भारतीय साहित्य में चिन्नप भारती का योगदान - अपनी माटी

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बुधवार, अप्रैल 27, 2011

भारतीय साहित्य में चिन्नप भारती का योगदान

'भारतीय साहित्य में चिन्नप भारती का योगदान'



यह तस्वीर उद्घघाटन सत्र में चिन्नप भारती जी पर केंद्रित 'संवेद' के विशिष्ट अक के लोकार्पण की है। तस्वीर में है - एस. के. करूण्णप्पन, समाजवादी चिंतक मस्तराम कपूर, साहित्यकार चित्रा मुदगल, साहित्यकार चिन्नप भारती, 'संवेद'-संपादक किशन कालजयी, 'दिनमणि'-संपादक के. वैद्यनाथन, वरिष्ठ अनुवादक एच. बालसुब्रह्मण्यम व विवेक गौतम।



हिंदी भवन, नई दिल्ली में 16 अप्रेल 2011 को 'इंडियन सोसायटी ऑफ ऑथर्स' व 'उदभव' के संयुक्त तत्वाधान में 'भारतीय साहित्य में चिन्नप भारती का योगदान' विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्घघाटन वरिष्ठ साहित्यकार चित्रा मुदगल ने व उदघाटन सत्र की अध्यक्षता किशन कालजयी (संपादक-'संवेद') ने की। चित्रा मुदगल ने समकालीन दक्षिण भारतीय भाषाओं के जनसरोकारी लेखन से परिचय कराते हुए उनमें चिन्नप भारती के योगदान को संस्मणात्मक रूप में रेखांकित किया। उन्होंने चिन्नप भारती को अखिल भारतीय लेखक बताया क्योंकि उनका साहित्य हमें हमारे समय की तमाम समस्याओं से रूबरू करवाता है। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि - एस. के. करूण्णप्पन व के. वैद्यनाथन (संपादक-दिनमणि) थे। 

इस अवसर पर खदान (कोयले की खान) मजदूरों के दारूण जीवन पर लिखे चिन्नप भारती के तमिल उपन्यास 'सुरंगम' का श्रीमती राधा जनार्दन द्वारा किए खुबसूरत अनुवाद 'प्यास' का लोकार्पण किया गया। मेहनतकशों की आवाजों को जोगदार ढंग से रखता 'सुरंगम' चिन्नप भारती का तमिल में लिखा पहला उपन्यास है। इसकी रचना कॉमरेड विकास चौधरी के अनुरोध पर पश्चिम बंगाल के खान-मजदूरों के जीवन-संघर्ष को आधार बनाकर की गई है। संभवतः खदान-मजदूरों के जीवन को केंद्र में रखकर लिखा गया यह पहला उपन्यास है लेकिन 'प्यास' (सुरंगम) में तमिलनाडू के गाँव तथा उनके खेतिहर मजदूर भी अपनी समग्रता में चित्रित हुए है। इसका पहला अनुवाद तेलगु में हुआ था। वहाँ के लोग लालटेन की रोशनी में इसका वाचन करते और जुलुस निकालकर शोषणविरेधी चेतना का संचार करते। उनके द्वारा निकाले जुलुसों में एक नारा बड़ा ही लोकप्रिय रहा है -
'नहीं सहेंगे चाबुक की मार।
नहीं पीएंगे गोबर का पानी।
काँसे की थाली में हम भी खाएंगे।
धुली धोती हम भी पहेंगे।'

डरे-सहमें, भय से चुपचाप अपने आप में सिमटे रहने वाले मजदूर अंत में जमींदार-मालिक को कहते है कि-'गालियों का जवाब गालियों से देंगे।... पीटोगे तो पलटकर पीटेंगे।... अरी कहोगे तो अरी बुलाएंगे।' इसका परिणाम यह होता है अपने गुलामों को मार लगाने और 'जाते हो कि नहीं, रंडी की औलादों' कहकर पुकारनेृ वाला जमींदार यह कहकर निकल लेता है कि-'अभी काम है। लौटकर इनसे निपटूंगा।' जिसे खुद लेखक ने इन शब्दों में अकित किया है-'उन गुलामों की आँखों में हिंसा है। भूखे जानवरों की तरह वह उन्हें गेख रहे है।चकित होकर वहाँ से हट गए। साध कर इन पर निशाना लगाना होगा। बाघ बड़ी सूझ-बूझ से ही छलाँग लगाता है।'(पृष्ठ-238) एक उपन्यास द्वारा संभव हुआ यह जन प्रतिरोध अपमान, अवज्ञा और तिरस्कार की लंबी और यातनादायी पीड़ाओं खिलाफ खड़ा होता है और अंततः समानता पर आधारित किसी भी तरह के भेदभाव से मुक्त समाज के निर्माण की सुखद संभावनओं को रेखांकित करता है। 


इसमें किशन कालजयी द्वारा संपादित हिंदी की प्रतिष्ठित विचार पत्रिका 'संवेद' ने 'चिन्नप भारती : वर्ग चेतना के जुझारू साहिकत्यकार' शीर्षक से एक अंक का भी लोकार्पण हुआ। तमिल के अनूठे साहित्यकार चिन्नप भारती पर केंद्रित 'संवेद' के इस अंक के प्रस्तुतिकार एच. बालसुब्रह्मण्यम है और इसमें किशन कालजयी के संपादकीय के अलावा आठ महत्त्वपूर्ण लेख संकलित है। चिन्नप भारती जी की सहधर्मिणी चेल्लमाल जी द्वारा लिखित 'ऐसे हैं मेरे पति!' इस अंक की विशिष्ट उपलब्धि है। इनके अतिरिक्त इसमें चित्रा मुदगल, ई.एम.एस. नंबूदिरूपाद, विवेक गौतम, पद्मावती विवेकानंदन व मणि भारती के लेखों के साथ-साथ चिन्नप भारती के व्यक्तित्त्व व कृतित्त्व पर प्रकाश डालते तेरह महत्त्वपूर्ण लेखकों की संक्षिप्त टिप्पणियां भी शामिल है। 


'भारतीय साहित्य में चिन्नप भारती का योगदान' संगोष्ठी की खाशियत चिन्नप भारती जी का व्याख्यान रहा। वे अपनी मातृभाषा 'तमिल' में बोले,एच.बालासुब्रह्मण्यम जी उसका अनुवाद कर श्रोताओं को मंतव्य बताते रहे। उनका वक्तव्य मूलतः साहित्यकार के दायित्व और उनकी अपनी रचना-प्रक्रिया पर केंद्रित था। उनके लेखन का कद बहुत बड़ा है। उनका साहित्य-सृजन हाशिए की तमाम अस्मिताओं के पक्ष में लिखा जनप्रतिरोधी साहित्य है। मजदूर-एकता उनका पसंदीदा विषय है जिस पर वे घंटो बतिया सकते है क्योंकि वो उनके जीवन का, उनके अनुभव संसार का स्वाभाविक हिस्सा है। किशन कालजयी जी, मस्तराम कपूर जी व बजरंग बिहारी तिवारी जी के उद्धबोधन इसके विशिष्ट आकर्षण रहे। संगोष्ठी का संचालन व संयोजन डॉ. विवेक गौतम व डॉ. एच. बालसुब्रह्मण्यम जी ने किया।

स्त्रोत:-पुखराज जांगिड,शोधार्थी और युवा लेखक 

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