डॉ. अरुण शर्मा की चुनिन्दा कवितायेँ - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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डॉ. अरुण शर्मा की चुनिन्दा कवितायेँ

(डॉ. अरुण शर्मा वर्तमान में माउंट आबू  में रहते हुए पर्यावरणविद के रूप में चर्चित होने के साथ ही विकलांग बच्चों और स्पिक मैके के हित कार्यरत हैं. पेशे से चिकित्सक अरुण जी कभी कभी कविता भी करते हैं. व्यंग्यात्मक शैली में लिखी उनकी कुछ कवितायेँ यहाँ प्रस्तुत हैं.उनसे संपर्क हेतु पता-'एकांत', शिवाजी मार्ग,माउंट आबू-307501,मोबाइल-9414153221,912974238577,-सम्पादक)

विडम्बना में जी रहे हैं
आज हमारे पास
भव्य आवास हैं
पर परिवार नहीं

आज हमारे पास
अधिक ज्ञान है
पर मूल्यांकन नहीं

हमारे पास
अधिक विशेषज्ञ  हैं
पर उससे कहीं ज्यादा समस्याँएँ  हैं

औषधियाँ भी पहले से कहीं
बहुत अधिक हैं
पर स्वास्थ कल्याण व्यथित है

हम पागल की भाँति व्यय करते हैं
कम हँसते हैं
क्रोध अधिक करते  हैं
तेज वाहन चलाते हैं
देर से सोते हैं
और देर से उठते हैं
और थके थके
सारी उम्र
स्वयं को ढोते हैं
जिसके तर्क में
बिना पढ़े
अधिक टीवी देख
खुद उलझते हैं
और औरों को भी उलझाते हैं
और इस तरह
वाचाल से
कम सुनते हैं
अधिक सुनाते हैं
और जहाँ चूक जाते हैं
वहाँ
मिथ्या का सहारा ले
साफ़
निकल जाते हैं
और इस तरह से
एक अजीब सी जीविका बनाते

हम जीना ही भूल गए  हैं
कि जिंदगी में
साल तो जोड़ दिए
पर सालों से जिंदगी निकाल दी

इन कम जिंदगी वाले सालों में
हमारे पास
गगनचुम्बी अट्टालिकाएँ हैं
बौना सब्र है
चौड़े रास्ते हैं
संकीर्ण दृष्टिकोण है

जिसके साथ
हम चाँद पर तो पहुँच गए
पर खुद से दूर हो गए

अंतरिक्ष को जीत लिया है
पर
अंतर्मन को खो दिया है

हमने अणु को भेद दिया है
अपने पूर्वाग्रहों को नहीं

इस तरह से हम जल्दबाजी तो बहुत करते हैं
पर विलम्ब सब में होता है
क्योंकि
हमरी नैतिकता सिकुड़ती जा रही है
जैसे जैसे
हमारी सम्पन्नता  बढ़ती जा रही है
जिसमें हमारे अपने खो गए हैं
क्योंकि हमारे सम्प्रेषण के साधन बढ़ गए हैं

जिनमें लम्बे होते लोग
बौने चरित्र को पोष रहे हैं
हर सुख से सजे
जीवन में चैन खो रहे हैं
आय बढ़ाते
विच्छेद  हो रहे  हैं
ये हम
अदभुद विरोधाभास की
विडम्बना में जी रहे हैं!

 सब धन कुबेर हैं

सब धन कुबेर हैं
किन्तु उनके मन में
दूध से स्वेत लिबास में
धुप्प अंधेर है
जिसमें उनकी 
सड़ती हुईं 
आकांक्षाओं का 
न ख़त्म  होने वाला
ढेर है
जिसपे उन्होंने 
एक मोटी सफ़ेद चादर बिछाई है
जिसपे बैठ के 
वो अपनी क्षुधा शांत कर रहे  हैं
और प्रवचनों के बीच
ध्यान में डूबे
एक अलोक को खोज रहे हैं
जिसका अस्तित्व ही खो गया है
उस ध्वान्त की मोटी परत में
जिसमें  छुपा रखे हैं
उन्होंने अपनी कृपणता के आयुध
जिनके  प्रहारों से  
वो सारा जग जीत लेना चाहते हैं
भले ही इस के लिए 
उन्हें अपना सर्वस्व क्यों न खोना पड़े!

धूप के तन पर हल्दी सी उबटन
 
धूप के तन पर हल्दी सी उबटन 
करदी है अमलतास ने,
लाल छींट की हरी चुनडिया 
पहनी है गुलमोहर ने!
 
