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समता आन्दोलन की ज़रूरत क्यों?:-कुछ तथ्यात्मक बातें

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, अप्रैल 10, 2011 | रविवार, अप्रैल 10, 2011

सरकारी नौकरियों में नियुक्तियों एवं पदौन्नतियों को लेकर अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति वर्ग को दिये जा रहे जातिगत आरक्षण  के  मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित विभिन्न निर्णयों को लागू करवाने के उद्धेश्य से आज भारत का अन्य पिछड़ा वर्ग एवं सामान्य वर्ग आन्दोलनरत है। माननीय उच्चत्तम न्यायालय ने अजा/जजा वर्ग को नियुक्तियों एवं पदौन्नतियों में आरक्षण को कुछ शर्तों के साथ मर्यादित किया है जिससे कि अजा/जजा वर्ग के अन्तर्गत अन्तिम पायदान पर बैठे वास्तविक ‘‘दलित‘‘ को आरक्षण का लाभ सुनिश्चित किया जा सके तथा वोटों की राजनीति के कारण इस वर्ग को दिये जा रहे अन्धाधुन्ध आरक्षण की प्रवृति पर रोक लगे। इसके लिए अजा/जजा वर्ग की मलाईदार परत(अजा/जजा के साधन सम्पन्न व्यक्ति व जाति) को आरक्षित कोटे से बाहर करने की कड़ी शर्त के साथ ही वास्तविक लाभान्वित को प्रत्येक मामले में मान्य सर्वेक्षण के पश्चात आंकड़ों के आधार पर सुपरिभाषित किये बीना इस वर्ग को  आरक्षण का लाभ दिया जाना 15/06/1995 से ही अवैध है। उच्चत्तम न्यायालय की नजर में जब तक ऐसा नहीं होगा इस देश में वास्तविक अर्थों में सामाजिक न्याय स्थापित नहीं होगा।

अजा/जजा वर्ग का साधन सम्पन्न तबका ही सामाजिक न्याय के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है एवं अपने वर्ग के निचले स्तर तक आरक्षण का लाभ नहीं पहूंचने  दे रहा है। और यह उम्मीद करता है कि उनके लिए अन्य पिछड़ा वर्ग एवं सामान्य वर्ग पिछले साठ वर्षों कि तरह ही अन्याय को सामाजिक न्याय के नाम पर  सहन करता रहेगा। जब ये खुद अपने वर्ग के लिए त्याग नहीं कर सकते तो कोई अन्य क्यों ऐसा करेगा? हद तो तब हो जाती है तब पदौन्नति में आरक्षण को अवैध ठहराने के बावजूद भी पिछले 15 वर्षों से(17/06/1995) आदेशों  की अवमानना हुई है एवं  25 से 30 वर्षों की वरिष्ठता लाँघ कर अजा/जजा वर्ग को पदौन्न्तियां देती रही है। पिछले 15 वर्षों मे जारी माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेशों को लागू करवाने के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग एवं सामान्य वर्ग का आमजन व कर्मचारी आज आन्दोलनरत है ताकि भावी पीढ़ी के भविष्य को चौपट होने से बचाया जा सके। क्योंकि अन्याय करने वालों से सहने वाला अधिक दोषी होता है।

न्यायिक निर्णयों के तथ्य इस प्रकार से हैः-

1. माननीय उच्चत्तम न्यायालय ने इन्द्रा साहनी बनाम भारत संघ, 1992 , अजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य 1999 ; आरके सबरवाल बनाम पंजाब राज्य 1995 ; एवं एस. विनोद कुमार बनाम भारत संघ 1996 ; प्रकरणों में क्रमश: पदौन्नति में आरक्षण, आरक्षित वर्ग(अजा/जजा) को पदौन्नति के बाद वरियता का लाभ, रिक्ति आधारित रोस्टर व बैकलॉग के नाम पर शत प्रतिशत पद आरक्षित करने व आरक्षित वर्ग(अजा/जजा) को पदौन्नति में योग्यता के मानदण्डों में छूट  देने को समानता के मौलिक अधिकारों एवं राष्ट्र की कार्य कुशलता  के विरूद्ध मानते हुए उन्हे संविधान के अनुच्छेद 14, 16 व 345 के विरूद्ध घोषित कर दिया है।

