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'साहित्यकार की स्थिति महाभारत के विदूर की तरह हो गयी है'-आलोचक शीन काफ़ निज़ाम

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, अप्रैल 04, 2011 | सोमवार, अप्रैल 04, 2011



16 मार्च 2011 पहले दिन उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता करते हुए अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिनाम शाईर एवं आलोचक शीन काफ़ निज़ाम ने कहा कि सियासी लोगों ने भाषा के माध्यम से साहित्य जगत को अलग करने पर जोर दिया है, लेकिन साहित्य अपने आप में इतना विस्तृत है कि सियासी लोग उसे बांटने में कामयाब नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि आज साहित्यकार की स्थिति महाभारत के विधूर की तरह अपनी बातें बे रोक-टोक कहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आज बारह भाषाएं बारह राशियों की तरह जोधपुर मे आकाश गंगा की तरह इकठ्ठी हुयी है।


इससे पूर्व आरंभिक व्याख्यान देते हुवे पद्मश्री चंदप्रकाश देवल ने आज के वैश्वीकरण और बाजारवाद के युग में साहित्यकार की भूमिका को बहुत ही महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि आज के युग में वहीं साहित्यकार जीवित रह सकता है, जिसने भाषा के सागर में  गोते लगा कर शब्द रूपी मोतियों से अपनी जड़ो को मजबूत किया है। केन्द्रीय साहित्य अकादमी के उपसचिव श्री के.एस.राव ने सभी साहित्यकारों का स्वागत और अभिनंदन किया।

इसी सत्र में कविता पाठ का भी आयोजन रखा गया। सर्वप्रथम असमिया लेखिका मणिकंुतज्ञा भट्टाचार्य ने ‘जिसे तुम चाहते हो उसके संग ब्याह मत रचाना......’ हिन्दी कवि हेंमत शेष ने ‘नदी जिसे कोई नहीं जानता ................’ मणिपुरी कवि केशव सिंह  ‘मौत ही मंजिल तेरी  ..............’ नेपाली कवि नगेन्द्र गोरवी ने ‘ईश्वर मंदिर में सो रहा है .......’ उर्दू शायर अजीज परिहार ने ‘कोई और था जिसे चाहा तुम्हारे बहाने......’ जैसी शायरी और कविताएं पढी। वनीता ने पंजाबी में एक कविता ‘सहजै-सहजै’ और हिन्दी में ‘क्या पता शायद’ कविता का पाठ किया। राजस्थानी के कवि डॉ. आईदान सिंह भाटी ने ‘बाजार में सांरगी’ कविता का राजस्थानी में तथा ‘शायद आप भी कभी ऐसा ही सोचते हो’ कविता का हिन्दी में पाठ किया।

इसके बाद सी.पी.देवल ने ‘अेक कवि की आयस’ कविता का राजस्थानी में पाठ किया। इसके पश्चात ‘तितली’ शीर्षक की कविता का हिन्दी अनुवाद पढ़ा। इसके बाद श्री शीनक़ाफ निज़ाम ने कई शेर और एक गज़ल ‘शाम से कौन मेरे ध्यान में है रोशनी हर तरफ मकान में है’, पेश की।  दूसरे सत्र में श्री कल्याण सिंह शेखावत की अध्यक्षता में कहानी पाठ हुआ। इसमें असमिया कहानीकार ने ‘राह तकते हुवे हमारे बच्चे’ उपन्यास अंष का वाचन किया। बलराम ने ‘शुभ दिन’ व मीठेश निर्मोही ने ‘बंधन’ कहानी का वाचन किया।



तीसरे सत्र में विश्वनाथ प्रसाद तिवाड़ी की अध्यक्षता में कविता-पाठ का आयोजन हुआ। जिसमें सर्वप्रथम राजस्थानी के कवि कथाकार अशोक जोशी ‘क्रांत’ ने ‘सुपना’, थारौ परस, कुछ दोहे और एक गज़ल का राजस्थानी में पाठ किया। तत्पश्चात् एक हिन्दी कविता ‘तुम एक किताब’ का हिन्दी में पाठ किया। डॉ. कौशल नाथ उपाध्याय ने ‘बोधकथा’, ‘आखिर क्यों?’, ‘युद्ध जरूरी है’, आदि कविताओं का पाठ किया। इसके बाद इश्राकुल इस्लाम माहिर ने एक नज़्म और तीन गजले उर्दू में पढ़ी। ‘वो तो अक्सर सफर में रहता है, उसकी शोहरत नगर में रहती है’ इस शेर को बहुत दाद मिली। शफी शौक अर आबैर्रहमान ने भी काव्य पाठ किया। अन्त में अध्यक्ष श्री विश्वनाथ प्रसाद तिवाड़ी ने ‘आरा मषीन’, ‘मनुष्यता का दुःख’ और ‘सड़क पर एक लम्बा आदमी’ कविताओं का पाठ किया।

