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''ऐसा साहित्य जो समाज से कटा हुआ हो, साहित्य हो ही नहीं सकता''-राजकुमार सचान ‘होरी’

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मई 22, 2011 | रविवार, मई 22, 2011

(प्रशासनिक दायित्वों के साथ-साथ साहित्य व सामाजिक क्षेत्र में प्रसिद्व पा चुके अब तक क़रीब दो दर्जन से अधिक पुस्तकों, काव्य ग्रंथों व बाबा साहब चरित मानस की रचना कर चुके ख्यातिलब्ध साहित्यकार समाजसेवी, वर्तमान में अपर आयुक्त आजमगढ राजकुमार सचान ‘होरी’ का मानना है कि यदि समाज में जारी विघटन को रोकने व सामाजिक समरसता, एकता भाईचारे को बढ़ाने के प्रयास न किये गये, जातियां न टूटीं तो देश टूट जायेगा। प्रस्तुत है श्री होरी से वरिष्ठ पत्रकार रिज़वान चंचल द्वारा किये गये साक्षात्कार के प्रमुख अंश:)

प्र.: होरी जी आप देश के प्रसिद्व हिन्दी साहित्यकार हैं। आप समाज सेवा को इतना महत्व क्यों देते हैं?

उत्तर: मैं साहित्य को भी समाजसेवा का अंग मानता हूं। ‘साहित्यम् इति साहित्यम्’ जो हित के लिए हो, वही साहित्य है। समाजसेवा से बड़ा हितकारी कार्य और क्या हो सकता है? हम साहित्य सृजन भी तो समाज के लिए ही करते हैं। ऐसा साहित्य जो समाज से कटा हुआ हो, साहित्य हो ही नहीं सकता।

प्र.: भारतीय समाज की मूल समस्या क्या है?

उत्तर: रिज़वान जी, मैंने इस देश के सदियों पुराने इतिहास, समाजशास्त्र, धर्म, दर्शन और संस्कृति का सांगोपांग अध्ययन किया है। बहुत बड़ा देश है। अनेक समस्याएं रही हैं, आज भी हैं। परन्तु इनके मूल में एक ही मूल तत्व है - भ्राता की भ्राता से दूरी। भ्रातृत्व, भाईचारे का अभाव। कहा जाता है कि अंग्रेज़ों ने डिवाइड एण्ड रूल का सिद्वांत अपना कर इस देष पर राज किया। बिलकुल सही। कार्य कारण का सिद्वांत तर्क और दर्शन का  सिद्वांत है। कहीं धुआं होगा तो वहां आग होगी। हम डिवाइड (बंटे) रहे हैं और आज भी हैं, शायद यही कारण है कि हम पर दूसरे शासन करते रहे। हमारा बंटे होना भी स्थायी प्रवृत्ति का है, दीवारें सख़्त हैं, यह हैं जातियों की दीवारें। जातियों में बंटे होना। जन्म से आधारित जातियों में बंटे समाज से एकता की अपेक्षा करना छलावा है। अतएव, मेरा पूर्ण अध्ययन, मनन, चिन्तन के पश्चात् एक ही मत है कि इस राष्ट्र की समस्त समस्याओं की मूल ‘जाति’ है। 

प्र.: क्या वर्ण व्यवस्था आरम्भ से नहीं थी?

उत्तर: नहीं, आर्यों के आगमन के पूर्व भी नहीं और उनके आगमन के सैंकड़ों वर्षों बाद भी नहीं। चारों वेदों में भी नहीं। उपनिषदों में भी नहीं। एक रोचक श्लोक वेद में बहुत बाद में स्मृति और पुराण काल में डाला गया जिसमें ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मणों, बाहुओं से क्षत्रिय, पेट से वैश्य और पैरों से शूद्र के जन्म की बात कही गई है जो नितान्त अवैज्ञानिक, अप्राकृतिक है। स्तनपायी जीवधारियों ;जिसमें मनुष्य भी हैद्ध का जन्म मात्र योनि मार्ग से ही हो सकता है, बाक़ी बकवास है।

प्र.: क्या वर्ण व्यवस्था जन्म से थी?

उत्तर.: नहीं। गीता भी कहती है कि जन्मना जायते शूद्रः....। अर्थात् जन्म से सभी शूद्र हैं। बाद में गुण और कर्मों के आधार पर अन्य वर्णों का निर्धारण हुआ।

प्र.: फिर जन्म से कब और कैसे हुआ?

