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चित्तौड़ी आठम महोत्सव संपन्न

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, मई 12, 2011 | गुरुवार, मई 12, 2011

  इतिहास के पन्नों से

राजस्थान के गौरव के नाम से अपनी पहचान बनाने वाली भक्ति और शक्ति की नगरी चित्तौडग़ढ़ बुधवार को अपना स्थापना दिवस मनाने जा रही है। अपने गौरवशाली व स्वर्णिम इतिहास को समेटे चित्तौडग़ढ़ समय के उतार-चढ़ाव का सामना करते हुए अब नई रफ्तार से आगे बढ़ रहा है। ये जिला जहां एक ओर त्याग, तपस्या और बलिदान के लिए प्रसिद्ध है। वहीं गौरवमयी ऐतिहासिक विरासत और कला, संस्कृति में भी बेजोड़ है। सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से इस जिले का विशेष महत्व है। पाषाण काल में यह क्षेत्र पाषाणयुगीन सभ्यता का प्रमुख केन्द्र था। नगरी व जिले के अन्य क्षेत्रों में हुए उत्खनन कार्य में इसके प्रमाण स्वरूप अनेक प्रस्तर युगीन हथियार प्राप्त हुए हैं। प्राचीन और मध्यकाल में चित्तौडग़ढ़ अपने वैभव की चरम सीमा पर था। यह मेवाड़ जैसे विशाल और शक्तिशाली राज्य की राजधानी था, जिसे महाराणा कुंभा, सांगा, प्रताप, मीरा, पद्मिनी, व पन्नाधाय जैसी महान विभिूतियों की जन्मभूमि व कार्यस्थली कहलाने का गौरव प्राप्त हुआ।

यहां विशाल दुर्ग व स्थापत्य कला के श्रेष्ठ स्मारक इस जिले के प्राचीन वैभव की पुष्टि करते हैं। इसका प्रारंभिक इतिहास विस्मृति के गर्भ में है। मान्यता यह भी है कि चित्तौडग़ढ़ दुर्ग की स्थापना पांडव भीम ने द्वापर युग में की थी। किंतु इतिहास के आधार पर यह माना जाता है कि इसका निर्माण मोरी राजपूतों के प्रधान चित्रागंद मौरी (मौर्य) जिसका यहां सातवीं शताब्दी में राज्य था, ने करवाया था और इसीलिए इसे प्रारंभ में चित्रकूट के नाम से पुकारा जाता था। मेवाड़ के पुराने सिक्कों पर भी चित्रकूट शब्द अंकित मिलता है और यही चित्रकूट शब्द कालांतर में अपना रूप बदलता गया, जो आज चित्तौडग़ढ़ बन गया। इतिहासकार भी यही मानते हैं कि चित्तौडग़ढ़ दुर्ग बनवाने का श्रेय चित्रांगद मौर्य को है। इसी के नाम पर इस स्थान का नाम चित्रकूट पड़ा और चित्तौडग़ढ़ उसी का अपभ्रंश है। कर्नल टाड के अनुसार सन् 728 ईस्वी में बापा रावल ने इस दुर्ग को राजपूताने पर राज्य करने वाले मौर्य वंश के अंतिम शासक मान मौर्य से छीनकर गुहिलवंशीय राज्य की स्थापना की। चित्तौड़ के स्थापना पर दैनिक भास्कर ने पाठकों को कुछ विशेष सामग्री देने का प्रयास किया है।

आखिर चित्तौड़ी आठम क्यों?

करीब छह दशकों तक बिसरा दी गई वैशाख शुक्ल अष्टमी यानि चित्तौड़ी आठम विश्वविख्यात ऐतिहासिक चित्तौडग़ढ़ के लिए काफी अहम दिन है। चित्तौडग़ढ़ के अतीत के कैलेंडर में चित्तौड़ी आठम के नाम के कई पन्ने जुड़े हुए हैं। दैनिक भास्कर ने सैकड़ों साल पुराने इतिहास के इन्हीं पन्नों को पलटते हुए उन्हें जनमानस से रूबरू कराने का प्रयास किया है। चित्तौडग़ढ़ के इतिहास की जीवंत यादों के प्रतीक के रूप में कालिका माता मंदिर, चतरंग तालाब व अन्नपूर्णा मंदिर अभी भी मौजूद हैं।नगर के प्रमुख इतिहासविद् व ज्योतिषी पं. मदन चतुर्वेदी बताते हैं कि ऐतिहासिक किवदंतियों के अनुसार वैशाख शुक्ल अष्टमी के दिन चित्तौड़ दुर्ग पर चतरंग मोरी तालाब और सूर्य मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा, सूने सूर्य मंदिर में मां कालिका की प्रतिमा स्थापना, अन्नपूर्णा मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा, बप्पा रावल का चित्तौडग़ढ़ पर आधिपत्य, राजधानी को नागदा से चित्तौड़ स्थानांतरित करना, महाराणा हम्मीर की चित्तौड़ विजय जैसी कई महत्वपूर्ण घटनाएं हुई थी।

