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चित्ररेखा संजय जैन की एकांकी:-'किसी को तो आगे आना ही होगा'

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, मई 05, 2011 | गुरुवार, मई 05, 2011


( सुबह 7.15 का समय एक 12 वर्ष की लड़की जिसका नाम दिव्या जैन है और केन्द्रिय विद्यालय में कक्षा 8 की छात्रा है घर से स्कूल की तरफ जा रही हैं। दिव्या देखती है कि सड़क पर पानी फेला हुआ है जो कि सामने के मकान के अन्दर से आ रहा है। पानी का यूं अपव्यय उससे सहन नहीं होता। आगे ............)

दिव्या- अरे! यह पानी कैसा ? हाय कितना पानी लोगो को चिन्ता ही नहीं अच्छा तो यह पानी इस मकान 
       से आ रहा है। अभी बुलाती हुॅ। सुनिए तो..... अन्दर कौन है ? 

प्रिया-(मकान से बाहर आकर) हॉ कहिए किससे काम है ? 
दिव्या-दीदी यह पानी कहॉ से आ रहॉ है ? क्या पाईप टूट गया है। या.......
प्रिया-नहीं ऐसी बात नहीं है। वो तो मैं हमारी कार धो रही थी।
दिव्या-क्या आप कार धो रहीं थीं।
प्रिया- हाँ
दिव्या-दीदी आपको पता है ? लोगों को पीने का पानी नहीं मिल रहा,पशु प्यास से परेशान 
      हो रहे हैं। पक्षियों की मौत हो रही हैं। और आप.........

प्रिया-तो क्या हुआ मैं किसी से पानी थोडे मांग रही हूँ। मैरे घर में ट्यूबवेल है और   
      यह उसी का पानी हैं।

दिव्या-तो क्या ट्यूबवेल का पानी यूॅ बहाने के लिए है। क्या आप किसी प्यासे व्यक्ति को 
      पानी पिने या भरने देती है ?

प्रिया-नहीं मैं क्यूं भरने दॅु। इसे हमने इसे खुदवाया है और पैसे खर्च किए है।
दिव्या-दीदी बड़े शर्म की बात है। लोगों को पीने का पानी नहीं मिल रहा और आप ऐसी 
      सोच रखती हैं। पानी सबका है इस पर सबका अधिकार है। यह किसी एक का नहीं हैं।

प्रिया- तो फिर
दिव्या-दीदी मैं आपसे निवेदन करती हूँ कि पानी की कीमत पहचानों इसे इस तरह व्यर्थ मत 
      बहाओ।
प्रिया- अच्छा ! तो में क्या करूं ? 
दिव्या-दीदी बाल्टी मैं थोड़ा सर्फ धोल लो उससे कार धोओ फिर बाल्टी में पानी भरकर साफ 
     पानी से इसे धो डालों।सिर्फ 4 बाल्टी पानी से कार धुल जाएगी।

प्रिया- दिव्या तुमने मेरी आंख खोल दी अब मैं कभी पानी को व्यर्थ नहीं बंहाऊगी। मुझसे 
      बहुत बड़ी गलती अब तक हुई है उसके लिए में क्षमा मागती हूँ। अच्छा दिव्या और मैं क्या करूँ ?

दिव्या- दीदी आपको समझ में आ गया बस। हाँ ऐसे करते हैं कल में एक परिण्डा लांऊगी 
       उसे यहाँ पेड से बाँधना और उसमें रोजाना साफ पानी भरना।

प्रिया- परिण्डा! ऐसा क्यूँ भला।
दिव्या- अरे दीदी पक्षियों के लिए और क्या ?

प्रिया- पक्षियों के लिए क्यों ?
दिव्या- अरे दीदी!आपको पता है न गर्मी अधिक पड़ने से नदी-नाले आदि जल के स्रोत सूख गए है। उनके जीवन की रक्षा के लिए पक्षियों को पीने का पानी नहीं मिल रहा। अतः उन्हें अकस्मात मौत से 
      बचाने के  लिए।

प्रिया-हाँ सही बात हैं।

दिव्या-  (सबसे) मैं आप सब से भी निवेदन करती हूँ कि आप भी पानी का महत्व समझें पानी बचाएं 
 इसे व्यर्थ न बहाएं। कहीं ऐसा न कि हमारे द्वारा पानी के किए गये दुरूपयोग का हमें   फल भुगतना पड़े और पीने का पानी भी नही मिले क्योंकि नदी,नाले,तालाब आदि जल के स्त्रोत सूख रहे हैं। जमीन में जल का स्तर नीचे जा रहा हैं।

