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जनवादी चित्रकार चित्तप्रसाद को याद करते हुए वरिष्ठ चित्रकार अशोक भौमिक

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, मई 22, 2011 | रविवार, मई 22, 2011

चित्तप्रसाद एक प्रगतिशील चित्रकार ही नहीं थे, वह सक्रिय राजनीतिक कर्मियों की पहली कतार पर तैनात एक सजग सिपाही भी थे। भारतीय चित्रकला के इतिहास में उनके जैसा दूसरा उदाहरण नहीं है। 15 मई, 1917 में बंगाल के दक्षिण 24 परगना के नैहाटी शहर में उनका जन्‍म हुआ। उनका परिवार अत्‍यंत शिक्षित परिवार था। उनकी मां ने आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों की कई तरह से मदद की थी। बीए की परीक्षा पास करने के बाद चित्तप्रसाद सक्रिय रूप से चित्रकला, संगीत, नाटक आदि कलाओं की ओर झुके। यहां उल्‍लेखनीय यह है कि उन्‍होंने चित्रकला में कोई शिक्षा नहीं ली। वह 1942 में भारतीय कम्‍युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने थे।
वर्ष 1942-43 में बंगाल के मिदनापुर और चिटगांव इलाके में उन्होंने महाअकाल के विकराल रूप को बेहद करीब से देखा और इस इलाके में घूम-घूम कर स्केचेस बनायें और रिपोर्ताज लिखे जो ‘पीपुल्स वार’ में नियमित प्रकाशित होते रहे। इन प्रकाशनों के जरिये चित्तप्रसाद ने पत्रकारिता के एक सर्वथा नये आयाम से पाठकों को परिचित कराया।
1944 (20-27 दिसंबर) में पार्टी द्वारा मुंबई के खेवाड़ी स्थित ‘रेड फ्लैग हॉल’ में आयोजित ‘ भूखा बंगाल’ चित्र प्रदर्शनी में चित्तप्रसाद के चित्र दिखे, साथ ही पी.पी.एच. ने चित्तप्रसाद द्वारा लिखी पुस्‍तक ‘हंगरी बंगाल’ प्रकाशित की। इसके प्रकाशन के तुरंत बाद सरकार ने इसे प्रतिबंधित घोषित कर इसकी सारी प्रतियाँ जला दीं।
मुंबई प्रवास के दौरान वह फिल्‍म से जुडे़ लोगों, कवियों, चित्रकारों, गायकों के बहुत चेहते थे। नेमीचंद जैन, रेखा जैन, शमशेर बहादुर सिंह आदि रचनाकारों के साथ-साथ बलराज साहनी, सलील चौधरी जैसे लोगों और पंजाबी के प्रसिद्ध लेखक सुखबीर जी से भी इनका अच्‍छा परिचय था। हिन्‍दी फिल्‍म के इतिहास में विमल राय की महत्‍वपूर्ण फिल्‍म ‘दो बीघा जमीन’ का वुडकट के माध्‍यम से बनाया गया पोस्‍टर निश्चित रूप से ऐतिहासिक महत्‍व रखता है।
1946 के नौसेना विद्रोह में हम चित्तप्रसाद को नौसैनिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाये न केवल सड़कों पर देख पाते हैं, साथ ही इस विद्रोह के समर्थन में उनके द्वारा बने गये यादगार चित्रों और पोस्टरों में हम चित्रकला के एक ऐसे जुझारू स्वरूप को देख पाते हैं जिसे केवल जन आंदोलन को देख कर नहीं, बल्कि उसमे सशरीर शरीक होकर ही रचा जा सकता है। इसी चित्रकार को हम एक ओर जहाँ बंगाल के तेभागा किसान आन्दोलन के करीब जाकर चित्र रचते पाते हैं , वहीँ 1946 के जून महीने में आंध्र प्रदेश के तेलंगाना सशस्त्र किसान आन्दोलन के केंद्र तक पहुँच कर एक अभूतपूर्व चित्र श्रृंखला बनाते पाते हैं। इस चित्रकार को हम महाराष्ट्र के कोल्हापुर में आये सूखे के दौरान किसानों के करीब पाते हैं, विजयवाडा़ अखिल भारतीय किसान सम्मलेन (1944) में श्रोताओं के बीच बैठ कर चित्र बनाते पाते हैं, मुंबई की बस्तियों में रह रहे गरीब बाल श्रमिकों की व्यथा कथा को कैनवास पर उतारते पाते हैं।
इसके साथ ही उन्होंने जन आंदोलनों के एक सजग इतिहासकार के रूप में अपने चित्रों में कश्मीर-आन्दोलन, भगत सिंह की शहादत, डाक कर्मचारियों और रेल कर्मचारियों के आंदोलनों को अमर भी किया है।
हमारे देश में सभी चित्रकारों के साथ कोई-न-कोई प्रान्त जुड़ा हुआ है। राजा रवि वर्मा, यामिनी राय, नन्दलाल बोस से लेकर प्रायः सभी समकालीन चित्रकारों पर इस पहचान को सहज ही देखा जा सकता है, पर एक आधुनिक चित्रकार अपने राजनीतिक-सामजिक सरोकारों के चलते प्रान्तों और प्रदेशों की सीमा के पार जाकर एक जनपक्षधर चित्रकार बन सकता है, इसकी मिसाल हम केवल चित्तप्रसाद में ही पाते हैं। सही मायने में भारतीय चित्रकार कहलाने के हकदार शायद चित्तप्रसाद ही हैं।
देश के विभिन्न जन आंदोलनों पर बनाये गये चित्तप्रसाद के कुछ यादगार चित्रों से मौजूदा बाजारवाद की गिरफ्त में कैद जनता से पूरी तरह से कट कर अराजक पूंजी के सहारे पनपती समकालीन कला को बेहतर पहचानने मे मदद मिेलती है।
चित्तप्रसाद ने जन आंदोलनों के साथ रह कर असंख्य चित्र बनाये थे, यह हम सब जानते हैं, पर गरीब बच्‍चों पर, खासकर उनकी जिन्‍दगी की बदहाली पर उनके चित्र बेहद महत्वपूर्ण हैं। विश्‍व कला के इतिहास में बच्‍चों के चित्र बहुत कम हैं। भारतीय कला में देवताओं के बाल रूप और शिशु राजकुमारों के चित्रण के अलावा बच्चों को हम बहुत ही हम उपस्थित पाते हैं। पाश्‍चात्‍य कला में भी फरिश्‍ते के रूप में डैनों वाले नंगे बच्‍चे दिख जाते हैं, पर वे चित्रों के मूल विषय नहीं बनते हैं। चित्तप्रसाद ने अपनी चित्र श्रृंखला ‘Angels without Fairytales ‘ के केंद्र में बच्चों को रखकर उन्हें नायक का अपूर्व दर्ज़ा दिया है। अनाथ बच्चों के एकाकीपन के लिये जहाँ चित्तप्रसाद एक दीया और एक खेले जाने के लिये इंतज़ार करती गुड़िया को कमरे में संयोजित कर चित्र को इतना मार्मिक बनाते हैं, वहीं होटलवाला बच्चा देर रात होटल के बंद हो जाने के बाद अकेला बर्तनों के ढेर से जूझ रहा है। साथ में एक रतजगा कुत्ता है, एक तिरछी लौ वाली ढिबरी है और फर्श पर रेंगते बहुत सारे तिलचट्टे हैं, पर इन सब के बावजूद कितना अकेलापन है यहाँ !