पं. चतुर्वेदी इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि राजा चित्रांगद मोरी सूर्य के उपासक थे। उन्होंने ही वैशाख शुक्ल अष्टमी के दिन दुर्ग पर शुभ मुहूर्त में सूर्य मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की थी। वर्तमान में मृगवन के पास स्थित तालाब नगरी के मोरी राजा चित्रांगद ने बनाया था। चित्रांगद के नाम पर इसे चतरंग मोरी तालाब कहा जाता है। इस तालाब के पास स्थित मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा भी वैशाख शुक्ल अष्टमी के दिन ही हुई थी।

इतिहास के अनुसार महाराणा हम्मीर को चित्तौड़ विजय में गुजरात के खोड़ गांव में रहने वाली बरबड़ी देवी का आशीर्वाद प्राप्त था। राज्य मिलने के बाद महाराणा बरबड़ी देवी को आदर के साथ चित्तौड़ ले आए। वे यहीं पर रहने लगी। बरबड़ी देवी की प्रेरणा से महाराणा हम्मीर ने वैशाख शुक्ल अष्टमी के दिन ही सूर्य मंदिर में कालिका माता की प्रतिष्ठा की थी। बताया गया कि पुराने समय में बना यह सूर्य मंदिर अलाउद्दीन खिलजी द्वारा आक्रमण करने के दौरान खंडित कर दिया गया था और तब से सूना पड़ा था।
हम्मीर के शासनकाल में ही बरबड़ी देवी का स्वर्गलोकगमन हो गया था। उनका दाह संस्कार दुर्ग पर जिस जगह हुआ, वहां महाराणा हम्मीर ने बरबड़ी देवी की याद में मंदिर बनवाया। वर्तमान में यह मंदिर अन्नपूर्णा मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा भी वैशाख शुक्ल अष्टमी के दिन ही हुई थी।


अष्टमी को ही हुआ बप्पा रावल का आधिपत्य -
गुहिलोत वंश के आठवें वंशधर राजा कालभोज (बप्पा रावल) ने विक्रम संवत् 791 व ईस्वी सन् 734 में नगरी के राजा मानमोरी को हराकर मेवाड़ पर आधिपत्य जमाया था। इतिहास के पन्नों में यह दिन भी वैशाख शुक्ल अष्टमी ही बताया जाता है।


नागदा से चित्तौडग़ढ़ आई थी राजधानी -
विक्रम संवत् 1275 को वैशाख शुक्ल अष्टमी के मौके पर मेवाड़ के राजा जैत्रसिंह मेवाड़ राज्य की राजधानी को चित्तौडग़ढ़ लाए थे। इससे पहले मेवाड़ की राजधानी नागदा थी, जिसे मौजूदा समय में उदयपुर के पास कैलाशपुरी एकलिंगजी के रूप में जाना जाता है।


हम ऋणी हैं हम्मीर के -
26 अगस्त 1303 को अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ विजय के बाद अपने सबसे बड़े बेटे खिज्र खां को चित्तौड़ दुर्ग सौंप दिया। खिज्र खां ने चित्तौड़ का नाम बदलकर खिज्राबाद रख लिया। कुछ समय बाद खिज्र खां राजपूतों से परेशान होकर जालौर के मालदेव सोनगरा को सौंपकर चला गया। सोनगरा भी चित्तौड़ दुर्ग को ज्यादा समय तक अपने अधिकार में नहीं रख सका। महाराणा हमीर ने मालदेव सोनगरा को पराजित कर फिर से मेवाड़ के 43 वें शासक के रूप में चित्तौड़ दुर्ग पर अपना अधिकार जमाया। यह भी वैशाख शुक्ल अष्टमी का दिन था


कैसे भूल जाएं कुम्भा को ?