दिव्या- अच्छा चलती हुॅ। स्कूल के लिए देर हो रही है।
(दिव्या रवाना होती है। इतने मैं एक धर से कोई लड़का कचरा फेकता है जो थेली मे बंधा है सीधा दिव्या के ऊपर गिरता है )

दिव्या- (गुस्से से!) अरे यह कौन ? दिखाई नही देता क्या ?
ऋषभ- (धर से निकलकर) माफ करना गलती हो गई।

दिव्या-गलती नहीं ‘‘बहुत बड़ा अपराध हुआ है आपसे ‘‘
ऋषभ- (आश्चर्य से) अपराध!वो कैसे ?

दिव्या-(समझाती हैं) आपको पता है आपने घर का कचरा रोड़ पर फेंका।
ऋषभ- हाँ तो

दिव्या- इससे गन्दगी होगी!ये नाली में जाएगी तो उसका बहाव रोकेगी और बिमारी का 
      कारण बनेगी।
ऋषभ- वो कैसे ?

दिव्या- (समझाती है) अरे! ये बंधा हुआ कचरा नाली का बहाव रोकेगा जिससे पानी गन्दा 
       पानी इकट्टा होगा और मच्छर पैदा होगें जो मलेरिया व अन्य दूसरी बिमारियां 
       फेलाएंगे।
ऋषभ- और क्या-क्या नुकसान होगा ?

दिव्या- अगर इस बधें हुए कचरे या अन्न को रोड पर फेंकेगे तो गाय माता भेजन की खुशबु 
       से इसे खाना चाहेगी जो उसके लिए भी बिमारी या मौत का कारण बनेगा।
ऋषभ- (आश्चर्य से) गाय की मौत का कारण ? भला वो कैसे ?

दिव्या- (आश्चर्य से) अरे! देखो आपने कचरे को पौलिथीन की थैली में बाधकर फेका है।
ऋषभ- हाँ

दिव्या- चलो इस पोलिथीन की गांठ को वापस खोलकर दिखाओ
ऋषभ- (खोलने का अभिनय करता है) नहीं खुल रहा।

दिव्या- समझे! जब यह आपसे नहीं खुल रहा तो फिर गाय माता इसे कैसे खुलेगी।
ऋषभ- हाँ तो फिर

दिव्या- भेजन की खूशबू के कारण गाय माता इसे थेली समेत खाती है। और वो प्लास्टिक 
      की थैली उसके पेट में भी हजम नहीं होती और जमती जाती है जो बाद मे गाय माता 
      की मौत का कारण भी बनती हैं।

ऋषभ- (आश्चर्य से) हाय! ये तो मेंरे द्वारा बहुत बड़ा पाप हो जाता।गाय को हम माँ कहते 
      हैं। उसका दूध पीते है जिससे हममे बुद्धि आती है और हम.............
दिव्या- ये ही नहीं तुमने कानून का भी उल्लंधन किया है जिसके लिए तुम पर 1 लाख रूपए 
       तक का जुर्माना हो सकता है।

ऋषभ- वो कैसे ?
दिव्या- आपको पता है हमारी सरकार ने पांलिथीन की थैलियों पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया है। 
       और उसके उल्लंधन पर अर्थदण्ड तथा जैल दोनों की सजा का प्रावधान है।

ऋषभ- मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।मैं अब आगे से ऐसा नही कंरूगा।
दिव्या- तुम्हारे घर में पुरानी साडियाँ तो होगीं न
ऋषभ- हाँ है।

दिव्या- उसका तुम क्या करते हो ?
ऋषभ- बर्तन वाली आती है! उसे देते हैं वो पाँच साडियों पर एक बर्तन देती है।

दिव्या- मैं आपको एक सुझाव देती हूँ आप मानेंगे।
ऋभ-क्यो नहीं। आप बताओंतो।

दिव्या- पाँच साडियों के बदले तुम्हें 20 रूपए का बर्तन मिला।
ऋषभ- हाँ तो
दिव्या- अब साडियाँ मत बेचना

ऋषभ- तो फिर क्या करूं।
दिव्या- आप पुरानी साडियों से छोटे-छोटे कपड़े के थेले बनाना और बाजार जाओं तो सारा 
       सामान उसी में लाना। पौलिथीन की थैली में नहीं

ऋषभ - हाँ अब समझ में आ गया। लेकिन 5 साडियों के तो बहुत सारे थेले बनेंगे  मैं इतने थेलों का क्या करूगा ?
दिव्या- (समझाती है) हाँ सही बात है थेले तो बचेंगे।पर आप ऐसा करना जब सब्जी मण्डी जाओ तो वहाँ इन थेलों को ले जाना
ऋषभ- फिर वहाँ क्या करूँ ?

