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पुस्तक समीक्षा :-'भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनूठे क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त'–पुखराज जाँगिड़

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, अप्रैल 27, 2011 | बुधवार, अप्रैल 27, 2011

भगत सिंह के सहयोगी : बटुकेश्वर दत्तभारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनूठे क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त के जन्मशताब्दी वर्ष (2010) पर उनके जीवन-संघर्ष पर लिखी न्यायाधीश अनिल वर्मा (मध्य प्रदेश) की परकाया-प्रवेश करती 18 अध्यायों चार परिशिष्टों में विभक्त दुर्लभ दस्तावेज है। लेखक अनिल वर्मा मूलतः क्रांतिकारी राजगुरू पर लिखीअजेय क्रांतिकारी राजगुरू’ (2008) सातार तट और आजाद’ (2010) पुस्तकों के लिए जाने जाते है। 18 नवंबर 1910 को बंगाल के बर्धमान जिले में जन्मे बटुकेश्वर दत्त पर लिखी किसी भी भाषा की यह संभवतः पहली पुस्तक है। इसमें ऐतिहासिकअसेंबली बमकांड में लाहौर हाईकोर्ट का फैसलाबटुकेश्वर दत्त और भगतसिंह की मित्रता माँ विद्यावती के संस्मरण है।

आजाद भारत में क्रांतिकारियों के अमूल्य योगदान के विस्मरण और उनकी स्मृतियों विरासत को संजो पाने की विडंबनात्मक प्रस्तुति है जोकिवक्त गुलशन पर पड़ा तो लहू हमने दिया, बहार आई तो कहते है तेरा काम नहींको चरितार्थ करती है। इसमें बटुकेश्वरदत्त के प्रारंभिक जीवन, भगतसिंह से संपर्क, असेंबली-बम-विस्फोट, न्याय के नाटक, लाहौर षडयंत्र केस, बंदी जीवन, भूख हड़ताल, कालापानी की सजा, बहिन प्रोमिला के पत्रों, उनकी एकमात्र संतान डॉ. भारती बागची के वक्तव्यों और आजादी के बाद की गुमनामी जैसी ऐतिहासिक घटनाओं के तथ्यपरक विश्लेषणों के माध्यम से उनके व्यक्तित्त्व को बुना गया है जो भारत की सांझा-संस्कृति (जन्म बंगाल, कर्म उत्तरप्रदेश निवास बिहार) का जीवंत उदाहरण था।

भारतीय इतिहास में आठ अप्रेल 1929 केदिल्ली सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में बम विस्फोटकी पूर्वपीठिका के रूप में 09 सितंबर 1928 का दिन ऐतिहासिक परिवर्तन का युगांतरकारी दिन माना जाता है जब भगतसिंह के संचालन में दिल्ली के फिरोजशाह तुगलक के किले के खंडहरों में हुई क्राँतिकारियों की गुप्त बैठक में देशभर के क्राँतिकारी दलों का सफलतापूर्वक एकीकरण कर चंद्रशेखर आजाद को उसकाकमांडर-इन-चीफबनाया गया। उनका मूल उद्देश्य देश में समाजवादी राज्य की स्थापना करना और स्वतंत्रता आंदोलन को जनता का आंदोलन बनाना था। बटुकेश्वरदत्त उन दिनों मजदूर आंदोलनों के दौरान बंगाल के श्रमिक आंदोलनों और संगठनों (‘बंगाल वर्कसपीजेंट्स पार्टी’) के सक्रिय सदस्य थे। उस समय कानपुर कलकत्ता क्राँतिकारी गतिविधियों के महत्त्वपूर्ण केंद्र थे और बटुकेश्वर दत्त दोनों से जुड़े रहे। वे दृढ विचारक, देशभक्त और संवेदनशील भारतीय थे। 8 अप्रेल 1929 ‘दिल्ली सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबलीमें अपने साथी भगत सिंह के साथ किए ऐतिहासिक बम-विस्फोट से उन्होंने ब्रिटिश हुकुमत को सीधी चुनौती देकर भारत में अंग्रेजीराज के पैर उखड़ने शुरू हुए। दोनों क्रांतिकारियों का नारा-‘बहरों को सुनाने के लिए ऊँची आवाज की जरूरत होती हैसंपूर्ण भारत की रगों में खून बनकर दौड़ने लगा। उनका मूल उदेश्य राष्ट्र का ध्यान अपनी ओर खींचना था इसीलिए बड़े ही सुनियोजित तरिके से बम ऐसी जगह फेंका गया ताकि किसी को जोट लगे। परंतु भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त पर चलाया गया मुकदमा अंग्रेजी न्यायव्यवस्था की पोल खोलकर रख देता है। अदालती कार्यवाहीयों का जीवंत चित्रण घटनाओं का तार्किक विश्लेषण तत्कालीन भारतीय न्यायप्रणाली पर एक गंभीर काम है क्योंकि क्रांतिकारियों का जेल-जीवन खुद अपने ही वायदों से मुकरती अंग्रेजी सरकार की न्यायप्रियता के दोगलेपन का सटीक उदाहरण रहा है। जबकि स्वयं जस्टिस फोर्ड ने अपने निर्णय में स्वीकार किया है किये लोग (भगतसिंह बटुकेश्वर दत्त) दिल की गहराईयों और पूर्ण आवेग से वर्तमान समाज के ढाँचे को बदलने की इच्छा से प्रेरित है।‘(पृष्ठ-72)

