Latest Article :
Home » , » रिजवान चंचल का आलेख:देश की पीड़ा और हजारे का अनशन

रिजवान चंचल का आलेख:देश की पीड़ा और हजारे का अनशन

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on बुधवार, अप्रैल 06, 2011 | बुधवार, अप्रैल 06, 2011

वरिष्ठ समाजसेवी अन्ना हजारे द्वारा जनहितार्थ किये गये संघर्षो को जानने व समझने वालों के कानों में जब हजारे की यह आवाज आई कि  मैं देश के लिए समर्पित हूं मौत से नहीं डरता तो एकबारगी उनको जानने व समझने वालों की अंाखों में अश्क छलक आयें । देश के वर्तमान गांधी 72 वर्षीय वुजुर्ग अन्ना के अन्न त्याग का दूसरा दिन गुजरा है पांच अप्रैल से दिल्ली के जंतर मंतर पर समाजसेवियों की जमात के साथ वे अपने पूर्व घोषित निर्णय के अनुसार जन लोकपाल विधेयक लाने हेतु सरकार पर दबाव बनाने और जन समर्थन को जुटाने के लिए आमरण अनशन शुरू कर चुके है । श्री अन्ना का कहना है कि केन्द्र सरकार ने एक लोकपाल बिल ड्राफ्ट किया है, जो इतना कमजोर है कि भ्रष्ट नौकरशाहों, नेताओं, मंत्रियों आदि को सजा देने के बजाय उसे बचाने का काम करेगा। सरकार ने इस ड्राफ्ट को तैयार करने के लिए एक मंत्री समूह बनाया है, जिसमें शरद पवार, कपिल सिब्बल वगैरा हैं अब ये लोग इस देश का भ्रष्टाचार विरोधी कानून बनायेंगे , ताज्जुब होता है वो लोग भ्रष्टाचार विरोधी कानून बनायेंगे जो कहते हैं कि 2-जी स्पेक्ट्रम एलाट करने में घोटाला ही नहीं हुआ निश्चित ही ऐसे मंत्री तो भ्रष्ट मंत्रियों, नेताओं, अफसरों आदि को बचानेवाला ही कानून बनायेंगे। वुजुर्ग अन्ना हजारे की ये माँगें ऐसी हैं जिनके पूरे होने की वाट आज देश का हर नागरिक जोह रहा है । 

बताते चलें कि 15 जून 1938 को जन्मे अन्ना महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के एक गांव के विकास में योगदान से  लोकप्रिय हुये समाजसेवा मे समर्पित अन्ना हजारे को एक मानहानि के मुकदमें में 1998 में गिरफ्तार भी किया गया मुकदमा भी उनके खिलाफ महाराष्ट्र के एक मंत्री द्वारा ही दायर किया गया था । यही नही महाराष्ट्र सरकार के अलावा तमाम समाजसेवी सस्थाओं विभागों के अलावा वर्ष 1990 व 1992 में भारत सरकार द्वारा अन्ना को सम्मानित भी किया जा चुका हैं। जन लोकपाल विधेयक लाने हेतु सरकार पर दबाव बनाने और जन समर्थन को जुटाने के लिए आमरण अनशन शुरू कर चुके अन्ना हजारे ने ऐसे वक्त पर आमभारतीयों की दुखती रग को सहलाने की मुहिम छेड़ी है जब कि हर भारतीय के मन में देश में कैंसर की भांति लाइलाज हो चले इस बीमारी की पीड़ा बेचैनी ब्याप्त किये है । पिछले अभियानों के विपरीत, इस बार अन्ना हजारे का उक्त अनशन किसी व्यक्ति विशेष के भ्रष्टाचार या किसी काण्ड विशेष के खिलाफ नहीं है, अपितु यह अनशन भ्रष्टाचार के पहचाने गये आरोपियों को सजा सुनिश्चित कराने के लिए जनलोकपाल विधेयक लाये जाने हेतु है। उनकी माँगों में निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार से स्वतंत्र केन्द्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन जो किसी भी मुकदमे की जाँच को एक साल में पूरी करके दो साल के अन्दर सम्बन्धित दोषी को जेल भेजना सुनिश्चित करे उसके सदस्यों की नियुक्ति पारदर्शी तरीके से नागरिकों और संवैधानिक संस्थाओं द्वारा की जाय,वर्तमान की संस्थाएं जैसे  सीबीआई, भ्रष्टाचार निरोधक विभाग, आदि का विलय भी विधेयक में हो अपराध सिद्ध होने पर सरकार को हुए घाटे को सम्बन्धित दोषी से ही वसूल किया जाये तथा किसी सरकारी कार्यालय से अगर किसी नागरिक का काम तय समय सीमा में नहीं हो तो दोषी पर जुर्माना लगाया जाये जो पीड़ित को मुआवजे के रूप में प्राप्त हो.

