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विश्व कप क्रिकेट हेतु दिखी पत्रकारिता पर कौशल किशोर की राय

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on रविवार, अप्रैल 03, 2011 | रविवार, अप्रैल 03, 2011


इतिहास अपने को दोहराता है। ऐसा ही हुआ है। 1983 के बाद 2011 हम फिर क्रिकेट विश्व चैम्पियन बने। यह एक बड़ी उपलब्धि है।  जो हमारे गुरू थे, जिन्होंने हमें गुलाम बनाया और यह खेल सिखाया, उन्हें बहुत पीछे छोड़ दूसरी बार हमने यह जीत हासिल की है। यह ऐसी जीत है जो मन को रोमांचित कर दे। हमारे खिलाड़ी निःसन्देह बधाई के पात्र हैं। हम जोश से भरे हैं। लेकिन ऐसा जोश भी ठीक नहीं जिसमें हम होश खो दें।

हम खेल का भरपूर आनन्द उठायें, जीत पर खुशियाँ मनायें, खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करें, एक दूसरे को बधाइयाँ दें पर यह भी जरूरी है कि खेल से जुड़े मुद्दों पर चर्चा भी हो। खेल में प्रतिभा को स्थान मिले पैसे को नहीं। हम इस पर भी विचार करें कि कारपोरेट पूँजी और बाजार कैसे हमारे खेल में घुस रहा है, खेल खिलाड़ी को कैसे अपनी कमाई और व्यवसाय का माध्यम बना रहा है। फिर अन्य खेलों की दुर्दशा क्यों ? हाकी जिसमें हम विश्व चैम्पियन थे, उसमें हम इतना पीछे क्यों ? क्रिकेट कही अन्य भारतीय खेलों को आऊट तो नहीं कर रहा है ? बाजार उन्हीं खेलों को प्रोत्साहित क्यों कर रहा है जहाँ पैसे व्यवसाय की संभावना अधिक है ? खेल का क्षेत्र हमारी संस्कृति का क्षेत्र है। पर हमने क्या देखा ? राजनीति भ्रष्टाचार। मंत्री मंत्रालय से लेकर तमाम खेल समितियाँ भ्रष्टाचार में डूबी इुईं। आई पी एल और कामनवेल्थ गेम में क्या हुआ, सबके सामने है। इससे दुनिया में हमारी क्या छवि बनी ?

एक और बात, यह खेल है युद्ध नहीं। जहाँ क्रिकेट हुआ वह मैदान है, रणक्षेत्र नहीं। पर खेल की भावना युद्ध की भावना में बदल दिया जाय और हमारे राष्ट्रवाद पर अन्धराष्ट्रवाद की मानसिकता हावी हो जाये तो फिर इस भावना मानसिकता पर जरूर विचार किया जाना चाहिए। मीडिया के रोल पर भी बात होनी चाहिए।फतह पाकिस्तान’, ‘लंका दहन’, ‘रावण दहनआखिरकार यह कैसी पत्रकारिता है ? प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रानिक मीडिया सब जगह जैसे खेल नहीं उन्माद बोल रहा है और पूरे देश को उन्मादी बनाने पर तुला हो। कहते हैं खेल प्रेम भाईचारा बढ़ाता है, दूरियाँ खत्म कर एक दूसरे को करीब लाता है। 

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री आये। श्रीलंका के राष्ट्रपति आये। पड़ोसी मुल्कों से तमाम लोग आये। खेल हुआ। हम जीते। पर जो उन्माद पैदा किया गया उससे कौन विजयी हुआ ? खेल जीता या पूँजी बाजार ? किसको खाद पानी मिला खेल की निर्मल भावना को या संघी मानसिकता को ? ये सवाल या इस तरह की बातें जश्न के माहौल में जरूर अटपटी सी लग रही होंगी। पर यही मौका है जिस पर चर्चा की जा सकती है, गलत प्रवृतियों पर चोट की जा सकती है।

 कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच लखनऊ 

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2 टिप्‍पणियां:

  1. टीम इण्डिया ने 28 साल बाद यह सपना साकार किया है।
    एक प्रबुद्ध पाठक के नाते आपको, समस्त भारतवासियों और भारतीय क्रिकेट टीम को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ।

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  2. टीम इण्डिया ने 28 साल बाद यह सपना साकार किया है।
    एक प्रबुद्ध पाठक के नाते आपको, समस्त भारतवासियों और भारतीय क्रिकेट टीम को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ।

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