अपने समय के सच को पहचानने की जिद है शैलेन्द्र चौहान की कविताएँ - अपनी माटी

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शुक्रवार, मई 27, 2011

अपने समय के सच को पहचानने की जिद है शैलेन्द्र चौहान की कविताएँ

'अपनी माटी' वेब पत्रिका का मान बढाने वाले कवितायेँ आज यहाँ प्रस्तुत है,जो हमारे वरिष्ठ कवि शैलेंद्र जी ने हमारे आग्रह पर हमें भेजी है.सूरज पालीवाल जी द्वारा शैलेन्द्र जी की कविताओं पर अपनी समीक्षात्मक दीर्ग टिप्पणी के साथ यहाँ हम उन्हें प्रकाशित कर रहे हैं.जो वर्तमान में अधिष्ठाता हैं.उनसे संपर्क हेतु पता है- साहित्य विद्यापीठमहात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय,वर्धा- 440 001

शैलेंद्र चौहान की कविताओं में मध्यवर्गीय उदासी या सब कुछ न पाने की निराशा न होकर अपने समय के सच को पहचानने की जिद है और उसे व्यक्त करने की बेचैनी है । मैं नहीं कहता कि यह जिद और बेचैनी शैलेंद्र चौहान को जीवन में क्या देगी लेकिन यह तो तय है कि अच्छे कवि के रूप में उनकी पहचान को बढ़ायेगी । इसलिये वे निर्द्वंद्व होकर कहते हैं ' अपनी छोटी दुनिया और /छोटी-छोटी बातें /मुझे प्रिय हैं बहुत /करना चाहता हूं /छोटा-सा कोई काम । कुछ ऐसा कि /एक छोटा बच्चा /हंस सके /मारते हुये किलकारी । एक बूढ़ी औरत/कर सके बातें सहज /किसी दूसरे व्यक्ति से /बीते हुये जीवन की । मैं प्यार करना चाहता हूं /खेतों , खलिहानों /उनके रखवालों को । एक औरत का /जिसकी आंखों में तिरती नमी /मेरे माथे का फाहा बन सके । मैं प्यार करना चाहता हूं तुम्हें /ताकि तुम /इस छोटी दुनिया के लोगों से /आंख मिलाने के /काबिल बन सको ।'  यह छोटी दुनिया किन लोगों की है कहने की जरूरत नहीं । पर कवि बार-बार इन्हीं लोगों की दुनिया में रहना चाहता है , उनके दुख-दर्दों के साथ आत्मीय रिश्ता बनाकर उन्हें व्यक्त करना चाहता है और चाहता है कि ऐसे लोगों की दुनिया चमत्कार और चकाचौध में अंधे हो रहे तथाकथित लोगों से आंख मिलाने की हिम्मत कर सके । कविता हिम्मत दिलाने का काम करती है इसलिये कवि यह चाहता है । जो लोग कविता की ताकत और उसकी अभिव्यक्ति की मार से मुंह मोड़े हुये हैं, उन्हें कविता में छुपी इस ताकत को पहचानना चाहिये । यह ताकत दुहरे जीवन से नहीं आती, कविता की पंक्तियां केवल लेखनी से नहीं फूटतीं बल्कि वे निजी जीवन के संघर्षों और ईमानदार प्रतिबद्धता से निकलती हैं । ऐसा जीवन चुनौतियों भरा है , इसके लिये खोना अधिक पड़ता है । विरले ही कवि ऐसा जीवन जीते हैं - निराला और मुक्तिबोध इसलिये बड़े हैं कि उनके यहां जीवन का ताप और संघर्ष है , ऐसी दुनिया का वरण है जिसमें धूप अधिक और छांव बहुत बहुत कम है । पर दिक्कत यह है कि हम उदाहरण तो ऐसे बड़े कवियों के देते हैं और जीवन में आचरण उनके विपरीत करते हैं । ऐसी स्थिति में कविता कहीं छूट जाती है । शैलेंद्र चौहान के यहां स्थिति दो टूक साफ है इसलिये वे कहते हैं ' त्रासदी है मात्र इतनी /सोचता और समझता हूं मैं /अभिव्यक्त करता भाव निज / सुख-दुख और यथास्थिति के /पहचानता हूं , हो रहा भेद /आदमी का आदमी के साथ /प्रतिवाद करना चाहता हूं /अन्याय और अत्याचार का । किंतु व्यवस्था /देखना चाहती /मुझे मूक और निश्चेष्ट । नहीं हो सका पत्थर मैं /बावजूद , चौतरफा दबावों के /तथाकथित इस विकास-युग में ।' यह शैलेंद्र चौहान की त्रासदी नहीं है बल्कि आत्मविश्वास है । उनके जीवन में कोई खोट नहीं है, द्वैत नहीं है इसलिये वे अपनी बात साफ-साफ कहते हैं । वे सोचते हैं, विचारते हैं इसलिये उनकी कविता में इतनी ताकत है । वरना कवियों के पास अब कहने को बचा ही क्या है ?