   गौरतलब तो यह है कि 1969 से 2008 तक लोकपाल विधेयक संसद में नौ बार पेश किया जा चुका है लेकिन अभी तक अस्तित्व में आने की बाट ही जोहता रहा हालां कि इस मामले में केन्द्र की अपेक्षा राज्य सरकारें ज्यादा सक्रिय निकली और देश के अधिकांश राज्यों में आज लोकायुक्त का पद राज्यों की शोभा में चार चांद लगा रहा हैयह बात दीगर है कि इनकी जांचे सरकार तक पहुंचते ही ठन्ढे बस्ते में पड़ जाती हों लेकिन केन्द्र में अभी तक इस मामले में एकराय नहीं बन पायी कारण कुछ भी रहे हों जब जब भी यह विधेयक भारतीय संसद की दहलीज पर पहुंचा तब-तब इसे संसोधन के लिए किसी न किसी कमेटी के पास भेज दिया जाता रहा  और फिर जब तक कमेटी अपना निर्णय लेकर सरकार को इससे अवगत कराती तब तक सदन की कार्यवाही ही ठप हो जाती अगली दफा फिर यही प्रक्रिया दोहरायी जाती । 

बीतेवर्ष करीब दो लाख करोड़ रूपए से भी अधिक की राष्ट्रीय लूट के आरोप आम जनता के सामने आए जो कि लोकतंत्र के लिये बेहद लज्जाजनक व राष्ट्रीय शर्म की बात रही 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला , कामनवेल्थ गेम्स घोटाला, आदर्श हाउसिंग सोसायटी कांड (महाराष्ट्र) और बेंगलूरू भूमि घोटाला मैने जनजागरण हेतु लिखी गई ‘जागो भारत जागो’ मे लिखा भी कि 2 जी घोटाले में जितनी लूट हुई उसके आकलन मे अनुमान है कि उससे अगले पांच सालों में सभी भारतीयों को खाद्यान्न सुरक्षा सुलभ कराई जा सकती थी यह राशि साल के स्वास्थ्य बजट 22,300 करोड़ से आठ गुनी से भी ज्यादा है।

    कहने का तात्पर्य यह कि आज पूरे देश पर जिसका आतंक छाया हुआ है वह है भ्रष्टाचार। यह शब्द अब शासन-प्रशासन के साथ चिपका सा रहता है।  इसके साथ धनबल, बाहुबल आदि सब जुड़ जाते हैं। जो भी इसकी चकाचौंध में आता है  बाहर होने की सोचता भी नही हर कोइ्र अब अर्थ के क्षेत्र में ही जीना व रहना चाहता है जिसके चलते भ्रष्टाचार सम्पूर्ण सरकारी तंत्र में व्याप्त हो गया है। इस देश में जो भी राष्ट्रीय राजनीतिक दल है सभी  भीतर से एक जैसे ही हो गए हैं। बाहरी आवरण बस अलग-अलग जान पड़ता है। सदन में राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सभी का एक सा रूख रहता है। यही कारण है कि वो चाहे कश्मीर का मुद्दा हो या पाकिस्तान से होने वाली वार्ताएं, सारे मामले वर्षो से खटाई में पड़े हैं क्योंकि हमारे सांसदों की प्राथमिकता अब देश न रहकर निजी स्वार्थ होते जा रहे हैं। भ्रष्टाचार की गणित ने राजनीति एवं धर्म को भी व्यापार बना दिया है। अब कोई नेता देश के लिए जीवन न्योछावर करने को तैयार नही स्थित यह है कि 40 करोड़ लोगों को दो वक्त का भोजन भी मयस्सर नहीं है  देश में 77 प्रतिशत लोगों की प्रतिदिन आमदनी 20 रू. से भी कम है । 