गर्मी के रंग हज़ार,
चटकीली है ये बहार;
चम्पा की कश्ती पे सवार,
चाँदी के ले पतवार;
पायें सपनो का संसार,
हर मुश्किल को तार;
वहीं है सुखी संसार,
पेड़ों पे है जहाँ बहार;
स्वर्ग के वहीं हैं द्वार
वनजीवों से जहाँ प्यार!
 
धूप के तन पर हल्दी सी उबटन 
करदी है अमलतास ने,
लाल छींट की हरी चुनडिया 
पहनी है गुलमोहर ने!
 
मेरे साथ ही क्यों 

मेरे साथ ही क्यों 
मेरा भोलापन
अब ढोए हुए है
एक न मिटने वाला सूनापन 
जिसमें मेरी कोई गलती नहीं
सिर्फ इसके कि
मैं लाचार हूँ बल से
जिसे उसने छल से
फिर एक पाशविक बल से
ऐसे दबोच लिया कि
मेरा कुछ भी नहीं बचा 
  
मैं कभी नहीं  भूल सकती 
मेरा सूनापन और उससे जुड़ा दर्द
वहाँ जहाँ प्यार था
विश्वास था
वहाँ अब केवल खालीपन है

मैं उसे माफ़ नहीं कर सकती
उसने मेरा सर्वस्व छीन लिया
मेरा अबोधपन
मेरी सरलता
मेरा भरोसा

और भर दिया है
एक अनंत सूनापन
पीड़ा के कीड़ों से भरा
डरा डरा
बेबस चीखों से भरा
जैसे किसी महामारी के चुंगल में धरा

किन्तु जो भी हो
माना मेरा सब कुछ गया है खो
पर इसमें मेरी कोई भूल नहीं
वो सारी की सारी
उसकी भूल थी
उसका पाप था
जो वो बेहेरा हो गया था
मेरी हर चीख पे
मेरी हर चिरौरी  पे
मेरी हर प्रार्थना पे
मेरी हर बेबस ना-ना-ना पे
कि
ये सारा पाप उसका है
अपराधी तो वो है
उसे ही भुगतना होगा पाप का दंड
इसलिए
उसे मैं
मृत्यु दंड देती  हूँ 

क्योंकि सब जान जाएँ 
कि
एक दरिंदा धरती पर रेंग रहा है
उसे कुचलना  
एकमात्र धर्म रह गया है
अन्यथा
उसकी बदबू
उसका भय
उसका एहसास
हर उजाले में
हर अँधेरे में
हर सूने में
हर कोलाहल में बना रहेगा
विशेषकर भीड़ में
हर विश्वास  की
खोखली  होती रीढ़ में
घर में
बाहर  में
रेल में, जेल में
नीरवता में
हर खेल में
मसल दिए  जाने के लिए
सिगरेट की तरह
जिसे
भंगार वाले भी नहीं उठायेंगे!

 अफीम की तरह 

जो अंतिम प्रतियोगिता
वाद विवाद की
जो मैंने जीती
वो नाभिकीय के खिलाफ थी
और सोचा था कि
अब देश ये गलती तो नहीं करेगा

पर जल्द ही
हमने विश्व में
अपनी हेंकड़ी के लिए
पहला नाभिकीय बम्ब
विस्फोट करदिया
और देशको एक
भ्रान्त मद में
डुबो दिया
अफीम की तरह 

और एक बार फिर 
हम भूल गए 
चीन से हार
पकिस्तान को जीती जमीन लौटाने का व्यवहार
बंगलादेश में जीत के बाद
नब्बे हज़ार युद्ध कैदियों  को
लौटा देना हो दबाब में लाचार
यहाँ तक आगे बढ़कर उसे ये कारण देना
दूसरा विस्फोट कर  
कि अब वो असुरक्षित है
और पूरा संतुलन उसके  पक्ष में कर दिया
की वो भी अब नाभिकीय शक्ति बन जाएं
हमसे भय का बहाना बना

और ये ही नहीं
सब चिन्तितों के विरोध के बावजूद 
नाभिकीय ऊर्जा में भी डुबकी निश्चित करली
सारे अतीत के दुस्वप्न  भूल  
अमेरिका से लेकर जापान तक के
भूल चेर्नोबिल  का  तांडव भी
भूल
कि जापान के सुनामी की क्षति
जो सात मिनटों में हुई थी
सात महीनों में पूरी करली जा सकती है
लेकिन
नाभिकीय विष का प्रभाव
तो सदियों चल सकता है -

पच्चीस साल तो रूस को ही हो गए हैं
और क्या अभी तक 
हीरोशिमा और नागासाकी से उबर सका है जापान!



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