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आमंत्रण:सांस्कृतिक भड़ैती व फूहड़पन के विरुद्ध 'लोकरंग'

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शुक्रवार, अप्रैल 22, 2011 | शुक्रवार, अप्रैल 22, 2011

अपसंस्कृति के विरुद्ध तथा लोक संस्कृति के जन सांस्कृतिक मूल्यों के संवर्द्धन के लिए पिछले 2008 से हिन्दी कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा के नेतृत्व में लोकरंग सांस्कृतिक समिति द्वारा सांस्कृतिक अभियान ‘लोक-रंग’ का आयोजन पूर्वी उत्तर  प्रदेश के कुशीनगर के जोगिया जनूबा पट्टी, फाजिलनगर में किया जा रहा है। सांस्कृतिक भड़ैती व फूहड़पन के प्रभाव वाले इस क्षेत्र में लोक-रंग के इस अभियान ने नई सांस्कृतिक बयार बहाई है, खासतौर से नौजवानों में नई संस्कृतिक चेतना पैदा की है और देश के संस्कृति प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित किया है। यही कारण है कि देश भर से संस्कृतिकर्मी, लेखक व कलाकार यहाँ जुटते हैं और इस लोक सांस्कृतिक अभियान में नया रंग भरते हैं।


इसी क्रम में इस साल 26 व 27 अप्रैल को दो दिवसीय लोक-रंग का आयोजन हो रहा है जिसमें विविध लोककलाओं, लोकगीतों, नाटकों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का प्रदर्शन होगा। प्रमुख आलोचक व जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ मैनेजर पाण्डेय इस चौथे ‘लोकरंग’ का उदघाटन करेंगे तथा उन्हीं के द्वारा इस मौके पर प्रकाशित ‘लोकरंग -2’ पुस्तक तथा लोकरंग-2011 स्मारिका का लोकार्पण भी किया जायेगा।


आज प्रेस वार्ता में इस बार प्रस्तुत किये जाने वाले कार्यक्रमों की जानकारी देते हुए लोकरंग सांस्कृतिक समिति के सुभाष चन्द्र कुशवाहा, जन संस्कृति मंच, लखनऊ के संयोजक कौशल किशोर, नाटककार राजेश कुमार, कवि भगवान स्वरूप कटियार, पत्रकार के के वत्स, रवीन्द्र कुमार सिन्हा ने कहा कि हमारी लोक संस्कृति की परम्परा काफी समृद्ध रही है। लोक संस्कृति और लोक कलाओं में जनता के दुख-दर्द, संघर्ष व सपने, प्रेम व करुणा, वीरता और त्याग, भाईचारा व समता, स्वाधीनता और सामूहिकता आदि की अभिव्यक्ति होती रही है। अपने इन्हीं मानवीय मूल्यों की वजह से आज भी लोक संस्कृति और लोक कला हमारे लिए प्रेरक व मूल्यवान हैं। लेकिन उपभोक्तावाद और बाजारवाद के बढते प्रभाव ने जहाँ लोक संस्कृति को बाजार की वस्तु बना दिया है, वहीं इसे भड़ैती व फूहड़पन का पर्याय बनाया जा रहा है। लोकरंग का आयोजन इसी के विरुद्ध तथा जनपक्षधर संस्कृति के संवर्द्धन के उद्देश्य से किया जा रहा है। इस बार का ‘लोक-रंग’ पूर्वी उत्तर प्रदेश के विद्रोही स्वर रामाधार त्रिपाठी ‘जीवन’ (1903-1977) की याद को समर्पित है।


प्रसिद्ध रंग निर्देशक संजय उपाध्याय द्वारा निर्देशित निर्माण कला मंच, पटना की नाट्य प्रस्तुति - भिखारी ठाकुर द्वारा लिखित ‘बिदेसिया’ तथा श्रीकांत द्वारा लिखित ‘हरसिंगार’ का मंचन होगा। पश्चिम बंगाल की संस्था गण सांस्कृतिक परिषद, कोलकता द्वारा बंगाल की लोककला ‘बाउल’ गान की प्रस्तुति, इस विघा की अंतर्राष्ट्रीय हस्ती प्रो0 शक्तिनाथ झा के निर्देशन में होगी। बाउल बंगाल की सूफी धारा है जो धर्मरहित आध्यात्मिकता लिए है लेकिन यह ब्राहमणवाद विरोधी तथा भौतिकवादी है। बाउल गायन बाहर से आध्यात्मिक प्रतीत होता है लेकिन अपनी अन्तर्वस्तु में यह सामाजिक अन्याय के खिलाफ है।


लोकरंग के इस आयोजन में उत्तर प्रदेश की विविध लोककला रूपों तथा लोकगायन का प्रदर्शन होगा। बुन्देलखण्ड के कछवाहा समाज द्वारा अवधूती शब्दों का गायन, अवधी लोक समूह, फैजाबाद द्वारा फरुवाही लोकनृत्य, आल्हा गायन  के साथ ही क्षेत्रीय कलाकारों द्वारा सोहर, कजरी, निर्गुन और भोजपुरी लोकगीतों आदि की प्रस्तुतियाँ होंगी। इस अवसर पर पटना की हिरावल द्वारा जनगीत पेश किये जायेंगे। 


जहाँ 26 व 27 की रात में सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे, वहीं 27 अप्रैल को दिन में ‘लोकगीतों में मिथ की प्रासंगिकता’ विषय पर वैचारिक गोष्ठी होगी। इसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पाण्डेय करेंगे तथा आलोचक शंभु गुप्त, डॉ रमाकांत श्रीवास्तव, डॉ गोरेलाल चंदेल, डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह आदि के साथ ही दिनेश कुशवाहा, हृषिकेश सुलभ, बजरंग बिहारी तिवारी, मदन मोहन, संजीव, हरिनारायण, शिवमूर्ति, देवेन्द्र, प्रणय कृष्ण, नवीन जोशी, राजेन्द्र राव, भगवान स्वरूप कटियार, डॉ तैयब हुसैन, मनोज सिंह, प्रियदर्शन मालवीय आदि देश के जाने माने लेखक व कलाकार इक्ट्ठा होंगे तथा विषय पर अपने विचार प्रकट करेंगे।


कौशल किशोर
संस्कृतिकर्मी
लखनऊ 


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