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डॉ0 महेन्द्र प्रताप पाण्डेय की दो नई रचनाएं

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, मई 14, 2011 | शनिवार, मई 14, 2011



मूक करुण स्वर


आओ चलें क्षितिज के पार,
              जहॉ न होता यह संसार।
शान्ति अवनि है नभ का प्रांगण,
              शान्ति प्रकृति का नीरव नर्तन।
नीरवता का राज्य रहेगा,
              नीरव अनिल अनल पय धार।
आओ चलें क्षितिज के पार,
              जहॉ न होता यह संसार।।1।।
अनावरित हो हिय मंजूषा,
              बने चकोरी चँद्र पियूषा,
सच्चे होयें सपने अपने,
              अमित कल्पना हो साकार।
आओ चलें क्षितिज के पार,
              जहॉ न होता यह संसार।।2।।
हम तुम होंगे दोनो एक,
              वहॉ न होंगे विघ्न अनेक,
सुख के सारे साज सजेंगें,
              अपना रचित नया संसार।
आओ चलें क्षितिज के पार,
              जहॉ न होता यह संसार।।3।।
प्रणय मिलन की प्रबल पिपासा,
              चिर संचित उर की अभिलाषा,
क्षण में तृप्ति बनेगी सारी,
              नीति नव प्रीति रीति व्यवहार।
आओ चलें क्षितिज के पार,
              जहॉ न होता यह संसार।।4।।


परिवर्तन


है अनुभव अब अन्त हुये, जग की परिभाषायें बदली।
वह किरण आस की लुप्त हुयी, जीवन की आशायें बदली।

परिवर्तन के इस रौद्र रूप में, क्या क्या परिवर्तित होगा।
यह जान सोच मन थक जाये, लोगों की अभिलाषायें बदली।।

उपकार जगत से दूर हुआ, बदले हर जन निज कर्मों से।
आहत मन करना काम रहा, पदच्युत नित होते धर्मों से।
हे युग के संचालक मालिक, मधुरिम सुखद हटायें बदली।।

भाषण में कोई कसर नही, पर कर्म नही हो पाता है।
कन्या की हत्या जली बधू को, न्याय नही मिल पाता है।
पश्चिमी हवायें है हावी, पूरब की दिव्य हवायें बदली।।

कहना कुछ है, करना है कुछ, इनसान यहॉ पर करता है।
हर मिनट मिनट पर पाप चक्र, नित मन में सदा मचलता है।
बरसात स्नेह का हो कैसे, जब गुण धर्म घटायें बदली।।

डॉ0 महेन्द्र प्रताप पाण्डेय
राजकीय इण्टर कॉलेज द्वाराहाट
अल्मोड़ा,उत्तराखण्ड
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