एक कवि को अपने समय और अपने इर्दगिर्द का ध्यान रखना चाहिये , उन परिस्थितियों की बारीक जांच करनी चाहिये जिनकी वजह से अमानवीय स्थितियां बन रही हैं । वह केवल अपने लिये ही कविता नहीं कर रहा बल्कि अपने समय और समाज को भी रूपायित कर रहा है । जिन लोगों को यह गलतफहमी है या गलतफहमी बनाये रखना चाहते हैं कि कविता स्वांत: सुखाय होती है, उन्हें तुलसीदास की प्रसिद्ध कृति रामचरितमानस के बालकांड और उत्तरकांड को अवश्य पढ़ना चाहिये कि तुलसी बाबा कैसे अपने समय के निर्गुणियों और शासन व्यवस्था पर बरसते हैं । इतने शांत और संत तुलसी बाबा कविता की ताकत पहचानते थे, इसलिये उन्होंने उन प्रवृत्तियों का खंडन किया है, उन्हें खारिज किया है जो मनुष्य के विरोध में जा रही थीं शैलेंद्र चौहान स्त्रियों की स्वतंत्रता, पुरुषों की सामंती मानसिकता तथा घर परिवार की कविताएं लिखते हैं । मां और पत्नी को वे कविताओं में भी नहीं भूले हैं । कई बार बड़ी बड़ी बातों के चक्कर में घर परिवार छूट जाता है । लेकिन शैलेंद्र चौहान के यहां मां पर लंबी कविता है और पत्नी पर दो कविताएं । एक कविता है 'अस्मिता ' जिसमें वे पत्नी के सपनों के विस्तार को देखते हैं ' आंगन में खड़ी पत्नी /जिसके सपने दूर गगन में /उड़ती चिड़िया की तरह ।' तथा 'हां, मैं तुम पर कविता लिखूंगा / लिखूंगा बीस बरस का / अबूझ इतिहास / अनूठा महाकाव्य / असीम भूगोल और / निर्बाध बहती अजस्त्र / एक सदानीरा नदी की कथा । ... सब कुछ तुम्हारे हाथों का / स्पर्श पाकर /मेरे जीवन-जल में / विलीन हो गया है । ' ये दो आत्मीय कविताएं पत्नी पर , जिसमें शैलेंद्र चौहान अपनी सारी कविताई उड़ेल देते हैं ।

हमारे बड़े कवि केदारनाथ अग्रवाल ने प्रेम कविताएं अपनी पत्नी के ऊपर लिखीं और हमारे बड़े आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने पत्नी को कितना महत्व दिया इसे कौन नहीं जानता । शैलेंद्र चौहान की पत्नी पर लिखी ये दोनों कविताएं उसी परंपरा को आगे बढ़ाती है ।ढेरों कविताओं के इस दौर में , ढेरों कवियों की इस जमात में किसी भी कवि के लिये पहचान बना पाना कठिन है लेकिन शैलेंद्र चौहान अपनी पहचान बना पाये हैं क्योंकि उनकी कविता प्रचलित मानदंडों के विरोध में खड़ी हैं । मैं मानकर चलता हूं कि किसी की नकल करके कोई बड़ा नहीं बनता बड़ा बनता है अपने अनुभवों और जीवन संघर्षों को अपनी तरह से रूपायित करके । शैलेंद्र चौहान ने अपनी कविताओं में यही किया है।



विरासत 

गाँव में हुआ जब 
पहला खूनए
पहली डकैतीए
पहला बलात्कार

यद्यपि कुछ भी 
पहली बार नहीं हुआ था
उनकी याददाश्त की 
समय सीमा ही थी वह

सन्न थे सब
अवाक !
लगा था उन्हें आघात 
भय से पीले पड़ने की 
हद तक
धीरे.धीरे वे सहज हुए 
फिर बाद को 
उनकी संतानें
अभ्यस्त हो गईं 
ऐसी वारदातों की
  .........

विवश पशु 

चरागाह सूखा है
निश्चिंत हैं हाकिम.हुक्काम
नियति मान 
चुप हैं चरवाहे
मेघ नहीं घिरे
बरखा आईए गई
पशु विवश हैं
मुँह मारने को
किसी की खड़ी फसल में
हँस रहे हैं
आकाश में इन्द्र देव
    .........

अतीत

इतने डरावने भी नहीं थे
सब दिन
ललमुनिया नाचती थी
पहन कर लाल लहंगाए
लाल चूनर

चिडि़या सी फुदकती
लचकती बेल सी 
बच्ची सी चहकती
जवान ललमुनिया 
(किशोरी भी हो सकती है)
मजा ला देती

किसी ने उसका
हाथ नहीं पकड़ा
पैसे नहीं फैंके
किसी ने नहीं कहा
'हाय मेरी जान ' 
नहीं कहा किसीने रात रुकने को
उल्टे भूरे काका ने
सर पर हाथ रखकर
ढेरों आशीर्वाद दिए
बहू की एक धोती दी
डेढ़ मन अनाज दिया

कसे हुए जवान,पट्ठे बैलों को
छकड़े में जोतकर
चारों तरफ कपड़ा लगा
बेटी की तरह ललमुनिया को 
बिदा किया
ललमुनिया की आँख से
बह निकला समुँदर 

