा, अर्पण सेवा संस्थान की  संगीता त्यागी, मनीषा बेन सहित कई प्रबुद्वजन एवं वरिष्ठ नागरिकों ने भाग लिया।




योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

रामेश्वर शर्मा
प्रबंधक
प्रयास संस्था,आठ-विजय कोलोनी
 रेलवे स्टेशन रोड,चित्तौड़ गढ़
web: prayaschittor.org
Telefax: +91 1472 243788 / 250044
Mobile No. +91 9461637025



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2 टिप्‍पणियां:

  1. मान्यवर आपके विचार जाने
    मुझे लगता है शायद आपने वर्ण आश्रम के बारे जानने की खभी कोशिश नहीं की है
    कोशिश की होती तो कभी अनर्गल प्रलाप नहीं करते बिना वेद पढ़े आपके ये हालत हैं
    कभी उस और भी नजर घुमाकर देखते तो शायद आपको मालूम चलता की वास्तविकता क्या है
    यदि ठीक ढंग से वर्णाश्रम व्यवस्था को भारत में अपना लिया जाये तो सभी समस्याओं का निर्मूलन हो जय
    कृपया उत्तमता से व्यासत्व का परिचय दीजिय व अपनों को गली देने से बज आइये कभी आर्यसमाज का साहित्य पढ़ें

    उत्तर देंहटाएं
  2. bayas ji nam se lagta hai aap brahaman hai par aap brahmano ke hi kul ko kalnkit kar gaye thoda sa pad pratitha hetu apane pitaro ko swarg se narak me khichne ka jo nirih kary aap karane ja rahe yah aap ko patan ki our le ja raha hai aap branasram bayvsth ke khilap nahi apane pitaro ke khilap ja rahe hai jinhone yah barnbayvstha banai thi ...mai ek kshtriy ho kar bhi aapko salah de raha ho isase hi aap samajh sakte hai ki aaj aap kaha pahuch gaye hai ......jai satay sanatan dharam ...

    उत्तर देंहटाएं

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