''राजस्थानी भाषा को मान्यता हेतु इसमें एकरूपता नहीं होना मूल रोड़ा'':-नन्द किशोर 'नेक' - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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''राजस्थानी भाषा को मान्यता हेतु इसमें एकरूपता नहीं होना मूल रोड़ा'':-नन्द किशोर 'नेक'

ये लोगो कीर्ति राणा जी के
ब्लॉग से लिया गया है.

वरिष्ठ साहित्यकार नंदकिशोर नेक ने कहा कि राजस्थानी भाषा में लिखे हुए हैं सबसे ज्यादा ग्रंथ, लेकिन बोलियों में एकरूपता नहीं होने से दर्ज़ा नहीं मिल पा रहा है.राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने के लिए जनता को ही आगे आना होगा। अगर राजस्थानी भाषा को दर्जा मिले तो मध्यवर्गीय समाज को सबसे ज्यादा फायदा होगा। राजस्थानी की विभिन्न बोलियों में एकरूपता नहीं होने से इस भाषा को मान्यता मिलने में दिक्कत आ रही है। 

यह बात वरिष्ठ साहित्यकार नंदकिशोर नेक ने दैनिक भास्कर से बातचीत में कही। राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने के आंदोलन से जुड़े साहित्यकार नंदकिशोर ने कहा कि राजस्थानी भाषा में इतने ग्रंथ लिखे हुए हैं कि इसका सदुपयोग कर लिया जाए तो यह भाषा हिन्दी साहित्य से भी आगे बढ़ सकती है। राजस्थानी में 13-14 बोलियां हैं, लेकिन राजस्थानी भाषा को मान्यता मिलने में जो अड़चन आ रही है, इसका मुख्य कारण एक यह है कि विभिन्न बोलियों में एकरूपता नहीं हैं। इसी कारण इतनी समृद्व भाषा को आज भी मान्यता नहीं मिल पा रही है। नेक कहते हैं कि राजस्थानी भाषा को मान्यता मिली तो इससे सबसे ज्यादा फायदा मध्यमवर्गीय परिवार को होगा। पूर्व में उपराष्ट्रपति स्व. भैरोसिंह शेखावत ने भी राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने के लिए प्रयास किए थे।

साहित्यकार सहित अन्य लोग आज भी समय-समय पर इसके लिए प्रयास कर रहे हैं, लेकिन अब अगर इस भाषा को मान्यता दिलानी है तो आमजन को ही आगे आना होगा, क्योंकि राजस्थानी भाषा मुंह की नहीं बल्कि आत्मा की भाषा है। आज कई राज्यों की भाषाओं को मान्यता मिल चुकी है। उन्होंने खुद गीता ग्रंथ का राजस्थानी में अनुवाद किया है। हालांकि गीता ग्रंथ का राजस्थानी भाषा में पहले ही 15 बार अनुवाद हो चुका है, लेकिन उन्होंने खुद गीता के 700 श्लोकों के 700 दोहे का अनुवाद राजस्थानी भाषा में कर चुके हैं। उन्होंने कल्लाजी के जीवनी पर भी दोहे लिखे हैं। वे हिन्दी के विद्यार्थी और ऊर्दू भाषा के शौकिन है, लेकिन बात राजस्थानी और मारवाड़ी भाषा का ही बोलचाल में अधिकाधिक प्रयोग करते हैं। इसलिए वे कहना चाहते हैं कि अधिकाधिक आमजन भी राजस्थानी भाषा में लिखे, पढ़े, बोलेंगे तो फिर इस भाषा को मिलने वाला हक कोई नहीं रोक सकता।

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