दो बूँदें उँगली से झटक
काका ने लगाई 
एड़ बैलों को 
 .........
परिवर्तन

कई बार 
झुंझलाया हूँ मैं 
सड़क के किनारे खड़ा हो
न रुकने पर बस
गिड़गिड़ाया हूँ कई बार
बस कंडक्टर से
चलने को गाँव तक
हर बार
कचोटता मेरा मन 
कसमसाता
आहत दर्प से गुज़रता मैं 
तेज़ गति वाहनों से 
देखता इंतज़ार करते
ग्रामवासियों को
किनारे सड़क के
नहीं कचोटता मन
न आहत होता दर्प 
सोचता
नहीं मेरे हाथ में लगाम
न पैरों के नीचे ब्रेक
नहीं
अब कोई अपराध बोध भी नहीं
मेरे मन में 
 .........
कोंडबा 

कर रहा यह कौन ध्वनि
खच.खच की यहाँ
किस तरफ़
पार्श्व में
दाएँ या बाएँ

सामने दीख पड़ता नहीं कुछ भी
दूर तक
चहारदीवारी ऊँची
पृष्ठ भाग में सड़क एक
पतली.सी

काटता कोई हेज या
गुलाबों की टहनियाँ
दे रहा आकार छोटे.छोटे
रूपहले पौधों को
दोनों हाथों से चलाता
लचीला टीन की तलवार
घास और खरपतवार
कर रहा साफ़
सुनाई दे रही ध्वनि लगातार
कौन है वह
श्रमिक,सैनिक,चौकीदार,

ध्वनियों का
नित्य प्रति का साथ
बाग में माली
लकड़हारा जंगल में
मजदूर
सड़कों,इमारतों के बनाने में

ठक ठक वसूले की
गैंती की धप्प
खर.खर आरा मशीनों की
मोटरगाड़ियों के इंजिनों का शोर
कारखानों में लोहपट्टों का
गलना और ढलना
हथोड़े की मार
उत्पादन अनेक किस्मों के
गोरैया की चिऊं चिऊं
कठफोड़वा की खट.खट
रंभाना गायों का

फंतासी नही यह
न रहस्य ही कोई घना
बहुत ही सरल और साधारण
यह तथ्य
वास्तविक और सच

पीछे पतली सड़क के किनारे
बारिश में उगी घास वह छीलता
फावड़े से अनथक
वृद्ध आदिवासी वह गौंड़

जानता हूँ वर्षों से उसे
देखता घास ढ़ोते हुए
खींचते कचरे की टूटी हुई ठेली
नालियों का साफ़ करते मैल
संभ्रांत लोगों के घरों से
चमकाते बाथरूम और
लेटरिन की टाइलें,कमोड़

उम्र पचहत्तर वर्ष
नाम कोंडबा
दिखा नहीं सकते दया भी उस पर
अदम्य बल उसके देह,जांगर में

बहसें संसदों और असेम्बलियों
निरंतर होती हों जहाँ
सबल नागरिकों के पराभव को
वैध साबित करने की
पेप्सी,कोकाकोला को निर्मल
बताने की

रिश्वतों को रक्षानुकूल,सैनिकानुकूल
बनाने की
तब इस राष्ट्र में कोंडबा के
नागरिक पराभव का खाता
कौन ऑडिट करेगा.

हाथ, घुटने, पेट की तकलीफ का
बीमा कहाँ होगा
कौन मरने पर कोंडबा के
शोक प्रस्ताव लाएगा
प्रेस में जाएगा कहने कौन
देश की भारी क्षति हुई है
न रहने पर कोंडबा के
चलती रहेगी घास पर तलवार उसकी
घास बढ़.बढ़ कर कटती रहेगी
बढ़ती रहेगी

बहस संसद में चलती रहेगी
देशहित में
कोंडबा जीता रहेगा
मरता रहेगा
अनजान संसद से
संसद भी जारी रहेगी
बेअसर अनजान
अस्तित्व से उसके 
  .........

थार का जीवट 

अब तक तो
बहुत भला है
रेती में भी पौधे हैं
कांस,आक और
छोटे.छोटे लंबे पत्तों वाले
नन्हे 'जोजरू'

अब तक तो
बहुत भला है
लू की मार है मद्धम
है हवा भी थोड़ी नम

क्या होगा जो मेघ नहीं बरसे
सावन सूखा जाएगा
मरुधरा यह ताप से फट.फट जाएगी

वनस्पतियाँ सूखेंगी
नर.नारीए पशु.पक्षी सब
प्यास से तड़पेंगे
कितना कष्ट सहेंगे
आसार नहीं अच्छे हैं

पर कितना जीवट है!
कहता है वह वृद्ध.
विपदाएँ झेलीं
न जाने कितनी बार
बना महाप्रलयंकारी
यह थार 

वरिष्ठ कवि शैलेन्द्र चौहान का 
पता- ३४-२४२, प्रतापनगरए सेक्टर.३,
जयपुर,राजस्थान. 303033

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