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'पगहा जोरी जोरी रे घाटो' का लोकार्पण

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, अप्रैल 27, 2011 | बुधवार, अप्रैल 27, 2011

 25 अप्रेल 2011
लालपुर, राँची (झारखंड) के एन. कंपाउंड के विकास मैत्री सभागार में आयोजित लोकार्पण समारोह में हिंदी के वरिष्ठ आलोचक प्रो. वीरभारत तलवार (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली) ने सामाजिक कार्यकर्ता और साहित्यकार रोज केरकेट्टा के आदिवासी कहानी संग्रह 'पगहा जोरी जोरी रे घाटो' का लोकार्पण किया।

प्रो. वीरभारत तलवार ने रोज केरकेट्टा को हिंदी कथा-जगत का महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर बताते हुए कहा कि आदिवासी जीवन पर महाश्वेता देवी और पुन्नी सिंह ने जरूर अच्छा लिखा, लेकिन हरिराम मीणा और रोज केरकेट्टा की शिद्दत ही अलग है। रोज केरकेट्टा की कहानियों में आदिवासी जीवन समग्रता में सामने आता है क्योंकि उन्होंने जैसा जीया वैसा ही लिखा है। प्रो. वीरभारत तलवार ने समकालीन आदिवासी लेखन की चार प्रमुख प्रवृत्तियों को चिह्नित करते हुए बताया कि पहली प्रवृत्ति उन लेखकों की है जिन्होंने ऊंचे ओहदे पर रहते हुए आदिवासियों पर लिखा। दूसरी प्रवृत्ति उन लेखकों की है जिन्होंने आदिवासी जीवन की सतही जानकारी के आधार लिखा। तीसरी प्रवृत्ति उन लेखकों की है, जिन्होंने आदिवासी होने के बावजूद उनके जीवन पर पूरी संवेदना के साथ लिखा। चौथी प्रवृत्ति उन लेखकों की है जो खुद आदिवासी लेखक है।

लोकार्पण समारोह के विशिष्ट अतिथि 'संवेद' 'सबलोग' संपादक किशन कालजयी ने समकालीन हिंदी लेखन में आदिवासी जीवन की गैर मौजूदगी पर कुछ जरूरी सवालात खड़े किए और इस बात पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम अपने ही लोगों के एक भरे-पूरे जीवन-संसार के बारे में कुछ नहीं जानते। उन्होंने कहा कि रोज़ केरकेटा की कहानियाँ प्रतिरोध की कहानियाँ है और उनका यह कहानी संग्रह ('पगहा जोरी जोरी रे घाटो') हिन्दी के एक नये इलाके का द्वार खोलता है।

लोकार्पण समारोह का संचालन सुनील मिंज ने किया। इस अवसर पर रविभूषण ने कहा कि 'पगहा जोरी जोरी रे घाटो' कहानियाँ आदिवासी जीवन की कहानियाँ है और यह कहानियाँ पाठकों के मन में जिज्ञासा उत्पन्न करती है। रोज केरकेट्टा ने हिंदी में 'खड़िया' शब्द का इस्तेमाल कर एक नया प्रयोग तो किया ही है, इसके अतिरिक्त उन्होंने इसमें हमारे खत्म होते ठेठ खेलों जैसे छुआ-छुई, कबड्डी, बाग बंदी आदि का भी उल्लेख किया गया है। इस अवसर पर डॉ. मायाप्रसाद ने कहा कि रोज केरकेट्टा की कहानियाँ जीवन की सत्यता पर लिखी गई है। कवि-कथाकार रणेंद्र ने उनकी कहानियों में मौजूद हॉकी की बारीकियों और रंगों के प्रयोग का उल्लेख किया। वाल्टर भेंगरा ने रोज केरकेट्टा की आदिवासी कहानियों के विविध पक्षों से रूबरू कराते हुए बताया कि उनका साहित्य आदिवासी जीवन की वास्तविक अनुभूतियों से निकला साहित्य है।

पुस्तक - 'पगहा जोरी जोरी रे घाटो' (आदिवासी कहानी संग्रह),लेखक - रोज केरकेट्टा,पृष्ठ - 144,
मूल्य - 150 रूपए,प्रकाशक - देशज प्रकाशन, उर्मिला एंक्लेव, पीस रोड़, लालपुरा, राँची (झारखंड)

स्त्रोत:- 
पुखराज जांगिड ,
शोधार्थी और युवा लेखक 


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