गहरी रात को फुटपाथ पर कथरी ओढ़े बच्चों के बीच गुजरता कुत्ता क्या इन बच्चों के मुकाबले अपनी जिन्दगी के बेहतर होने का ऐलान नहीं कर रहा है ? इन यादगार चित्रों में बच्चों के प्रति चित्तप्रसाद का गहरा प्रेम तो दिखता ही है, साथ ही ये भी साफ़ नज़र आता है कि इन चित्रों को चित्तप्रसाद ने बच्चों के लिये नहीं बनाया, बल्कि इन बच्चों के ऐसे हालात के लिये जिम्मेदार समाज को धिक्कारा है।
चित्तप्रसाद के चित्रों में महिलाओं का एक बेहद महत्वपूर्ण स्थान है। इन चित्रों में वे मेहनतकश पुरुषों के कंधे से कंधा मिला कर जीवन संघर्ष के समान हिस्सेदार के रूप में दिखती है। कोल्‍हापुर के सूखे में भी वे पुरुषों के पास हैं तो गारो पहाड़ में जंगली सूअर का शिकार करते हुए भी पुरुषों के साथ है। बांध बनाते हुए वे समान रूप से मेहनत करती है तो बाढ़ जैसी विपदा में समान रूप से पीडि़त है।
इप्टा के गठन के बाद एक नाट्य प्रस्तुति के ठीक पहले कामरेड शांति बर्धन नगारा बजा कर नाट्य प्रस्तुति का एलान कर रहे थे। चित्तप्रसाद ने उस मुहूर्त को अपने स्केच बुक मे कैद किया। बाद मे इसको आधार बना कर चित्तप्रसाद ने इप्टा का लोगो बनाया। भारत मे प्रगतिशील सांस्कृतिक कर्मियों के सपनों का प्रतीक यह चिन्ह हम सबको चित्तप्रसाद की याद भी दिलाता है।
चित्तप्रसाद के चित्रों को देखते हुए हम जनोन्मुख और अजिट-प्राप (agit-prop) कला के एक ऐसे रूप से परिचित होते है, जो चित्र होकर भी महज नारा या पोस्टर नहीं हैं। यहाँ शोषित-पीड़ितों के पास जाने का साहस है जो दरअसल कला के सामंती मानकों को चुनौती देने का साहस भी है। युगों से शास्त्रीय कला सामंतों और धनी कला व्यापारियों के बनाये हुए मानदंडों पर पनपती रही है, पर इसके समानांतर लोक कला अपने सहज सरल स्वरूप- गरीब किसान के आंगन में रंगोली-अल्पना बन या किसी लोक उत्सव के प्रांगण सज्जा के रूप तक ही सीमित रही। यह कला उत्सवधर्मी होकर भी जीवन से कटी हुई नहीं थी (इसका सबसे अच्छा उदाहरण वारली की लोक कला है )। इस कला मे मेहनत करते, शोषित होते लोगों का जिक्र तो है, पर राजनीतिक विचारों के अभाव के कारण इसमें प्रतिरोध का आह्वान नहीं है। चित्तप्रसाद इन दोनों कलाओं की गहरी जाँच-पड़ताल के बाद इनके विकल्प के रूप में एक तीसरी कला का अनुसरण करते हैं (इस सन्दर्भ में आधुनिक कला पर सामंती प्रभाव और गुफा चित्रों पर चित्तप्रसाद के दो महत्वपूर्ण लेखों को हम देख सकते हैं ) । चित्तप्रसाद की कला में मेहनतकश वर्ग का जहाँ शोषण का चित्रण है, वहीँ उनके प्रतिरोध की गाथा भी मौजूद है। वह वास्तव में संघर्षशील आम जनता के इतिहासकार होने के साथ-साथ संघर्ष की कथाओं के हरकारा भी हैं, जो बंगाल की कथा को महाराष्ट्र तक पहुचते हैं तो तेलंगाना जाकर भगत सिंह की चर्चा करते हैं।
उनके अनेक चित्रों में बार-बार मजदूर-किसान वर्ग के लिये एक विशिष्ट राजनीतिक एकता की पुकार दिखती है। जन आंदोलनों में वह कांग्रेस, कम्‍युनिस्ट पार्टी और मुस्लिम लीग के झंडे एकसाथ फहराते हैं, वहीं विभिन्न मोर्चों पर संघर्ष करते लोगों के बीच संकीर्ण साम्प्रदायिकता को गैर हाजिर पाते हैं और हर चित्र में स्त्री-पुरुष को हर संघर्ष में समान साझेदार बनाते हैं। मेहनतकशों की एकता हर स्तर पर हर कीमत पर चित्तप्रसाद के लिये सबसे जरूरी था जिसे उन्होंने अपने चित्रों में बार-बार रेखंकित किया।
उनके रंगीन चित्रों में कई पाश्‍चात्‍य चित्रकारों का प्रभाव देखा जा सकता है। इनमें मातिस और ब्रॉक प्रमुख हैं। यहां गौरतलब यह भी है कि रंगीन चित्रों में चित्तप्रसाद ने आनंद और सुख का उत्‍सव दिखाया है, वहीं उनके काले-सफेद चित्रों (या प्रिंट) में हमारे जीवन के कठोर यथार्थ को व्‍यक्‍त किया है।
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