क्रांतिकारियों और सत्याग्रहियों के आपसी रिश्ते की बात करें तो बहुत कम लोग यह जानते है कि 19 अप्रेल 1929 में खराब खाना देने के विरोध में बटुकेश्वर दत्त द्वारा शुरू की गईभूख-हड़तालकिसी क्राँतिकारी द्वारा कियासत्याग्रही अस्त्र का पहला प्रयोगथा। बाद में इसने एक परंपरा का रूप ले लिया और क्राँतिकारी यतींद्रनाथ सान्याल 63 दिनों की लंबी भूख-हड़तालपर्यंत मातृभमि के लिए अपनी आहुति देकर दो परस्पर विरोधी धाराओं को एक कर गए। दरअसलजेल ही वह कारखाना है जो क्राँतिकारियों के मुकदमों को खराब करने के लिए मुखबिर तैयार करता है।’(पृष्ठ-73) ऐसा करने पर क्रांतिकारियों कीसमस्त चल एवं अचल संपत्ति कुर्क एवं नीलाम करके उन्हें निर्धनता के भीषण गर्त में धकेल दिया जाता।ब्रिटिश सरकार क्रांति की भावना समूल-समाप्ति के लिए कालापानी की सजा मुकर्रर करती थी। आजादी के दस साल बाद (1957 में) जब दत्तबाबू ऐतिहासिकदिल्ली जेलकी वह कोठरी देखने गए (जहाँ असेंबली में बम-विस्फोट के बाद उन्हें भगत सिंह के साथ रखा गया) तो वहाँ जेल के स्थान पर एक अस्पताल बनाया जा रहा था। क्रांतिकारियों से संबद्ध दिल्ली जेल के ऐतिहासिक फाँसीगृह उन कुछेक बंदीगृहों (कोठरियों) को स्मारकों तक के लिए भी बख्सा गया। क्रांतिकारियों की शौर्यगाथाएं हमारी ऐतिहासिक विरासत है और अगर हम उसे भी संजो पाए तो आनेवाली पीढी हमें कभी माफ कर सकेगी। लाहौर की सैंट्रल जेल से लिखे अपने पत्र में भगतसिंह ने लिखा था किमैं खुशी के साथ फांसी के तख्ते पर चढकर दुनिया को यह दिखा दूंगा कि क्रांतिकारी अपने आद्रशों के लिए कितनी वीरता से बलिदान कर सकते हैं। मुझे फांसी का दंड मिला है, किंतु तुम्हें आजीवन कारावास का दंड मिला है। तुम जीवित रहोगे और तुम्हें जीवित रहकर दुनिया को यह दिखाना है कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के मर ही नहीं सकते, बल्कि जीवित रहकर हर मुश्किल का मुकाबला भी कर सकते है।’(पृष्ठ-100)
दोनों की मित्रता का आलम यह था किजेल में रहकर भगतसिंह ने जितने भी पत्र लिखे हैं, उनमें से आधे से अधिक में दत्त भी उनके साथ नजर आते है।दत्त के बारे में फाँसी के चंद दिन पहले भगतसिंह ने अपनी माँ विद्यावती से कहा था किमाँ में तो चला जाऊँगा, पर एक अंश दत्त के रूप में छोड़े जा रहा हूँ।उसी बटुकेश्वर दत्त ने अपनी मृत्यु (20 जुलाई 1965) से कुछ ही दिन पहले तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन और प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री से कहा था किआप लोग तो क्रांतिकारियों को केवल पिस्तौल हाथ में लिए आदमी के रूप में ही सोचते हैं। यह नहीं सोचते कि वह किस समाज को लाने के लिए खड़ा है।’ (पृ.-153) दत्तबाबू के ये शब्द भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की व्यापकता और उसकी भविष्य-दृष्टि (विजन) को रेखांकित करते है। उनका जीवन-संघर्ष हमें बतलाता है कि विदेशी दासता से हम भले ही मुक्त हो गए हो लेकिन आमआदमी आज भी निस्सहाय है। दस साल की कालापानी की सजा जिनके हौसले पस्त कर सकी, आजादी के बाद आमआदमी की निस्सहायता उन्हें भीतर तक तोड़ गई। दरअसल उनका जीवन इस बात का गवाह है कि भारतीय क्रांतिकारियों की प्रतिबद्धता किसके साथ थी, आजादी के बाद का तो उनका पूरा जीवन आमआदमी की निस्सहायता का आख्यान है। उसके लिए सामाजिक न्याय की दूसरी लड़ाई की आरजू मन में लिए हमसे विदा हो गए और हालात आज भी ज्यों-के-त्यों है और वह सपने भी जिनके लिए वे आजीवन संघर्षरत रहे। जीवन के 15-16 साल जेल की कोठरियों में बिताने के बावजूद उन्होंने कभी भी अपनी ख्याति को भुनाने की कोशिश नहीं की बल्कि वे उससे निर्लिप्त रहे और उसे यूँ ही मर जाने दिया। 

समीक्ष्य-पुस्तक :-‘भगत सिंह के सहयोगी : बटुकेश्वर दत्त’, लेखक - अनिल शर्मापहला संस्करण-2010, नेशनल बुक ट्रस्टइंडियानेहरू भवन, 5 इंडस्टीटयूशनल एरियाफेज-2, वसंत कुंजनई दिल्ली-70, मूल्य-85 रूपएपृष्ठ-160

पुखराज जाँगिड़ 
शोधार्थी, भारतीय भाषा केंद्र
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,
 नई दिल्ली-67.  ईमेल-pukhraj.jnu@gmail.com
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1 टिप्पणी:

  1. मेरी पुस्तक पर समालोचना के लिए धन्यवाद् -अनिल वर्मा

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