उत्तर: इसी काल में जिसका उल्लेख ऊपर किया है, समाज के स्वार्थी और 
सुविधाभोगी तत्वों ने जिनके हाथ में पढ़ना-लिखना था, कर्म के विभाजन को जन्म से विभाजन बना दिया। बस यहीं पर भारत के समाज की गंगा पूर्णतया मैली हो गई। ब्राह्मण की सन्तान ब्राह्मण, क्षत्रिय की क्षत्रिय, वैश्य की वैश्य और शूद्र की शूद्र होने लगीं।

प्र.: चार वर्णों के पश्चात् फिर ये हज़ारों जातियां कहां से उत्पन्न हो गईं?

उत्तर: अच्छा प्रश्न है। एक-एक वर्ष में भी ज्ञान, पेशे, व्यवसाय आदि के अन्तर के आधार पर पृथक-पृथक नामकरण होते गये और हज़ारों जातियां बनती गईं। यहां तक कि आज जातियों का गिना जाना भी कठिन हो गया है। समाज अनगिनत जातियों में विभाजित हो चुका है।

प्र.: जातियों में पृथकता क्या अन्य धर्मावलम्बियों जैसे इस्लाम, ईसाई, सिख आदि में नहीं मिलती?

उत्तर: अन्य धर्मों के समाज में हिन्दू समाज की जातियां भी पहुंच गईं। पेशों, व्यवसायों के आधार पर वहां भी इनका अस्तित्व बना दिया गया। हां, वहां जातिगत कट्टरता कम है। परन्तु विवाह, शादियां वहां भी अपनी-अपनी जातियांे में ही एकाध अपवादों को छोड़कर होती हैं।

प्र.: क्या विश्व में भारत में ही जातियां हैं?

उत्तर: अन्य समाजों में ‘रेस’ का अलगाव है परन्तु सतही स्तर पर। कठोरता नहीं है, कट्टरता नहीं है। हमारे समाज में जातियां सर्वाधिक कट्टर हैं और लौह दीवारों से निर्मित हैं।

प्र.: क्या जाति व्यवस्था सामाजिक कुरीति है?

उत्तर: हां सबसे बड़ी सामाजिक कुरीति जन्म पर आधारित जाति व्यवस्था है। यह मानव, मानव में गुणों और कर्मों के आधार पर भेद न करके जन्म के आधार पर भेद करती है। यह मानवाधिकारों का भी उल्लंघन करती है। यह अवैज्ञानिक और अप्राकृतिक भी है। एक डॉक्टर का पुत्र जन्म के आधार पर डॉक्टर कैसे हो सकता है? इंजीनियर का पुत्र बिना इंजीनियरिंग पास हुए इंजीनियर नहीं बन सकता। एक आईएएस, एक आईपीएस एवं पीसीएस की संतानों को उसी वर्ग में जन्म के आधार पर नहीं रखा जा सकता। फिर ब्राह्मण की सन्तान ब्राह्मण, क्षत्रिय की सन्तान क्षत्रिय इत्यादि... होते हुए जातियांे में जन्म के आधार पर विभाजन कैसे हो सकता है? धानुक की सन्तान धानुक, बाल्मीकि की बाल्मीकि, चमार की चमार, कुर्मी की कुर्मी, यादव की यादव, विश्वकर्मा की विश्वकर्मा आदि-आदि यह जाति पुराण कथा कहां तक सम्भव है? यह व्यवस्था श्रम और ज्ञान की पूंजी का अपमान है। नैसर्गिक न्याय के सि(ांतों के भी विपरीत है।
इसलिए जन्म के आधार पर जाति व्यवस्था घोर सामाजिक कुरीति है और राष्ट्र तथा मानव विरोधी भी है। इसे जाना ही होगा।

प्र.: सभी महापुरुषों ने जाति व्यवस्था की आलोचना की है, कुछ प्रकाश डालें।

उत्तर: महावीर स्वामी, महात्मा बुद्व दयानन्द सरस्वती, डॉ. अम्बेडकर तथा दक्षिण भारत के कतिपय अन्य महापुरुषों यथा रामास्वामी नायकर, ज्योतिबा फुले आदि का उल्लेख करना चाहूंगा। राम मनोहर लोहिया जी भी इसके विरुद्वप्रखर रहे।

प्र.: आपका क्या रास्ता है?