एक तरफ बढ़ती अमीरी की चमक से कुछ लोगों की आंखें चकाचौंध हो रही हैं तो दूसरी तरफ करोड़ों-करोड़ भरतीयों की आंखों का अपनी गरीबी व मजबूरी पर आसुओं में डबडबा जाना रोजाना की कहानी है। हकीकत तो ज्यादा बदतर है यदि हम सरकारी आंकड़ों की ही माने तो देश में 37.2 प्रतिशत यानी 40 करोड़ लोगों को दो वक्त का भोजन भी मयस्सर नहीं है। सरकार द्वारा गठित अर्जुन सेन गुप्त कमेटी की रिपोर्ट बताती है कि देश में 77 प्रतिशत लोगों की प्रतिदिन आमदनी 20 रू. से भी कम है। कालाबाजारियों के राज में आसमान छूती महंगाई में 20 रू. में करोड़ों लोग कैसे जिंदगी गुजर कर रहें हैं इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। ऐसे हालात में जी रहे लोग अपने बच्चों को कैसे शिक्षा दे पायेंगे? कैसे उनके स्वास्थ्य की देख-रेख करेगें? उनके भविष्य को कैसे बेहतर बना पायेंगे? यह आप खुद सोच सकते हैं।  भारत के पास सभी क्षमता रहने के बावजूद अगर 90 प्रतिशत भारतीय इस हालत में घुट-2 कर जीने के लिए मजबूर हैं तो फिर आप ही सोचें कि कौन हैं इस देश की दुर्दशा के जिम्मेदार ?  इस लूट के खिलाफ भारतीयों का कोई प्रतिरोध न पैदा हो इसके लिए साम्राज्यवादी गुलाम सांकेतिक  चेतना का प्रसार चौतरफा किया जा रहा है। जिसके मूल में दो बातें हैं- पहला नैतिक पतन, दूसरा भारतीय समाज में फूट। नैतिक पतन के अभियान के तहत हर इन्सान को स्वार्थी बनाने की कोशिश की जाती है। सबको सीख दी जा रही है कि अगर आगे बढ़ना चाहते हो तो मेहनत की कमाई से कुछ नहीं होगा। विकास के लिए लूट में शामिल  होने के रास्ते तलाशो! सिर्फ अपने बारे में सोचो! परिवार, समाज व देश के बारे में सोचने की बात बेवकूफी है। इसलिए आज भारतीयों का मूलमंत्र ऊपर से शुरू होकर नीचे तक अपने हिस्से के हिन्दुस्तान को लूटना बनता जा रहा है। अपवादों को छोड़ दें तो शीर्ष पद से लेकर गांव के चौकीदार तक को किसी भी काम के लिए सुविधा शुल्क (रिश्वत) चाहिए ऐसी परम्परा बन गई है तभी तो देश की सर्वोच्च अदालत को यह कहना पड़ा कि बेहतर होता कि सरकार इसे वैध घोषित कर संबैधानिक मान्यता दे देती.।