शाम को जयनारायण व्यास टॉउन हॉल में असम के लोक नृत्य और संगीत की सुरीली तान के साथ मणिपूरी मार्शल आर्ट का प्रदर्शन हुआ। बांसूरी की मधुर धुन व मृदंग की थाप पर मणिपुरी नृत्यांगनाओं की नृत्य प्रस्तुति के साथ ही लोक विविध स्वर का आयोजन हुआ। असम के बिदू गीत एवं नृत्य के साथ ही राजस्थान के लंगा-मागणिमारों ने भी लोक गीतों, ‘केसरिया बालम आवों नीं पधारों म्हारै देस’ और ‘दमादम मस्त कलंडर...... गीतों के साथ लोक वाद्ययंत्र ‘कमायचा’ और ‘मोरचंग’ की बेहतरीन पेशकश दी। 

दूसरे दिन हिन्दी के ख्यातिनाम कवि श्री नन्दकिशोर आचार्य की अध्यक्षता में ‘मेरी दुनिया’, मेरा लेखन’ सत्र का आरम्भ हुआ। जिसमें बोड़ों भाषा का आलेख फूकन चंद बसुमतारी ने, हिन्दी में नंद चतुर्वेदी ने, मणिपुरी में अंखद ओडवी मेय चौबी ने, एवं राजस्थानी में आलेख मालचंद तिवाड़ी ने पढ़ा। मालंचद तिवाडी ने शरतचन्द्र के उपन्यास ‘चरित्रहीन’ के पात्रों का उल्लेख करते हुए अपने लेखन कार्य की चर्चा की। नंद चर्तुवेदी ने कहा कि कवि होने के लिए मेहनत भी करनी होती है तो लापरवाह भी होना पड़ता है। नंद किशोर आचार्य ने अध्यक्षता करते हुवे कहा कि साहित्यकार इसलिए लिखता चला जाता है क्योंकि उसे जानना है कि लिखना किसे कहते है। दूसरे सत्र की अध्यक्षता असमीय भाषा प्रदीप आचार्य ने की जिसका विषय ‘साहित्यक प्रवृत्तियां’ था। इसमें जयसिंह ने मणिपुरी में, सतीष कुमार वर्मा ने पंजाबी में तथा अर्नुनदेव चारण ने राजस्थानी में आलेख पढ़े। अर्जुनदेव चारण ने उतर आधुनितकता की विसंगतियों पर चर्चा करते हुए राजस्थानी साहित्यकारों की महती भूमिका पर प्रकाश डाला।

अंतिम सत्र में ‘शोर न जाने कैसा मौज में शामिल था.....’, ‘कतरा कतरा आवाजों का कातिल था....’, जापान में आए सुनामी पर ये पंक्तियां अपने कविता पाठ के दौरान डॉ. निसार राही ने सुनाई। डोगरी भाषा के युवा कवि यषरैना ने ‘तेरी सोच’ डोगरी में तथा हिन्दी में ‘नहीं भूलना कभी’ सुनाई। ज्योतिरेखा हजारिका ने असमिया भाषा में ‘स्टोरी ऑफ लव’ तथा हिन्दी में ‘चलते फिरते कोई मिल जाता है’ कविता सुनाई। राजेन्द्र भंडारी ने नेपाली में ‘डायर और जलियावाला’ विषय पर ‘घूमना है डायर’ शीर्षक से अनूठी कविता सुनाई। हिन्दी और राजस्थानी के कवि कथाकार आलोचक श्री नंद भारद्वाज की अध्यक्षता में हुवे इस काव्यपाठ से गढ़वाली के ललित केशवन, हिन्दी की अंजू मिश्रा व राजस्थानी की सुमन बिस्सा व उर्दू में गुरबिंदर सिंह कोहली अज्म ने भी कविताएं सुनाई।

अन्त में अध्यक्ष श्री नंद भारद्वाज ने ‘उत्तराधी आंधी’, ‘जो टूट गया है भीतर’, ‘अपनी पहचान’ और ‘आपस का रिश्ता’ शीर्षक से कविताओं का वाचन किया। अन्त में केन्द्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के उप सचिव, श्री के.एस.राव ने सभी साहित्यकारों व व्यवस्था के सहभोगियों का आभार प्रकट किया।



प्रस्तुति:-
अशोक जोशी ‘क्रांत’ 
(आप एक अच्छे राजस्थानी कवि हैं आपकी रचनाएं यहाँ क्लिक कर पढ़ी जा सकती हैं.-सम्पादक )

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