उत्तर: हमें नये नाम देने से काम नहीं चलने वाला, इतिहास और समाज साक्षी है, मेरा मत है सभी जातियों में परस्पर सौहार्द, भ्रातृत्व बढ़ाकर रोटी-बेटी के संबंध स्थापित करना एक उत्तम उपाय है, परस्पर विभिन्न जातियांे में वैवाहिक संबंध स्थापित होने पर समाज में लचीलापन आयेगा और यहीं से जातिवाद का क्षरण आरंभ होगा। जातिगत दूरियां कम होते-होते मिट जायंेगी, आज देश की नई पीढ़ी अन्तर्जातीय विवाहों में आगे आ रही है, यह शुभ संकेत है। हम इसी को बढ़ाना चाहते हैं।

प्र.: कोई अभियान या आंदोलन?

उत्तर: हां, मैंने इंडिया फ़ाइट्स कास्ट्ज्मि तथा ‘जाति तोड़ो, राष्ट्र जोड़ो’ नाम से अभियान चला रखे हैं जिसमें विभिन्न जातियों के लोग विशेषकर युवक-युवतियां आगे आ रहे हैं। एक समय ऐसा आएगा कि हर घर में अन्तर्जातीय बहू होगी। हमारी बेटियां किसी भी जाति में चली जाएंगी। फिर दूरियां स्वयमेव मिट जाएंगी और तब ऐसा समय आएगा जब लोग जातिसूचक शब्द अपने आप हटा देंगे क्योंकि तब ये शब्द बेमानी, निरर्थक लगेंगे।

प्र.: क्या आपकी संस्था अंतर्जातीय विवाह करने वालों को प्रोत्साहन देती है?

उत्तर: न केवल प्रोत्साहन अपितु सम्मान वह भी सार्वजनिक सभाओं में। साथ ही उनके लिए आर्थिक सहायताएं कैसे बढ़ें, यह भी ध्यान दिया जाता है। उनकी सुरक्षा पर भी काम किया जाता है।

प्र.: क़ानून क्या कहता है?

उत्तर: इधर, माननीय उच्चतम न्यायालय ने ऑनर किलिंग पर ऐतिहासिक निर्णय दिये हैं। हम उनका स्वागत करते हैं और चाहते हैं कि उनका पालन कड़ाई से किया जाये। अंतर्जातीय विवाह करने वालों के घर वाले, माता-पिता उनको पीड़ित करते हैं। हत्या तक कर देते हैं। ऐसा करने वालों को फांसी की सज़ा दी जाये। ऐसे अधिकारियों, कर्मचारियों, नेताओं के विरु( भी कड़ी कार्यवाही की जाये जो इस संबंध में अपना उत्तरदायित्व न निभा पायें।

प्र.: आपको समाज के विभिन्न वर्गों का समर्थन मिल रहा है या विरोध?

उत्तर: अधिकांश का समर्थन है, विशेषकर युवा पीढ़ी का। युवा पीढ़ी को ही राष्ट्र बनाना है। राष्ट्रीय एकता बढ़ानी 
है। देश को अखंड रखना है। वह जानते हैं कि जातियां निरर्थक हैं। टूटनी ही चाहिए। अगर जातियां न टूटीं तो देश टूट जायेगा। स्थिति यह होगी कि एक दिन फिर हमें परतंत्र करने में विदेशी सफ़ल हो जायेंगे और हम जातियों के मोह में फंसे और बंटे रहकर उनके सामने हाथ खड़े कर देंगे।

प्र.: ‘होरी जी’ आप समाज के नागरिकों से कोई अपील करना चाहेंगे?

उत्तर: ज़रूर, आज ज़रूरत आन पड़ी है कि हम सब एक हों, राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय भावना, राष्ट्रीय एकता, अखंडता, भाईचारा, आपसी सौहार्द बढ़ाने की दिशा में हम आगे आयें और जाति तोड़ो - राष्ट्र जोड़ो अभियान में योगदान दें।  

बातचीत करने वाले 
हमारे पत्रकार साथी 
रिज़वाबं चंचल हैं.-सम्पादक 

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2 टिप्‍पणियां:

  1. पत्रकार वार्ता पसंद आयी। होरी जी के विचार स्वागत योग्य हैं।
    भारत जातीय समस्याओं पर आधारित एक लेख का लिंक नीचे
    है, उसे पढ़िए।
    =============================
    http://dandalakhnavi.blogspot.com/2011/04/blog-post_17.html
    ==============================
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहतर...
    गंभीर चर्चा और मंतव्य...

    उत्तर देंहटाएं

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