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डॉ. सदाशिव श्रोत्रिय की नई किताब

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, अप्रैल 22, 2011 | शुक्रवार, अप्रैल 22, 2011

डॉ. सदाशिव श्रोत्रिय ने इस पुस्तक के आरम्भ में लिखा है......

                        अपने कहानीकार मित्र स्वयंप्रकाश की प्रेरणा से पिछले सत्तर के दशक में मैंने भी कुछ कहानियां लिखीं। फिर अस्सी का लगभग पूरा दशक मेरे शोध कार्य की भेंट चढ़ गया। नब्बे के दशक में जब मैं पुनः अपने सृजनात्मक लेखन की ओर मुड़ा तो मुझे लगा कि मेरे आसपास की दुनिया जिस तेज़ी से बदल रही है वह गल्प लेखन के बजाय पाठकों से मेरे सीधे संवाद की मांग करती है। इसीलिए तब मैंने निबंधों की ओर रुख किया। प्रस्तुत पुस्तक पिछली सदी के अंतिम दशक में लिखे गये कतिपय इन्हीं निबंधों का संग्रह है।

                        लोगों की आत्मकेन्द्रितता में निरंतर वृद्धि ने उस समय मेरा सर्वाधिक ध्यान आकर्षित किया। मैंने देखा कि देश, संस्था, परिवार, नगर, समाज, प्रकृति, पर्यावरण आदि किसी भी कीमत पर अपनी स्वयं की प्रगति ही अब अधिकाधिक लोगों का लक्ष्य बनती जा रही है। हमारे स्वातंत्र्य संग्राम की आदर्शवादिता अब अधिकांश लोगों के मन से गा़यब होने लगी थी। शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, धर्म आदि भी अब विपणन की वस्तुएं बनने लगी थीं और अधिकाधिक संस्थाएं उन उद्देश्यों से भटकने लगी थीं जिनके लिए उन्हें स्थापित किया गया था। राष्ट्रभाषा का जो स्वप्न कभी हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था वह धुंधला होते होते अब विलुप्ति के कगार तक आ पहुंचा था। अमूर्त की कल्पना का स्थान अब मूर्त व भौतिक उपलब्धियों की कामनाएं लेने लगी थीं। प्रेम का रूप अब आत्मिक व रूमानी न रह कर दैहिक होता जा रहा था। जिस फु़र्सत के समय का उपयोग लोग पहले आपसी आत्मीयता में वृद्धि या किसी उच्चतर आनंद की प्राप्ति के लिए साधना में किया करते थे उसका उपयोग अब अधिक पैसा कमाने के लिए होने लगा था। उपभोक्ता संस्कृति के प्रचार-प्रसार ने अधिकाधिक वस्तुओं के उपभोग को ही श्रेष्ठता का मापदंड बना दिया था और इसीलिए मितव्ययिता, सादगी, त्याग आदि अवधारणाएं अब लोगों की समझ से बाहर होने लगी थीं। दृश्य मीडिया अब धड़ल्ले से अधिक हिंसा व अश्लीलता का प्रदर्शन कर रहा था। शिक्षित होने का अर्थ अब बेहतर इन्सान बनना न होकर अधिक पैसा कमाने में समर्थ होना रह गया था। समाज में भ्रष्टाचार, अनुशासनहीनता, कामचोरी आदि अधिक ग्राह्य होते चले जा रहे थे। हमारे पारम्परिक मूल्यों का यह संक्रमण ही मेरे अधिकांश लेखों की पृष्ठभूमि बना।    

                        इस मूल्य संक्रमण की रोशनी में अपने अनुभव संसार को परखने की कोशिश में ये लेख लिखे गये। उच्च शिक्षा, संस्कृति, नाथद्वारा आदि की उपस्थिति अक्सर इसीलिए इन लेखों में दिखाई देती है। कोई जनतंत्र आत्मालोचन के बिना प्रगति नहीं कर सकता ; इसीलिए चंद लेखों में मैंने पाठकों का घ्यान हमारी कुछ सामाजिक विकृतियों की ओर भी दिलाने की  चेष्टा की है। मैं डॉ. मनोहर प्रभाकर व श्री शिवरतन थानवी जैसे संपादकों का विशेष रूप से ऋणी हूं जिन्होंने तब मुझे निरंतर इस किस्म के लेखन के लिए प्रोत्साहित किया।                        पाण्डुलिपि प्रकाशन सहयोग योजना वर्ष 2010-11 के अंतर्गत इस पुस्तक के प्रकाशन हेतु सहयोग राशि उपलब्ध करवाने के लिए मैं राजस्थान साहित्य अकादमी का भी तहेदिल से आभारी हूं।

                                                        पुस्तक में समाहित आलेखों की सूची का अनुक्रम                                                        

  • उत्सव केन्द्रित दर्शन व हम                                                                     
  • रहम कीजिए सार्वजनिक उद्यानों पर                               
  • उच्च शिक्षा की विसंगतियाँ                                      
  • राष्ट्रभाषा का प्रश्न                                             
  • राष्ट्रीय सम्पर्क भाषा: हिन्दी                                     
  • शिक्षा में आत्मकेन्द्रितता                                          
  • बाज़ार में बदलता एक वैष्णव तीर्थ                                
  • बढ़ती आत्मकेन्द्रितता और हमारा समाज                           
  • सबको एक ही लाठी से मत हाँकिए                              
  • दुष्चक्र ऐन्द्रियक इच्छाओं को जगाने का                            
  • काम के पहले नाम                                            
  • मूल्य संक्रमण के दौर में भारत                                    
  • हालात महाविद्यालयों के                                          
  • विघटन हमारी विरासत का                                       
  • कहां गए फ़ु़र्सत के क्षण ?                                       
  • ये शहरों से आने-जाने वाले                                      
  • पावन नगरी - अपावन गलियाँ                                   
  • पुत्रो न स्तोतव्यः                                                
  • अब कहाँ प्रेम की वह रंगत                                       



आप डॉ. सदाशिव श्रोत्रिय की इस पुस्तक की बुकिंग के लिए बोधी प्रकाशन के प्रबंधक और कवि माया मृग जी से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं.ये जानकारी हमें हिंदी के युवा आलोचक  पल्लव के सहयोग से मिल पाई है.-सम्पादक 

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