2. तत्कालीन गुजराल(जनता दल) सरकार ने पदौन्नति में आरक्षण को छोड़कर शेष सभी निर्णयों को कार्यालय आदेश  दिनांक 30/01/1997, 02/07/1997 एवं 22/07/1997 के अन्तर्गत लागु कर दिया।

3. माननीय उच्चत्तम न्यायालय ने अपने अनेक निर्णयों में बार बार यह कानून स्थापित किया है कि कोई भी विधायिका न्यायालय के निर्णयों के दर्शाए आधार को बदले बीना तथा समानता के मौलिक अधिकारों के विरूद्ध कोई भी कानून नहीं बना सकती है।

4. पदौन्नति में अजा/जजा वर्ग को आरक्षण देने के लिए दिनांक 17/06/1995 प्रभावी 77 वां संविधान संषोधन हुआ,जो गलत है.

5. आरक्षित वर्ग(अजा/जजा वर्ग) के कर्मचारियों को पदौन्नति के बाद वरियता का लाभ देने के लिये किए गए बदलाव से समानता के मौलिक अधिकार एवं राष्ट्रीय कार्य कुशलता प्रभावित होती है जो कि संविधान का  मूल आधार है और उसे  नष्ट नहीं किया जा सकता।

6. समता आन्दोलन ने उपरोक्त सभी संविधान संशोधनों की वैधता को उच्च्त्तम न्यायालय में चुनौति दी। उच्च्त्तम न्यायालय की संविधान पीठ ने अपने निर्णय दिनांक १९-१०-2006 ;२००६- ८-212 ने कई शर्तों के साथ उपरोक्त संविधान संशोधनों को वैध ठहराया।

7. उच्च्त्तम न्यायालय के उपरोक्त निर्णय में दर्शायी शर्तों के अनुसार पदौन्नति/नियुक्ति में अजा/जजा वर्ग को  आरक्षण देने से पूर्व प्रत्येक अभ्यर्थी के पिछड़ा होने, उसके सम्बन्धित सेवा में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व होने तथा राष्ट्र की कार्य कुशलता पर दुष्प्रभाव न होने के आंकड़ों सहित प्रमाण देने होंगे। जो कि एक संवैधानिक आवश्यकता है इनकी पूर्ती किये बीना सभी प्रकार के आरक्षण अवैध होंगे। इसके अतिरिक्त अजा/जजा के क्रिमीलेयर वर्ग(साधन सम्पन्न वर्ग) को सभी प्रकार की आरक्षण सुविधाओं से बाहर रखना होगा। उच्च्त्तम न्यायालय ने अपने उक्त निर्णय में यह भी बताया की इन्द्रा साहनी बनाम भारत संध में दिया गया निर्णय सभी पर बाध्यकारी होगा जिसमें यह व्यवस्था दी गयी है कि नोकरी लगने के बाद आरक्षित वर्ग का कर्मचारी अन्य सामान्य कर्मचारी के समान हो जाता है तथा उसके बाद जाति के आधार पर पदौन्नति में आरक्षण देना समानता के मौलिक अधिकारों एवं राष्ट्रीय कार्यकुशलता के विरूद्ध होगा।

 ऐसी परिस्थिति में किसी भी सरकार के लिए न तो इन शर्तों की पालना हो सकेगी और न ही पदौन्नति में आरक्षण देना सम्भव होगा। तदनुसार १७-०६-1995 (संविधान संशोधन की तिथि) के बाद आरक्षित वर्ग(अजा/जजा वर्ग) के कर्मचारियों को आरक्षण के आधार पर दी गयी पदौन्नतियां एवँ वरियता का लाभ अवैध हो जाने के कारण निरस्त किये जाने के योग्य हो गये हैं। 

8. माननीय उच्चत्तम न्यायालय के उपरोक्त निर्णय को लागू करवाने के लिए ही  पूरे देश  के अन्य पिछड़ा वर्ग एवं सामान्य वर्ग के सरकारी कर्मचारियों सहित राजस्थान के (पांच लाख राज्य कर्मचारी) समता आन्दोलन के बेनर तले संघर्षरत हैं।

स्त्रोत :-
समता आन्दोलन समिति (रजिस्टर्ड)
39, रामनगर- सी, झोटवाड़ा, जयपुर, 

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