वरिष्ठ पत्रकार रघुवीर जैन का कहना है कि महाराणा कुंभा का शासन पूरा होने के बाद चित्तौड़ का विकास क्षीण होता गया। महाराणा कुंभा के शासन में चित्तौड़ में स्थापत्य कला और एवं भवन निर्माण, संगीत पर काफी कार्य हुए। इसके बाद जिले में आजादी के बाद 1955 से 1965 के बीच के दशक में विकास की रफ्तार बढ़ी। मुख्य तौर पर शहर परकोटे से बाहर आ गया। मीरानगर बस्ती बसी और जिलाधीश कार्यालय के निर्माण की नींव रखी। जिले में औद्योगिक और शिक्षा का सूत्रपात भी इसी दशक में हुआ। बिरला सीमेंट फैक्ट्री व राजकीय कालेज, सैनिक स्कूल खुला और गाड़ी लौहार स्कूल की आधारशिला रखी गई। गंभीरी बांध के निर्माण की योजना और बेड़च नदी की पुलिया बनी तो कोटा ब्राडगेज लाइन की योजना भी इसी दशक में बनी। वे कहते हैं कि शहर में सड़कों के साथ-साथ बिजली लाइनों का विस्तार हुआ। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सन् 1955 में यहां आने के बाद भी चित्तौड़ ने विकास की गति पकड़ी।

विभाग क्या कहता है ?
चित्तौडग़ढ़ का किला प्राचीन समय से निर्माण की कई प्रक्रियाओं से गुजरा है। यहां के शासकों ने समय-समय पर आवश्यकतानुसार निर्माण करवाए तथा इसकी शान शौकत में अभिवृद्वि की।

इन निर्माणों में शासक के साथ-साथ यहां के सूत्रधारों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। शिल्पियों के कुछ विशिष्ट परिवारों का उल्लेख 15 वीं शताब्दी में मिलता है। चित्तौडग़ढ़ की विस. 1485 की प्रशस्ति में सूत्रधार वीजल के पुत्र माना और माना के पुत्र वीस का उल्लेख मिलता है। ऐसे उल्लेख भी मिलते हैं कि मान के लिए कई सुंदर प्रासाद बनवाए गए। दूसरा उल्लेखनीय सूत्रधार परिवार मंडन का था।

ऐसा माना जाता था कि मंडन के पिता खेता को गुजरात से बुलाया गया था। हालांकि कुछ लोग इस बात को सत्य नहीं बताते हुए कहते हैं कि क्योंकि स्वयं मंडन ने अपने ग्रंथों में श्री मदेश मेटपाटाभिधानेक्षेत्राख्योड भूतू सूत्रधारो वरिष्ठ: वर्णित किया है। जिसमें खेता को मेवाड़वासी बतलाने पर गर्व प्रकट किया गया है। मंडन के छोटे भाई नाथा ने वास्तुमंजरी की रचना की। मंडन के पुत्र गोविंद ने तीन ग्रंथों का संपादन किया था। यथा- कलानिधि, उद्वारधारिणी, द्वारदीपिका। वह महाराणा रायमल के समय में राज्याश्रित था। मंडन के दूसरे ईशर का उल्लेख जावर की विक्रम संवत 1554 की प्रशिस्त में है। उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित खतरगच्छ के एक लेख में ईशर के पुत्र छीतर का उल्लेख है। 
चित्तौड़ की स्थापना का पर्व चित्तौड़ी आठम बुधवार को दीपदान, रंगोली व आतिशबाजी के साथ मनाया गया। नगरपालिका की ओर से आयोजित तीन दिवसीय महोत्सव का समापन भी आतिशबाजी व पुरस्कार वितरण के साथ हुआ। गुडएज क्लब व नगरपालिका द्वारा दीपदान से शहर व आतिशबाजी से आसमां जगमगा उठा।

