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डॉ. संतोष अलेक्श की कविताओं का हिंदी अनुवाद

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, अप्रैल 13, 2011 | बुधवार, अप्रैल 13, 2011

भला 

यीशु व स्रोक्रेटस 
भले लोग थे
फिर भी मारे गए
मुझे भला नहीं बनना


नाश्ता

डाईनिंग टेबुल पर
खाना रखा हुआ है
कुछ भी खा नहीं सकता

तीखा,मीठा व नमक
मेरे खिलाफ 
हडताल पर हैं

मेरा मित्र 
आज इस दुनिया में नहीं है
जिसने कल मेरे साथ नाश्ता किया

कल सुबह
मेरे मित्र ने नाश्ते पर
बुलाया है

हडताल वालों को
किसी न किसी तरह चुप कराना है

आंख 

चश्मेंवाला डाक्टर 
जांचने के बाद कहा
जिनके  ऑंख हैं वे देखें
जिसकी कान हैं वे सुनें

मेरे मित्र की 
एक आंख छोटी है
वह दुनिया को असंतुलित पाता है

मां की आंखें 
प्यार व दीनता भरी है

पिताजी की आंखें 
दिल की गहराईयों तक उतरती हैं

दृष्टि की सार की खोज में
मैंने प्रेमिका की आंखों में डुबकी लगाई
और दिन दहाडे अंधा हो गया


प्यारा नोट

हमारे प्यार से
सहपाठी ईर्ष्या करते थ
आम प्रेमियों की तरह 
हमने कुछ नहीं किया
इसलिए आज भी हम प्यार करते हैं
उसका अपना परिवार है
मेरा भी

डॉ. संतोष अलेक्श
मलयाली कवि और अनुवादक
आंध्रा विश्वविद्यालय
विशाखापटनम
+919441019410
+918912707926
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4 टिप्‍पणियां:

  1. संतोष अलेक्स की कविताएँ बहुत कुछ कहती हैं, हाँ उन्हें कुछ और खुलना चाहिए...

    उत्तर देंहटाएं
  2. धन्यवाद सिद्धेश्वर जी

    उत्तर देंहटाएं

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


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