दिव्या- वहाँ देखना जो भी लोग पौलिथीन की थेली मे सब्जी ले रहे हो उन्हें समझाना तथा यह थेले उनको देना 
       जिससे वे पौलिथीन की थैली मे सब्जी ना लें।
ऋषभ - अब सब समझ मे आ गया। मैं अब ऐसा ही करूंगी।

दिव्या- (सबको कहती है) मैं आप सब से भी निवेदन करनी हूं कि आप भी पौलिथीन से  पशु-पक्षी,जमीन,पेड़-पौधो  हमे व हमारे समस्त पर्यावरण को हो रहे नुकसान को समझें और पौलिथीन के उपयोग से बचे। पौलिथीन की   थैलियों की जगह कपड़े,कागज,जूठ से बने थेलो को उपयोग में ले। ऐसा करके स्वंय भी सुरक्षित रहें         और पर्यावरण को भी सुरक्षित रखे। इसे अपना कर्तव्य माने।

  (दिव्या स्कूल पंहूचती है। कक्षा मे टीचर दीदी पढा रही हैं इतने मे एक सूचना आती है। दीदी पढ़कर सुनाती है........)

दीदी-बच्चों वृक्षारोपण का बहुत बड़ा अभियान चलेगा इसके तहत लाखों पौधों को एक ही 
     दिन मे लगाया जाएगा।और आपको भी इसमें सहयोग करना है।

दिव्या-दीदी क्यों और कैसे ?
दीदी- बरसात आने वाली है और एक संस्था वृक्षारोपण का अभियान चला रही है। उसी के 
      अन्तर्गत यह पौधे लगाए जांएगे जो लाखों की संख्या में होगें।

दिव्या- दीदी ऐसा क्यों ?
दीदी- अरे इससे बहुत बड़ा रिकार्ड बनेगा हमारे राज्य व देश का भी नाम होगा।

दिव्या- दीदी मैं इसे अच्छा नही मानती यह उचित भी नहीं है।
दीदी- क्यों भला ? क्या हमारे राज्य व देश का नाम होगा तथा विश्व रिकार्ड बनेगा तुम्हें 
      अच्छा नहीं लगेगा ? 

दिव्या- दीदी देश व राज्य को नाम तो ऊंचा  होना चाहिए और ये हमारे लिए गर्व की बात भी      
       है लेकिन.......
दीदी- लेकिन क्या ?

दिव्या- दीदी रिकार्ड बनाने के लिए जो कार्य किया जा रहा है वे उचित नही है।
दीदी- कैसे भला ?
दिव्या- दीदी यह देखा गया है कि जो कार्य रिकार्ड़ के लिए किया जाता है उसमे अपनापन व जिम्मेदारी नही होती 

दीदी- वो कैसे ?
दिव्या- दीदी इसमे लक्ष्य पूरा किया जाता है और जिम्मेदारी वहीं खत्म हो जाती है। जैसा कि        
       देखा गया है।

दीदी- नहीं ऐसी बात नहीं हैं।
दिव्या- दीदी इसमे पहले भी किसी ने 1 किसी ने 2 किसी ने 5 लाख तक पौधे लगाए है।  कराड़ों रूपए खर्च हुए, मानव श्रम लगा रिकार्ड भी बने पर बताइए दीदी उनमें से  कितनी पौधे जीवित है ? कितने पौधे वृक्ष बने किसने उनकी जिम्मेदारी ली लगाने वाले को ही पता नहीं कहाँ कितने पौधे लगे कहा लगे और कितने जिन्दा है। ऐसा लगता   है मानो......................

