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रमेश उपाध्याय जी की एक सटीक कविता

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on मंगलवार, मई 31, 2011 | मंगलवार, मई 31, 2011

(हमारे समय के वरिष्ठ साहित्यकार रमेश जी उपाध्याय की एक कविता जो हमें बेहद पसंद आई.आम आदमी के नज़रिए को सटीक तरीके से कागज़ पर उकेरती हुई प्रतीत होती है.हमारे आस-पास को हम कितने तरीके से देखते हैं ये बात बहुत गहन विचार के साथ यहाँ पढी-समझी जा सकती है-सम्पादक )

छँटाई

एक आदमी ज़िंदगी भर जूते गाँठता है या उन पर करता है पॉलिश
एक आदमी ज़िंदगी भर कपड़े धोता है या उन पर करता है प्रेस
एक आदमी सिर पर बोझा ढोता है या ढोता है रिक्शे पर सवारियाँ
एक आदमी सड़क बुहारता है या कूड़े के ढेर में ढूँढ़ता है बिक सकने वाली कोई चीज़

ये और इन जैसे तमाम आदमी
और वे तमाम औरतें जो इन्हीं की तरह करती हैं ऐसे तमाम तरह के काम
कभी कलाकार नहीं माने जाते जबकि होते हैं वे अपने-अपने ढंग के कलाकार ही
उनका भी एक शिल्प होता है और होती है उनकी भी एक शैली
उनकी भी होती है एक भाषा जिसमें बनता है उनका काम एक रचना
उस रचना का भी होता है एक कथ्य और एक रूप
उसमें भी होती है सोद्देश्यता, सार्थकता और प्रासंगिकता भरपूर

लेकिन कोई उनकी कला की चर्चा नहीं करता
कोई नहीं आँकता उनका मूल्य
कोई नहीं लिखता उनका इतिहास और कोई नहीं होता उनका नामलेवा
क्योंकि उन्हें कलाकार ही नहीं माना जाता।

मगर क्यों?

इसलिए कि वे तो बहुत हैं
इतनों की कला कौन देखे कौन परखे?
इसलिए देखने-परखने वाले करते हैं छँटाई और बनाते हैं सिद्धांत

पहला सिद्धांत :
कलाकार तो लाखों में कोई एक ही होता है (मतलब, लाखों छाँट दिये!)
दूसरा सिद्धांत :
कारीगर कलाकार नहीं होते (मतलब, करोड़ों छाँट दिये!)
तीसरा सिद्धांत :
कलाकारों में भी सब श्रेष्ठ नहीं होते (मतलब, अरबों छाँट दिये!)
चौथा सिद्धांत :
श्रेष्ठ कलाकारों में भी सब महान नहीं होते (मतलब, खरबों छाँट दिये!)

इस तरह वे छँटाई करते जाते हैं
जब तक कि कलाकारों की संख्या उनके लिए मैनेजेबल न हो जाये
और इस तरह जो दो-चार या चार-पाँच या पाँच-सात नाम बचते हैं
उनमें से भी वे छाँटना चाहते हैं सर्वश्रेष्ठ
और सर्वश्रेष्ठ होता है वह जो उनकी अपनी कसौटी पर खरा उतरे
और कसौटी होती है उनकी अपनी-अपनी अलग
जिससे आगे भी छँटाई की गुंजाइश बनी रहती है!

उनके ब्लॉग से साभार ली गयी जिसका लिंक ये रहा.
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