 जरा सोचें सर्वोच्च न्यायालय को ऐसा इसलिए कहना पड़ा , क्योंकि भ्रष्टाचार रूपी कैंसर की कोशिकाएं हमारे प्रशासन के अंतःकरण तक फैल गई हैं।  नौकरशाही के बाबू उच्च स्तर पर कमजोर और निचले स्तर पर भावशून्य है चुनावी व्यवस्था भी शुरूआती दौर से ही भ्रष्टाचार की जननी रही है चुनाव में धन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया ऐसा प्रेरक तत्व है, जिससे व्यवस्था में बीमारी फैल गई है। यह एहसान से शुरू होती है और बदले में तरह-तरह से कर्ज उतारती है। भूमि खरीदने, भूमि की सौदेबाजी और उसका अधिग्रहण ऐसी रहस्यमय व्यवस्था है, जिससे एक दूसरी समानान्तर अर्थव्यवस्था को खुराक मिलती है। हमारी सतर्कता व्यवस्था का तंत्र भी  कमजोर है, जिसमें आप केवल इसके गाोले में ही चक्कर काटकर रह जाते हैं। कोई भी सतर्कता या भ्रष्टाचार रोधी इकाई स्वतंत्र और अंतिम नहीं है। इस तरह की एजेन्सियां या तो सिफारिश के आधार पर काम करती हैं अथवा राजनीतिक प्रभाव में आकर कोई घाव भरने के लिए। पुलिस थाने गरीबों के लिए हैं, जबकि सीबीआई, सीवीसी और कैग धनाढ़्य वर्ग के लिए। धनी वर्ग को जमानत, पैरोल और यहां तक कि अग्रिम जमानत भी कानूनी कवच के रूप में सुलभ हो जाती है और तो और ऐसे लोगों को वातानुकूलित अस्पताल की सुविधा भी मुहैया करा दी जाती है, जबकि गरीबों को जेल की बदबूदार बैरक नसीब होती है। कहने का तात्पर्य यह कि सुविधा इस पर निर्भर करती है कि आप सुविधा हेतु कितनी कीमत चुका सकते हैं। सशस्त्र सेना और न्यायपालिका के कई न्यायाधीषों के नाम भी उजागर हुए हैं जब कि इस वर्ग को अभी तक स्वच्छ- पवित्र और सम्मान की निगाह से देखा जाता रहा है। स्पष्ट है, हमारे देश में न्याय भी दो तरह के हैं (कुछ थोड़े अपवाद छोड़कर)। 
   
     इसमें कोई दो राय नही भारत में आकंठ तक ब्याप्त हो चुके भ्रष्टाचार से निपटना भी अब एक और आजादी की लड़ाई के लड़ने के समान है यह समस्या बेहद गम्भीर है। इससे पार पाने के लिए पूरे मनोभाव के साथ गांधी सुभाष ,अषफाकउल्ला, भगत जैसे शहीदों की भांति जिहाद छेड़ना ही होगा। महात्मा गांधी ने भी इस सिद्धांत का समर्थन किया है लेकिन यह क्रान्ति एकला नही हो सकती इस क्रांति में सभी की जरूरत है,अन्ना हजारे ने इससे पहले भी महाराष्ट्र राज्य में भ्रष्टाचार के विरोध में इसी तरह गान्धीवादी तरीके का सफल प्रयोग करके राज्य के कई मंत्रियों को उनके पद से हटने के लिए वाध्य किया श्री हजारे का साफ सुथरा इतिहास ही उनको गान्धीवाद का सच्चा प्रतिनिधि दर्शाता है आज न केवल उनके साथ जनलोकपाल विधेयक लाये जाने की इस लड़ाई में तमाम समाजसेवी संस्थाओं ने समर्थन दिया है बल्कि करोड़ो भरतीयों के हांथ इनके समर्थन में उठ खड़े हुये हैं और सरकार के हांथ-पंव फूल रहे है।

रिज़वान चंचल
'अपनी माटी' के लेखक साथी


Share this article :

1 टिप्पणी:

संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

एक ज़रूरी ब्लॉग

एक ज़रूरी ब्लॉग
बसेड़ा की डायरी:माणिक

यहाँ आपका स्वागत है



ज्यादा पढ़ी गई रचना

यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template