दीदी- बात तो सही है।
दिव्या- और सुनिए। गत वर्षो मे स्कूलों में कम से कम 50 पौधे हर वर्ष लगाने को दिए जाते रहे है 
       उस हिसाब से हर स्कूल मे कम से कम 200 पौधे तो होने ही चाहिए। और एक बगिचे का स्वरूप मिलना 
       चाहिए।

दीदी-हाँ होने तो चाहिए।
दिव्या- पर ऐसा नही है आप मेरे साथ सब स्कूलों मे चलिए कुछ स्कूलों को छोड दे तो कही 
       पर भी 10 या 20 पौधे से अधिक नहीं होगें वो भी स्वंय लगे हुए।

दीदी- ऐसा थोडे होता है।
दिव्या- दीदी गत वर्ष हमारे राज्य मे सरकारी स्तर पर स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा पर्यावरण 
       प्रेमियों द्वारा वन विभाग द्वारा व अन्य स्तर पर लाखों पौधे लगे। मेरा मानना है हम रिकार्ड 
       उठाकर देखे तो पाएंगे कि हमारे राज्य का क्षैत्र कम पड जाए इतने पौधे लगे इस 
       हिसाब से तो सारा राज्य हरा-भरा होना चाहिए। पर ऐसा है क्या ?

दीदी- अच्छा तो
दिव्या- दीदी इतना  ही नही इन पर करोड़ो रूपए का बजट लगा उसका तो कोई हिसाब ही 
       नहीं।

दीदी- दिव्या बात तो तुम्हारी जम रही है।
दिव्या-दीदी वृक्ष लगाना अच्छी बात है लगाना चाहिए पर उसके लिए जिम्मेदारी सुनिष्चित होनी चाहिए,प्रत्येक व्यक्ति या बच्चे को एक पेड़ की जिम्मेदारी दी जाए।

दीदी- फिर
दिव्या- फिर यह देखा जाए कि जगह कितनी है,सुरक्षा किस प्रकार की हैं इसके लिए पानी 
       कहां से व कैसे आएगा जिस बच्चे को जिम्मेदारी दी गई है उसकी अनुपस्थिति में 
       इसमें पानी कौन डालेगा।

दीदी- हां सही बात है ऐसा ही होना चाहिए।
दिव्या- इसके अलावा दीदी बच्चों को इसके अंक मिलने चाहिए कि उसका पौधा कितने समय  में बड़ा हुआ और  
       सुरक्षित रहा।

दीदी- दिव्या हम भी पौधे लगाएगे लेकिन सारी व्यवस्थाएं देखकर जिम्मेदारी के साथ। दिव्या- हाँ दीदी हम इस वर्ष   ऐसा ही करेंगे।
दिव्या- (सब से) मै आप सबसे भी निवेदन करती हूं कि आप भी नियम ले कि जीवन मे भले एक ही पेड लगाएगे पर    उसकी सुरक्षा अवश्य करेगें। पेड़ लगाकर उसे भगवान भरोसे मरने के लिए छोड देना भ्रुण हत्या के समान पाप    हैं। इसे प्रारम्भ मे बच्चे के समान पालना पड़ता है जो बहुत बडी जिम्मेदारी है। मैं सरकार को भी लिखुगीं कि  पेड लगाकर उसे भगवान भरोसे छोडने वाले को सजा मिलनी चाहिए। वो भी भ्रुण हत्या के समान । साथ ही पेड़ लगाने या रिेकार्ड बनाने के लिए पेड़ लगाने मे पहले सारी व्यवस्था देख लेनी चाहिए कि पानी है या नही  (वर्ष भर के लिए) पौधे को पनपने के लिए जगह है या नही, इसको पालने की जिम्मेदारी तय हुई या नही तब पेड़ लगाए जाए और लगाने के बाद उसे पुत्र के समान पाले उसका हर स्थिति मे ख्याल रखा जाए। यदि ऐसा होता है तो हम सच्चे अर्थो मे हरित प्रदेश की कल्पना साकार कर पाएंगे। जो कि हमारे मुख्यमंत्री जी का सपना  भी है और उसे हम सब को मिलकर पूरा करना है।


चित्ररेखा संजय जैन
पता-मकान नं.59,संक्टर नं.4
गांधी नगर,चित्तौड़ (राज.) 312001
मेबाइल नं.-9214963491
 9214623844
रूचि- ( 1) लेखन कार्य
(2) पर्यावरण चेतना
         (3) वृक्षारोपण

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