आतिशबाजी और रंगोली अभियान  

गांधी चौक में गुडएज क्लब की ओर से गांधी चौक में आयोजित दीपदान व आतिशबाजी कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। इस मौके पर विधायक सुरेंद्रसिंह जाड़ावत, नगरपालिका चेयरपर्सन गीतादेवी योगी, पूर्व चेयरपर्सन आनंदकंवर सांदू, पूर्व चेयरमैन सुरेश झंवर, रमेशनाथ, गुडएज क्लब के संरक्षक हरिशंकर पांड्या, अध्यक्ष नारायण सोनी, प्रवक्ता मुकेश नाहटा, पूर्व अध्यक्ष अशोक सेन, युकां के पूर्व जिलाध्यक्ष प्रमोद सिसोदिया, युकां लोकसभाध्यक्ष गोविंद शर्मा, अरविंद ढीलीवाल, फादर जॉनी पी. अब्राहम, नवरतन पटवारी, पार्षद लक्ष्मण सेन, राजकुमार कुमावत, युसुफ भैया आदि मौजूद थे। इसके बाद गोरा-बादल स्टेडियम में चित्तौड़ी आठम के तीन दिवसीय महोत्सव के तहत चल रही फुटबाल प्रतियोगिता का फाइनल मैच शालीमार क्लब व प्रताप क्लब में हुआ, जिसमें शालीमार क्लब विजेता रहा। समापन समारोह में विजेता, उपविजेता टीम व सहयोगियों को पुरस्कार प्रदान किए गए। विधायक जाड़ावत, नपा चेयरपर्सन गीतादेवी, नगरपालिका उपाध्यक्ष संदीप शर्मा समेत पार्षद, खेलप्रेमी व नागरिक मौजूद थे। संचालन पारस टेलर ने किया।


लोक संगीत और प्रभात फेरी 
मंगलवार रात सुभाष चौक पर सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ। कार्यक्रम में सीमा मिश्रा एंड पार्टी जयपुर के कलाकारों ने प्रस्तुतियां दी। गायिका सीमा मिश्रा ने राजस्थानी गीतों की प्रस्तुतियां दी। वही अन्य कलाकारों ने भी राजस्थानी लोक नृत्य व मोरपंख नृत्यों की प्रस्तुतियां दी। मुख्य अतिथि कलेक्टर रवि जैन व विधायक सुरेंद्रसिंह जाड़ावत थे। अध्यक्षता जौहर स्मृति संस्थान के अध्यक्ष उम्मेदसिंह धौली ने की। इधर बुधवार को पालिका मंडल की ओर से दुर्ग तक प्रभात फेरी निकाली गई।


आओ मेहन्दी मांडे

दूसरे दिन मंगलवार सुबह साढ़े नौ बजे पालिका की ओर से गांधीनगर स्थित मेवाड़ गल्र्स कालेज में मेहंदी प्रतियोगिता हुई। प्रतियोगिता में कुल 29 प्रतिभागियों ने मेहंदी से कलाकृतियां बनाई। 


चेयरपर्सन गीतादेवी योगी, आयुक्त दिलीप गुप्ता, समिति सदस्य रमेश लढा, सोनल मीणा, आशा तडबा, मधु अजमेरा, साजेदा खानम, चंदनबाला मोदी आदि ने भाग लेने वाले प्रतिभागियों को स्मृति चिन्ह भेंट किए। मेंहदी प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पर ललिता बिडला, द्वितीय नीलम स्वर्णकार, तृतीय स्थान पर नेनाकंवर रही। प्रीति अग्रवाल, दिव्या जैन, कृष्णा वैष्णव, करूणा बसेर, भारती बसेर के द्वारा बनाई गई रचनाएं काफी अधिक प्रशंनीय होने पर पालिकाध्यक्ष ने सभी को भी इन तीनों प्रतिभागियों के साथ-साथ प्रथम व द्वितीय व तृतीय के अलावा चित्तौड़ी आठम महोत्सव समारोह के समापन पर सांत्वना पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की। 



गोरा बादल स्टेडियम में चल रही फुटबाल प्रतियोगिता में सोमवार शाम दो मैच हुए। जिसमें दोनों ही मैच रोमांचक रहते हुए इसमें यूनिट स्पोटर्स क्लब ने मेवाड़ यूनिवर्सिटी को ट्राई बे्रेकर व नवनीत फुटबाल क्लब ने मेवाड़ फुटबाल क्लब ट्राई बे्रेकर से विजयी रहा। मंगलवार सुबह तीन मैच हुए। जिसमें शालीमार क्लब ने 3-0 से यूनिटी स्पोटर्स को तथा प्रताप क्लब दुर्ग ने 4-0 पापुलर क्लब सावा को हराया। मंगलवार सुबह खेले गए मैच के मुख्य अतिथि इंटक जिलाध्यक्ष घनश्यामसिंह राणावत रहे। समिति सदस्य कैलाश पंवार, राजकुमार कुमावत, मोहम्मद युसूफ, अमानत अली, अरूण कंडारा, महेन्द्रसिंह मेडतिया, शकुंतला मालू उपस्थित थे।

रपट दैनिक भास्कर से साभार
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